धीरूभाई अंबानी

“बड़ा सोचो, जल्दी सोचो, आगे की सोचो। विचार किसी की बपौती नहीं। विचार पर किसी का एकाधिकार नहीं।”

उदाहरण के तौर पे…

बात १८ मार्च, १९८२ की है, जब बंबई स्टॉक एक्सचेंज में हाहाकार मच गया था। मामले पर अगर गौर करें तो हुआ यह था कि कलकत्ता में बैठे हुए वायदा कारोबारी यानी मारवाड़ी शेयर दलालों ने रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज के साढ़े तीन लाख शेयर धड़ाधड़ बेचने शुरु कर दिए। जिसके कारण कंपनी का १३१ रुपये का शेयर गिरते गिरते १२१ रुपए पर आ गया। कारोबारियों का प्लान था कि इसको और नीचे गिराया जाए और जब यह अपने निचले स्तर पर चला जाए तो वापस खरीदकर मुनाफ़ा कमा लिया जाए।

जानकारी के लिए बताते चलें कि वायदा व्यापार में सिर्फ़ ज़ुबानी ख़रीद-फ़रोख्त होती है। इसमें दलाल कहें या व्यापारी उनके पास हकीक़त में शेयर होते नहीं हैं, बल्कि बाद में दूसरे शुक्रवार को दलाल वायदे के मुताबिक़ एक दूसरे को भुगतान कर देते हैं, और अगर भुगतान में देरी हो जाए तो ५० रुपये प्रति शेयर बदला देना होता है।

चलिए बात को आगे बढ़ाते हैं… इतने बड़े खेल में और इतनी बड़ी खरीद फ़रोख्त में उन दिग्गज दलालों को पूरी उम्मीद थी कि कोई बड़ी संस्था, कम्पनी अथवा संस्थागत निवेशक कंपनी इस शेयर पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं करेगी और साथ ही यह नियम भी था कि कंपनी अपने शेयर खुद नहीं खरीद सकती। प्लान बेहद मजबूत और सही था, यहां दलालों के असफल होने की गुंजाइश बिलकुल भी नहीं थी।मारवाड़ी दलाल कंपनी के चेयरमैन और अन्य व्यापारी धीरजलाल हीराचंद को एक नौसिखिया मानते थे, यहीं उनसे सबसे बड़ी भूल हो गई।

जब धीरजलाल हीराचंद को यह बात मालूम हुआ तो बिना वक़्त गंवाए अपने दलालों से रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज के शेयर खरीदने को कह दिया। एक तरफ जहां कलकत्ता में बैठे दलाल मुंबई स्टॉक मार्किट में शेयर बिकवा रहे थे तो दूसरी तरफ धीरजलाल हीराचंद के दलाल वही शेयर खरीद रहे थे। दिन खत्म होते-होते कंपनी के शेयर की कीमत १२५ रुपये पर आ गई। अगले दिन और फिर आगे और भी कुछ दिनों में धीरजलाल हीराचंद के दलालों ने जहां से भी हुआ धड़ाधड़ शेयर खरीद डाले। नतीजतन शेयर की कीमत में बढ़ोतरी हो गयी। मेरी जानकारी के अनुसार कुल मिलाकर रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज के ग्यारह लाख शेयर बिक गए और उनमें से आठ लाख संत्तावन हज़ार धीरजलाल हीराचंद के दलालों ने खरीद लिए। यह देख कलकत्ता में बैठे दलालों के होश उड़ गए। अब अगला शुक्रवार आया तो धीरजलाल के दलालों ने शेयर की मांग रखी। जबकि इधर बेचने वाले दलालों के पास शेयर तो थे नहीं, 131 रुपये में ज़ुबानी शेयर बेचने के कारण हालत खराब थी। अब असली शेयर देते तो बाज़ार से ऊंचे दामों पर खरीदकर देने पड़ते और अगर समय मांगते तो ५० रुपये प्रति शेयर बदला देना होता।

बेचने वाले दलालों ने समय मांगा मगर धीरजलाल हीराचंद के दलालों ने इसे मना कर दिया। हालात और मार्केट का सम्मान बिगड़ता देख स्टॉक मार्केट के अधिकारियों को बीच-बचाव करना पड़ा मगर मामला नहीं सुलझा। अतः अंत में अपना वादा पूरा करने के लिए उन्होंने जहां से भी हुआ, जिस भी दाम पर हुआ रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज के शेयर उन्होंने खरीदे। तीन दिन तक हालात ऐसे ही बने रहे, स्टॉक मार्केट खुलते ही बंद हो जाता। नतीजा यह हुआ कि रिलायंस के शेयर आसमान छुने लगे। इधर जिसने भी ये शेयर बेचे वह अमीर हो गया। १८ मार्च,१९८२ को शुरू हुआ स्टॉक मार्किट का यह दंगल १० मई, १९८२ को जाकर ख़त्म हुआ तब तक धीरजलाल स्टॉक मार्किट के सरताज बन गये थे और रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज निवेशकों को सोने के अंडे देने वाली कंपनी।

‘मुश्किलों में भी अपने लक्ष्यों को ढूँढिये और आपदाओं को अवसरों, मौकों में तब्दील कीजिये अथवा बदलिए।’

इतिहासकार गीता पीरामल अपनी किताब ‘बिज़नेस महाराजास’ में लिखती हैं, ‘स्टॉक मार्केट के किस्से ने धीरजलाल हिराचंद को एक किवदंती बना दिया। पर वे स्टॉक मार्किट के मसीहा इसलिए नहीं बने कि उनकी वजह से बाज़ार तीन दिन तक बंद रहा और इसलिए भी नहीं कि उन्होंने बिकवाली दलालों को अपने सामने नतमस्तक करवा दिया था। यकीनन यह बहुत साहसिक कार्य था, पर वह बात जिसके लिए वे मसीहा बने वह यह थी आम निवेशकों का उनमें विश्वास।’ यह उसी विश्वास का नतीजा था कि नब्बे के दशक तक आते-आते उनके साथ लगभग २४ लाख निवेशक जुड़ चुके थे। रिलायंस अपनी सालाना आम बैठक (एनुअल जनरल मीटिंग) मुंबई के स्टेडियम में करती थी। जानकार बताते हैं कि जब तक धीरजलाल हिराचंद रहे उन्होंने यह विश्वास नहीं खोया, चाहे उसके लिए उन्होंने कोई भी कीमत क्यों न चुकाई हो।

”समय सीमा को छू लेना ही ठीक नहीं है, समय सीमा को हरा देना मेरी आशा है, चाह है।”

पेट्रोकेमिकल कंपनी बनाने का लक्ष्य धीरजलाल हिराचंद ने बर्मा शैल कंपनी से प्रभावित होकर ही रखा था जिसे उन्होंने बहुत कम समय में पूरा किया। उनके काम करने की रफ़्तार का अंदाजा आप इस किस्से से लगा सकते हैं कि एक बार अचानक आई बाढ़ ने गुजरात में पातालगंगा नदी के किनारे स्थित उनके पेट्रोकेमिकल प्रोजेक्ट को तहस नहस कर दिया था। युवा मुकेश ने उन्हें तकनीकी सहायता प्रदान करने वाली कम्पनी डुपोंट के अभियंताओं से पूछा कि क्या परियोजना के दो संयंत्र १४ दिनों में दोबारा शुरू हो सकते हैं तो उनका जवाब था कि कम से कम एक महीने तो लग ही जाएंगे संयंत्र शुरू करने में…

मुकेश ने यह बात धीरजलाल को फ़ोन पर बतायी। उन्होंने फौरन मुकेश को निर्देश दिया कि वे अपने तत्काल प्रभाव से उन अभियंताओं को वहां से छुट्टी कर दें क्योंकि उनकी सुस्ती बाकी लोगों को भी प्रभावित कर देगी। इसके बाद दोनों संयंत्र प्लान से एक दिन पहले यानी १३ दिन में ही शुरू कर दिए गए।

वैसे पहली बार भी यह प्लांट मात्र १८ महीनों में शुरु हो गया था। डुपोंट इंटरनेशनल के चेयरमैन रिचर्ड चिनमन को जब यह मालूम हुआ तो उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ। कथनानुसार धीरजलाल को बधाई देते हुए चिनमन ने कहा कि अमेरिका में इस तरह का प्लांट बनने में कम से कम २६ महीने तो लग ही जाते।

अब हम धीरजलाल हिराचंद अंबानी यानी सुप्रसिद्ध ब्यावसाई धीरूभाई अंबानी के बारे थोड़ी बहुत जानकारी इकट्ठा करेंगे…

उन्हें आज विश्व में ऐसा कौन है जो जानता ना हो मगर आज हम उन्हें फिर से जानेंगे, वे आज नहीं हैं मगर उनके द्वारा स्थापित रिलायंस इंडस्ट्रीज आज भी है और क्या खूब है, यह किसी से छुपा भी नहीं है। धीरुभाई अंबानी की कहानी एक छोटे व्यापारी से बहुत बड़े टाइकून बनने की कहानी है। कई लोग अंबानी के अभूतपूर्व विकास के लिए सत्तारूढ़ राजनीतिज्ञों तक उनकी पहुँच को मानते हैं। उन्होंने मात्र हाईस्कूल तक की शिक्षा ग्रहण की थी पर अपने दृढ-संकल्प के बूते उन्होंने स्वयं का विशाल व्यापारिक और औद्योगिक साम्राज्य स्थापित किया। सिर्फ तीन दशकों में ही उन्होंने अपने छोटे से कारोबार को एक विशाल औद्योगिक कंपनी में बदल डाला। न सिर्फ भारत बल्कि अंतराष्ट्रीय बाजार में भी रिलायंस एक बड़ी व्यवसायिक ताकत के तौर पर उभरी। उनकी जोखिम उठाने की अपार क्षमता और अमोघ प्रवृत्ति ने उन्हें फोर्ब्स के सबसे अमीर व्यक्तियों की सुची में पहुंचा दिया। अपने वित्तीय कौशल और सूझ-बूझ से धीरूभाई ने आधुनिक शेयर बाजार बनाया। साल २०१२ के एक आंकड़े के हिसाब से रिलायंस इंडस्ट्रीज टॉप ‘५०० फार्च्यून’ कंपनियों में से एक थी। धीरुभाई ने रिलायंस को वर्ष १९७७ में सार्वजानिक क्षेत्र में सम्मिलित किया और एक आंकड़े के अनुसार वर्ष २००७ में उनके दोनों बेटे अनिल और मुकेश की सयुंक्त संपत्ति लगभग १०० अरब डॉलर थी। इस अकूत दौलत ने अम्बानी परिवार को विश्व के धनी परिवारों में से एक बना दिया।

धीरजलाल हीरालाल अंबानी अथवा धीरुभाई अंबानी का जन्म २८ दिसंबर, १९३२ को गुजरात के जूनागढ़ जिले के चोरवाड़ गाँव में एक सामान्य बनिया परिवार में हुआ था। उनके पिताजी हिराचंद गोर्धनभाई अंबानी और माताजी का नाम जमनाबेन था। उनके पिता पेशे से अध्यापक थे। माँ-बाप के पांच संतानों में धीरूभाई तीसरे थे। उनके दूसरे भाई-बहन थे रमणिकलाल, नटवर लाल, त्रिलोचना और जसुमती। परिवार में आर्थिक तंगी थी अतः धीरूभाई को हाईस्कूल में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ गई। लोगों के कथनानुसार परिवार की आर्थिक सहायता के लिए उन्होंने गिरनार के पास भजिए (पकौड़ी) की एक दुकान लगाई, जो मुख्यतः यहां आने वाले पर्यटकों पर आश्रित थी अतः एक दिन उन्हें वह दुकान बंद करनी पड़ी।

बात वर्ष १९४८ की है जब वे सोलह साल की उम्र में अपने बड़े भाई रमणिकलाल की सहायता से यमन के एडेन शहर पहुंचे गए। वहां उन्होंने ‘ए.बेस्सी एंड कंपनी’ में ३०० रूपये माहवार पर काम करने लगे। लगभग दो वर्षों बाद ‘ए. बेस्सी एंड कंपनी’ जब ‘शेल’ नामक कंपनी के उत्पादों के वितरक बन गई तब धीरुभाई की तरक्की हो गई और वे एडन बंदरगाह पर कम्पनी के एक फिलिंग स्टेशन में प्रबंधक बना दिए गए। इस नौकरी के दौरान भी धीरूभाई का मन नौकरी में कम और व्यापार करने के मौकों की तरफ ज्यादा रहा। धीरूभाई ने हरेक संभावना पर इस दौरान विचार किया कि किस तरह वे सफल व्यवसाई बन सकते हैं।

आईए एक प्रेरक प्रसंग के माध्यम से हम इस बात पर विचार करें, धीरूभाई अंबानी जब एक कंपनी में काम कर रहे थे तब वहां काम करने वाला कर्मियों को चाय महज २५ पैसे में मिलती थी, लेकिन धीरूभाई पास के एक बड़े होटल में चाय पीने जाते थे, जहां चाय के लिये १ रुपया चुकाना पड़ता था। उनसे जब इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उस बड़े होटल में बड़े-बड़े व्यापारी आते हैं और बिजनेस के बारे में बातें करते हैं। उन्हें ही सुनने जाता हूं ताकि व्यापार की बारीकियों को समझ सकूं। इस बात से पता चलता है कि धीरूभाई अंबानी को बिजनेस का कितना जूनून था।

कुछ समय बाद यमन में आजादी के लिए आन्दोलन शुरू हो गए, इस कारण वहां रह रहे भारतीयों के लिए व्यवसाय के सारे दरवाज़े बंद कर दिए गये, अतः १९५० के दशक में धीरुभाई अंबानी यमन से भारत लौट आये और अपने चचेरे भाई चम्पकलाल दमानी (जिनके साथ वेे यमन में रहते थे) के साथ मिलकर पॉलिएस्टर धागे और मसालों के आयात-निर्यात का व्यापार प्रारंभ किया। रिलायंस कमर्शियल कारपोरेशन की शुरुआत मस्जिद बन्दर के नरसिम्हा स्ट्रीट पर एक छोटे से कार्यालय के साथ हुई। इस दौरान अम्बानी और उनका परिवार मुंबई के भुलेस्वर स्थित ‘जय हिन्द एस्टेट’ में एक छोटे से अपार्टमेंट में रहता था।

वर्ष १९६५ में धीरुभाई अम्बानी और चम्पकलाल दमानी की व्यावसायिक साझेदारी किन्हीं कारणों से समाप्त हो गयी। दोनों के स्वभाव और व्यापार करने के तरीके बिलकुल अलग थे इसलिए ये साझेदारी ज्यादा लम्बी नहीं चल पायी। एक ओर जहाँ पर दमानी एक सतर्क व्यापारी थे, वहीं धीरुभाई को जोखिम उठाने वाले। इसके बाद धीरुभाई ने सूत के व्यापार में हाथ डाला जिसमें पहले के व्यापार की तुलना में ज्यादा हानि की आशंका थी। पर वे धुन के पक्के थे उन्होंने इस व्यापार को एक छोटे स्टोर पर शुरू किया और जल्द ही अपनी काबिलियत के बलबूते धीरुभाई बॉम्बे सूत व्यापारी संगठन के संचालक बन गए।

वक्त गुजरता गया मगर उससे कहीं तेजी से धीरुभाई को वस्त्र व्यवसाय की अच्छी पकड़ हो गयी। इस व्यवसाय में अच्छे अवसर की समझ होने के कारण उन्होंने वर्ष १९६६ में अहमदाबाद के नैरोड़ा में एक कपड़ा मिल स्थापित किया। यहाँ वस्त्र निर्माण में पोलियस्टर के धागों का इस्तेमाल हुआ और धीरुभाई ने ‘विमल’ ब्रांड की शुरुआत की जो की उनके बड़े भाई रमणिकलाल अंबानी के बेटे, विमल अंबानी के नाम पर रखा गया था। उन्होंने “विमल” ब्रांड का प्रचार-प्रसार इतने बड़े पैमाने पर किया कि यह ब्रांड भारत के अंदरूनी इलाकों में भी एक घरेलु और बड़ा नाम बन गया। वर्ष १९७५ में विश्व बैंक के एक तकनिकी दल ने ‘रिलायंस टेक्सटाइल्स’ के निर्माण इकाई का दौरा किया और उसे विकसित देशों के मानकों से भी कहीं उत्कृष्ट और उच्च कोटि का पाया।

अब हम यहां थोड़ी देर के लिए जीवन इतिहास को विश्राम देते हैं और ऊपर आए हुए विमल, रणिकलाल आदि नामों पर विचार करेंगे यानी उनके अलावा उनके भाइयों के परिवावालों के बारे में बात करेंगे…

धीरूभाई अंबानी ने और उनके बेटों ने जो आज नाम कमाया है, वह नाम उनके भाई या उनके बेटों ने नहीं कमाया है। इसी कारण धीरुभाई अम्बानी के भाइयों के बारे में लोग नहीं जानते। धीरूभाई कुल पांच भाई-बहन थे। जिनमें रमणीकभाई सबसे बड़े थे, उनके बाद नाथूभाई, धीरूभाई, त्रिलोचनाबेन और जसुमतिबेन थे।धीरूभाई अम्बानी की शादी कोकिलाबेन के साथ हुई। उनके चार बच्चों में दो बेटे और दो बेटियां हैं। कालांतर में धीरूभाई के जैसे ही उनके दोनों बेटों मुकेश और अनिल ने भी अपने बिजनेस को दुनिया का टॉप कंपनी बनाये रखने में सफलता हासिल की।

अब बात करते है धीरूभाई के बड़े भाई रमणीकभाई की जो विमल कंपनी के संस्थापक हैं। रमणीकभाई की शादी पद्माबेन से हुई थी। दोनों से एक बेटा और तीन बेटियां हैं। बेटे का नाम विमल अंबानी है। रमणीकभाई ने साल १९७० में अपने बेटे के नाम पर विमल ब्रांड की शुरुआत की, जिसे सही मायनों में धीरुभाई के सहयोग से हुई थी, जो आज देश का नंबर-१ ब्रांड है।

जानकारी के लिए, रमणीकभाई रिलायंस इंडस्ट्री बोर्ड के हिस्सा भी थे। लेकिन उनके मृत्युपरांत इस बोर्ड में मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी को बोर्ड में शामिल कर लिया गया। वहीँ आज विमल अंबानी TOWER OVERSEAS LIMITED कंपनी को संभाल रहे हैं। इस कंपनी में शेयर्स का कारोबार संभाला जाता है। धीरूभाई के दूसरे भाई नाथूभाई अंबानी ने ऐसी किसी भी कंपनी का गठन नहीं किया था। नाथूभाई की शादी स्मिताबेन से हुई थी जिससे उन्हें एक बेटा विपुल नाथूभाई अंबानी हैं। विपुल पेशे से केमिकल इंजीनियर हैं और कई सारी कपनियों में ये बतौर सेक्रेटरी काम कर रहे हैं। एक समय रिलायंस इंडस्ट्रीज की कंपनी में विपुल ने मैनेजिंग डायरेक्टर का भी पद संभाला था। लेकिन बाद में विपुल ने टावर कैपिटल एंड सिक्योरिटीज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना की। फ़िलहाल विपुल अंबानी की इंडस्ट्री में निदेशक का पद संभाल रहे हैं।

अब हम वर्ष १९८० के दशक की बात करते हैं…

इसी दशक में धीरूभाई ने पॉलिएस्टर फिलामेंट यार्न निर्माण का सरकार से लाइसेंस लेने सफलता हासिल कर ली। इसके बाद धीरूभाई सफलता का सीढ़ी चढ़ते गए। धीरुभाई को इक्विटी कल्ट को भारत में प्रारम्भ करने का श्रेय भी जाता है। जब १९७७ में रिलायंस ने आईपीओ जारी किया तब ५८००० से ज्यादा निवेशकों ने उसमें निवेश किया। धीरुभाई गुजरात और दूसरे राज्यों के ग्रामीण लोगों को आश्वस्त करने में सफल रहे कि जो उनके कंपनी के शेयर खरीदेगा उसे अपने निवेश पर केवल लाभ ही मिलेगा। अपने जीवनकाल में ही धीरुभाई ने रिलायंस के कारोबार का विस्तार विभिन क्षेत्रों में किया। इसमें मुख्य रूप से पेट्रोरसायन, दूरसंचार, सूचना प्रोद्योगिकी, ऊर्जा, बिजली, फुटकर, कपड़ा/टेक्सटाइल, मूलभूत सुविधाओं की सेवा, पूंजी बाज़ार और प्रचालन-तंत्र शामिल हैं। धीरुभाई के दोनों पुत्र १९९१ के बाद मुक्त अर्थव्यवस्था के कारण निर्माण हुये नये मौकों का पूरा उपयोग करके ‘रिलायन्स’ की पीढ़ी सफल तरीके से आगे चला रहे हैं।

एक अध्यापक के बेटे धीरूभाई अंबानी की कहानी बचपन में गांठिया (एक गुजराती व्यंजन) बेचने से शुरु हुई थी, जब उनके दोस्त और भाई पढ़ाई करते थे तो वे पैसे कमाने की तरकीबें सोचते। यमन देश के एडन बंदरगाह पेट्रोल पंप पर काम करने वाले १७ साल के धीरुभाई बरमाह शैल कंपनी की सहायक कंपनी में सेल्स मैनेजर बनकर हिंदुस्तान वापस लौटे तो उनकी तनख्वाह ११०० रुपये थी, धीरुभाई अंबानी ने जो कंपनी कुछ पैसे की लागत पर खड़ी की थी उस रिलायंस इंडस्ट्रीज में २०१२ तक ८५००० कर्मचारी हो गये थे और सेंट्रल गवर्नमेंट के पूरे टैक्स में से ५% रिलायंस देती थी। और २०१२ में संपत्ति के हिसाब से विश्व की ५०० सबसे अमीर और विशाल कंपनियों में रिलायंस को भी शामिल किया गया था। धीरुभाई अंबानी को सन्डे टाइम्स में एशिया के टॉप ५० व्यापारियों की सूची में भी शामिल किया गया था।

एक इंटरव्यू में धीरुभाई ने कहा था ‘जब मैं अदन में था तो दस रुपये खर्च करने से पहले दस बार सोचता। वहीं शैल कंपनी कभी-कभी एक टेलीग्राम भेजने पर पांच हज़ार खर्च कर देती। मैंने समझा जो जानकारी चाहिए, वो बस चाहिए।’

हिंदुस्तान वापस आकर धीरुभाई ने १५ हजार रुपये से रिलायंस कमर्शियल कारपोरेशन की स्थापना की। यह कंपनी मसालों का निर्यात करती थी। अनिल अंबानी एक इंटरव्यू में इससे जुड़ा एक किस्सा बताते हैं, ‘एक बार किसी शेख ने उनसे हिंदुस्तान की मिटटी मंगवाई ताकि वो गुलाब की खेती कर सके। धीरुभाई ने उस मिटटी के भी पैसे लिए। लोगों ने पूछा क्या ये जायज़ धंधा है तो धीरुभाई ने कहा. उधर उसने एलसी (लेटर ऑफ़ क्रेडिट यानी आयत-निर्यात में पैसे का भुगतान करने का जरिया) खोला, इधर पैसा मेरे खाते में आया. मेरी बला से वो मिटटी को समुद्र में डाले या खा जाए।’ खुद को ‘जीरो क्लब’ में कहलवाने धीरुभाई ने कभी किसी काम को करने से गुरेज़ नहीं किया। एक बार उन्होंने कहा था, ‘सरकारी तंत्र में अगर मुझे अपनी बात मनवाने के लिए किसी को सलाम भी करना पड़े तो मैं दो बार नहीं सोचूंगा।’ ‘जीरो क्लब’ से उनका आशय था कि वे किसी विरासत को लेकर आगे नहीं बढ़े बल्कि जो किया अपने दम पर किया। धीरुभाई की सबसे बड़ी खासियत थी कि वे बहुत बड़ा सोचते थे और उसे अंजाम देते थे। वे मानते थे कि इंसान के पास बड़े से बड़ा लक्ष्य और दूसरे को समझने की काबिलियत होनी चाहिए। गुरचरण दास अपनी किताब ‘उन्मुक्त भारत’ में लिखते हैं ‘धीरूभाई सबसे बड़े खिलाड़ी थे जो लाइसेंस राज जैसी परिस्थिति में भी अपना काम निकाल पाये।’ यह बात सही है, जहां दूसरे बड़े घराने जैसे टाटा, बिड़ला या बजाज लाइसेंस राज के आगे हार मान जाते थे, धीरुभाई येन केन प्राकरेन अपना हित साध लेते थे।धीरुभाई अक्सर कहते थे, ‘मेरी सफलता ही मेरी सबसे बड़ी बाधा है।’ जब उन्होंने विमल ब्रांड के साथ कपड़ा बाजार में प्रवेश किया तो कपड़ा बनाने वाली कई कंपनियों ने अपने-अपने वितरकों को उनका माल बेचने से मना कर दिया था। धीरुभाई तब देश भर में घूमे और नए व्यापारियों को इस क्षेत्र में ले आये. बताते हैं कि उन्होंने वितरकों को विश्वास दिलाया कि ‘अगर नुकसान होता है तो मेरे पास आना और अगर मुनाफ़ा होता है तो अपने पास रखना’ एक ऐसा समय भी आया जब एक दिन में विमल के सौ शोरूमों का उदघाटन हुआ।

उनकी जीत के किस्से कम नहीं थे तो हार के भी चर्चे भी कम नहीं हुए। एक बार वे लार्सेन एंड टुब्रो के चेयरमैन भी बने और फिर यह कंपनी उन्हें छोड़नी पड़ी। इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका से उनका रिश्ता कभी मीठा और कभी तल्ख़ रहा। कहते हैं कि धीरुभाई ने बड़े से बड़े राजनेताओं और कारोबारियों को साध लिया था लेकिन गोयनका के आगे उनकी एक नहीं चली। उन पर नियमों की अवहेलना के बारे में इंडियन एक्सप्रेस में एक के बाद एक करके हंगामाखेज रिपोर्टें छपीं जिन्होंने रिलायंस की साख पर गंभीर सवाल खड़े किए। ऐसे हिचकोलों के बावजूद रिलायंस कामयाबी के नए आसमान छूती गई। गुरचरण दास के मुताबिक़ धीरुभाई की सफलता का कारण था उनका लक्ष्यकेंद्रित दृष्टिकोण। जहां अन्य उद्यमी ग़ैर ज़रूरी व्यवसाय करने लग जाते थे वहीं धीरुभाई एक ही उत्पाद में मूल्य संवर्धन करते जाते। पॉलिएस्टर बेचने से पॉलिएस्टर बनाने तक के धीरुभाई के सफ़र को गीता पीरामल की बात से कहकर ख़त्म किया जाए तो बेहतर होगा। ‘मुंबई के मूलजी जेठा बाज़ार में पॉलिएस्टर को चमक कहा जाता है। धीरुभाई अंबानी उस चमक के चमत्कार थे।

युग का अंत…

इतनी सारी जीत के बाद उन्हें एक बड़ी हार का सामना हुआ। एक दिन दिल का दौरा पड़ने के बाद धीरुभाई को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में २४ जून, २००२ को भर्ती कराया गया। इससे पहले भी उन्हें दिल का दौरा वर्ष १९८६ में पड़ चुका था, जिससे उनके दायें हाँथ में लकवा मार गया था। ६ जुलाई, २००२ को धीरुभाई अम्बानी ने अपनी अन्तिम सांसें लीं।

विचार…

‘मेरी सफलता का राज़ मेरी महत्वाकांक्षा और अन्य लोगों का मन जानना है’

“सही उद्यमशीलता जोखिम लेने से ही आता है”

“कठिनाइयों में भी अपने लक्ष्य को पाने की कोशिश करें। कठिनाइयों को अवसरों में तब्दील करें। असफलताओं के बावजूद, अपना मनोबल ऊँचा रखें। अंत में सफलता आपको अवश्य मिलेगी”

“बड़ा सोचो, जल्दी सोचो, आगे सोचो। विचारों पर किसी का एकाधिकार नहीं है”

“हम अपने शाशकों को नहीं बदल सकते पर जिस तरह वो हम पर राज करते हैं उसे बदल सकते हैं”

“फायदा कमाने के लिए न्योते की ज़रुरत नहीं होती”

“यदि आप दृढ संकल्प और पूर्णता के साथ काम करेंगे तो सफलता ज़रूर मिलेगी”

“कठिन समय में भी अपने लक्ष्य को मत छोड़िये और विपत्ति को अवसर में बदलिए”

“युवाओं को एक अच्छा वातावरण दीजिये। उन्हें प्रेरित कीजिये। उन्हें जो चाहिए वो सहयोग प्रदान कीजिये। उसमे से हर एक आपार उर्जा का श्रोत है। वो कर दिखायेगा”

“मेरे भूत, वर्तमान और भविष्य के बीच एक आम कारक है: रिश्ते और विश्वास का। यही हमारे विकास की नीव हैं”

“समय सीमा पर काम ख़तम कर लेना काफी नहीं है, मैं समय सीमा से पहले काम ख़तम होने की अपेक्षा करता हूँ”

“जो सपने देखने की हिम्मत करते हैं, वो पूरी दुनिया को जीत सकते हैं”

“हम दुनिया को साबित कर सकते हैं कि भारत सक्षम राष्ट्र हैं। हम भारतीयों को प्रतियोगिता से डर नहीं लगता। भारत उपलब्धियां प्राप्त करने वालों का राष्ट्र है”

धीरूभाई अंबानी बनाम बॉम्बे डाइंग

अश्विनी रायhttp://shoot2pen.in
माताजी :- श्रीमती इंदु राय पिताजी :- श्री गिरिजा राय पता :- ग्राम - मांगोडेहरी, डाक- खीरी, जिला - बक्सर (बिहार) पिन - ८०२१२८ शिक्षा :- वाणिज्य स्नातक, एम.ए. संप्रत्ति :- किसान, लेखक पुस्तकें :- १. एकल प्रकाशित पुस्तक... बिहार - एक आईने की नजर से प्रकाशन के इंतजार में... ये उन दिनों की बात है, आर्यन, राम मंदिर, आपातकाल, जीवननामा - 12 खंड, दक्षिण भारत की यात्रा, महाभारत- वैज्ञानिक शोध, आदि। २. प्रकाशित साझा संग्रह... पेनिंग थॉट्स, अंजुली रंग भरी, ब्लौस्सौम ऑफ वर्ड्स, उजेस, हिन्दी साहित्य और राष्ट्रवाद, गंगा गीत माला (भोजपुरी), राम कथा के विविध आयाम, अलविदा कोरोना, एकाक्ष आदि। साथ ही पत्र पत्रिकाओं, ब्लॉग आदि में लिखना। सम्मान/पुरस्कार :- १. सितम्बर, २०१८ में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विश्व भर के विद्वतजनों के साथ तीन दिनों तक चलने वाले साहित्योत्त्सव में सम्मान। २. २५ नवम्बर २०१८ को The Indian Awaz 100 inspiring authors of India की तरफ से सम्मानित। ३. २६ जनवरी, २०१९ को The Sprit Mania के द्वारा सम्मानित। ४. ०३ फरवरी, २०१९, Literoma Publishing Services की तरफ से हिन्दी के विकास के लिए सम्मानित। ५. १८ फरवरी २०१९, भोजपुरी विकास न्यास द्वारा सम्मानित। ६. ३१ मार्च, २०१९, स्वामी विवेकानन्द एक्सिलेन्सि अवार्ड (खेल एवं युवा मंत्रालय भारत सरकार), कोलकाता। ७. २३ नवंबर, २०१९ को अयोध्या शोध संस्थान, संस्कृति विभाग, अयोध्या, उत्तरप्रदेश एवं साहित्य संचय फाउंडेशन, दिल्ली के साझा आयोजन में सम्मानित। ८. The Spirit Mania द्वारा TSM POPULAR AUTHOR AWARD 2K19 के लिए सम्मानित। ९. २२ दिसंबर, २०१९ को बक्सर हिन्दी साहित्य सम्मेलन, बक्सर द्वारा सम्मानित। १०. अक्टूबर, २०२० में श्री नर्मदा प्रकाशन द्वारा काव्य शिरोमणि सम्मान। आदि। हिन्दी एवं भोजपुरी भाषा के प्रति समर्पित कार्यों के लिए छोटे बड़े विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित। संस्थाओं से जुड़ाव :- १. जिला अर्थ मंत्री, बक्सर हिंदी साहित्य सम्मेलन, बक्सर बिहार। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना से सम्बद्ध। २. राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सह न्यासी, भोजपुरी विकास न्यास, बक्सर। ३. जिला कमिटी सदस्य, बक्सर। भोजपुरी साहित्य विकास मंच, कलकत्ता। ४. सदस्य, राष्ट्रवादी लेखक संघ ५. जिला महामंत्री, बक्सर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद। ६. सदस्य, राष्ट्रीय संचार माध्यम परिषद। ईमेल :- ashwinirai1980@gmail.com ब्लॉग :- shoot2pen.in

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