मोहनलाल विष्णु पंड्या

पृथ्वीराज रासो का नाम तो हर एक साहित्य प्रेमी ने सुना होगा। पृथ्वीराज रासो हिन्दी भाषा में लिखा एक महाकाव्य है जिसमें पृथ्वीराज चौहान के जीवन और चरित्र का वर्णन किया गया है। इसके रचयिता चंदबरदाई पृथ्वीराज के बचपन के मित्र और उनके राजकवि थे और उनकी युद्ध यात्राओं के समय वीर रस की कविताओं से सेना को प्रोत्साहित भी करते थे। इसी महाकाव्य पर मोहनलाल विष्णु पंड्या ने बाईस खंडो में संपादन किया है। रासो के संपादन में बाबू श्यामसुंदर दास और कृष्णदास इनके सहायक थे। आइए हम आपको मोहनलाल विष्णु पंड्या जी से परिचित कराते हैं…

जीवनी…

मोहनलाल पण्ड्या का जन्म वर्ष १८५० में हुआ था। उनके पूर्वज १३वीं-१४वीं में गुजरात छोड़कर दिल्ली आकर बस गए थे। उसके बाद उनका परिवार आगरा के गोकुलपुरा में आकर बस गया, बाद में मोहनलाल जी के पिता श्री विष्णुलाल जी नौकरी के कारण मथुरा के गोलपाड़ा मौहल्ले में, मकान ले कर स्थायी रूप से बसने आगये। विष्णुलाल जी मथुरा के प्रसिद्ध सेठ लक्ष्मीचन्द के यहाँ मुख्य कोषाध्यक्ष थे।

प्रारम्भ में मोहनलाल पण्ड्या को संस्कृत, हिन्दी की शिक्षा घर पर ही दी गई फिर उन्हें आगरा के ‘सैंट जाॅन्स कालेज’ में पढ़ने के लिए भेजा गया। विष्णुलाल जी अपने पुत्र मोहनलाल को अच्छी शिक्षा दिलवाना चाहते थे अतः उन्होंने सेठजी से कह कर अपना स्थानान्तरण, सेठजी की वाराणसी वाली कोठी में करवा लिया। सेठ लक्ष्मीचन्द की वाराणसी आदि कई नगरों में व्यापारिक कोठियाँ थीं। वाराणसी में मोहनलाल पण्ड्या ने क्वीन्स कालेज और जयनारायण काॅलेज में शिक्षा प्राप्त की तथा कुछ ही समय में गुजराती, हिन्दी, के अतिरिक्त अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं पर भी समान आधिकार प्राप्त कर लिया।

पिता विष्णुलाल पण्ड्या की रुचि साहित्यिक चर्चा में अधिक थी इसलिए वे कोठी के कार्य से निवृत्त होकर नियमित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के यहाँ चले जाया करते थे। पिता के साथ मोहनलाल जी भी प्राय: भारतेन्दु जी के यहाँ जाते रहते थे। इस प्रकार उनकी रुचि भी साहित्यिक चर्चाओं की ओर बढ़ गई और धीरे-धीरे भारतेन्दु जी के यहाँ उनकी बैठक नियमित हो गई। भारतेन्दु जी से प्रभावित हो कर मोहनलाल पण्ड्या हिन्दी भाषा के परम सेवक बन गये और उन्होंने शपथ ली की वे हिन्दी की सेवा करेंगे और सदा शुद्ध हिन्दी में ही कार्य करेंगे।

काशी की साहित्यिक गतिविधियों में भी मोहनलाल पण्ड्या बढ़-चढ़ भाग लेने लगे। कुछ ही दिनों में अपनी प्रतिभा से मोहनलाल पण्ड्या ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा के आरम्भिक सदस्यों में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। काशी नागरी प्रचारिणी सभा में वे बाबू श्यामसुन्दर दास, राय कृष्णदास आदि विख्यात हिन्दी सेवी साहित्यकारों के सम्पर्क में आये जिससे उनकी प्रतिभा में चार चाँद लग गये।

जब पिता अस्वस्थ रहने लगे तो उन्होंने पुत्र मोहनलाल पण्ड्या को अवध के नवाब फैयाज आली खानबहादुर को सुपुर्द कर दिया। नवाब साहब ने मोहनलाल पण्ड्या की योग्यता को देखते हुए उन्हें अपना निजी सचिव नियुक्त कर लिया परन्तु धर्मनिष्ठ मोहनलाल पण्ड्या का मन बहुत दिनों तक नवाब साहब के यहाँ नहीं लगा और उन्होंने नवाब साहब की नौकरी से त्यागपत्र दे कर उदयपुर के महाराणा के यहाँ नौकरी कर ली। महाराणा ने उनकी धर्मनिष्ठा और कुशल प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए, उन्हें श्री नाथद्वारा और काँकरौली के पुष्टिमार्गीय गोस्वामी बालकों के नाबालिक होने के कारण, वहाँ का प्रबन्धक नियुक्त किया। बाद में महाराणा ने उन्हें उदयपुर की दीवानी अदालत में नियुक्त किया और राज्य काउंसिल का सदस्य तथा सचिव बना दिया। अन्त में मोहनलाल पण्ड्या प्रतापगढ़ (राजस्थान) राज्य के दीवान रहे और वहाँ से सेवानिवृत्त हो कर मथुरा आ गये तथा अपने पैतृक आवास में रहने लगे।

महारानी विक्टोरिया की डायमंड जुबली के अवसर पर उन्होंने एक हजार रुपये सरकारी कोष में दे कर यह प्रर्थना की थी कि इसकी व्याज से प्रति वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में दो पदक दिये जाएँ। मोहनलाल पण्ड्या राॅयल एशियाटिक सोसाइटी के भी सदस्य रहे थे। उनके पास श्रेष्ठ पुस्तकों का विशाल संग्रह था जो उन्होेंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में मथुरा के पुरातत्व संग्रहालय को दे दिया। मथुरा के आर्य समाज को भी आपने पर्याप्त धन दे कर सहायता की थी।

लगभग बासठ वर्ष की आयु में ४ सितम्बर, १९१२ को मोहनलाल पण्ड्या का मथुरा में निधन हुआ।

कृतियां…

मोहनलाल विष्णु पंड्या ने आजीवन हिन्दी साहित्य के उन्न्नयन और तत्संबंधी ऐतिहासिक गवेषणाओं में योगदान किया। जब कविराजा श्यामलदान ने अपनी ‘पृथ्वीराज चरित्र’ नामक पुस्तक में अनेक प्रमाणों के द्वारा ‘पृथ्वीराज रासो’ को जाली ठहराया, तब उसके खंडन में मोहनलाल विष्णु पंड्या ने ‘रासो संरक्षा’ नामक एक पुस्तक लिखी। उनका कहना था कि- “रासो में दिए गए संवत ऐतिहासिक संवतों से, जो ९०-९१ वर्ष पीछे पड़ते हैं, उसका कोई विशेष कारण रहा होगा।” इसके प्रमाण में उन्होंने रासो का निम्न दोहा उद्धत किया-

एकादस सै पंचदस विक्रम साक अनंद।

तिहृि रिपुजय पुरहरन को भए पृथिराज नरिंद।।

‘विक्रम साक अनंद’ की व्याख्या करते हुए मोहनलाल विष्णु पंड्या ने ‘अनंद’ का अर्थ ‘नंद रहित’ किया और बताया कि नंद ९ हुए थे, और ‘अ’ का अर्थ शून्य हुआ। अत: ९० वर्ष रहित विक्रम संवत को रासो में स्थान दिया गया है। यद्यपि उनके इस प्रकार के समाधान के लिये कोई पुष्ट कारण नहीं मिल सका, फिर भी यह व्याख्या चर्चा का विषय अवश्य बनी रासो की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिये उन्होंने ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ में कुछ लेख भी लिखे। अपने इन्हीं लेखों के कारण मोहनलाल विष्णु पंड्या ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ से प्रकाशित होने वाले ‘पृथ्वीराज रासो’ के प्रधान संपादक मनोनीत हुए।

इतिहासज्ञ और विद्वान मोहनलाल विष्णु पंड्या जी ने ‘पृथ्वीराज रासो’ का बाईस खंडो में संपादन किया। रासो के संपादन में बाबू श्यामसुंदर दास और कृष्णदास इनके सहायक थे। नागरी प्रचारिणी सभा के द्वारा ये अच्छे इतिहासज्ञ और विद्वान् के रूप में विख्यात हो गए थे।

मोहनलाल जी एक अच्छे पत्रकार भी थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा संपादित ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ नामक पत्रिका का प्रकाशन जब रुकने जा रहा था, तब उन्होंने उसे संभाला। हां एक बदलाव उन्होंने अवश्य किया, अपने संपादन काल में उन्होंने उसका नाम ‘मोहन चंद्रिका’ रख दिया था। शायद यश की चाह ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया। इसके अतिरिक्त लगभग एक दर्जन अन्य पुस्तकों की रचना भी उन्होंने की है।

अश्विनी रायhttp://shoot2pen.in
माताजी :- श्रीमती इंदु राय पिताजी :- श्री गिरिजा राय पता :- ग्राम - मांगोडेहरी, डाक- खीरी, जिला - बक्सर (बिहार) पिन - ८०२१२८ शिक्षा :- वाणिज्य स्नातक, एम.ए. संप्रत्ति :- किसान, लेखक पुस्तकें :- १. एकल प्रकाशित पुस्तक... बिहार - एक आईने की नजर से प्रकाशन के इंतजार में... ये उन दिनों की बात है, आर्यन, राम मंदिर, आपातकाल, जीवननामा - 12 खंड, दक्षिण भारत की यात्रा, महाभारत- वैज्ञानिक शोध, आदि। २. प्रकाशित साझा संग्रह... पेनिंग थॉट्स, अंजुली रंग भरी, ब्लौस्सौम ऑफ वर्ड्स, उजेस, हिन्दी साहित्य और राष्ट्रवाद, गंगा गीत माला (भोजपुरी), राम कथा के विविध आयाम, अलविदा कोरोना, एकाक्ष आदि। साथ ही पत्र पत्रिकाओं, ब्लॉग आदि में लिखना। सम्मान/पुरस्कार :- १. सितम्बर, २०१८ में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विश्व भर के विद्वतजनों के साथ तीन दिनों तक चलने वाले साहित्योत्त्सव में सम्मान। २. २५ नवम्बर २०१८ को The Indian Awaz 100 inspiring authors of India की तरफ से सम्मानित। ३. २६ जनवरी, २०१९ को The Sprit Mania के द्वारा सम्मानित। ४. ०३ फरवरी, २०१९, Literoma Publishing Services की तरफ से हिन्दी के विकास के लिए सम्मानित। ५. १८ फरवरी २०१९, भोजपुरी विकास न्यास द्वारा सम्मानित। ६. ३१ मार्च, २०१९, स्वामी विवेकानन्द एक्सिलेन्सि अवार्ड (खेल एवं युवा मंत्रालय भारत सरकार), कोलकाता। ७. २३ नवंबर, २०१९ को अयोध्या शोध संस्थान, संस्कृति विभाग, अयोध्या, उत्तरप्रदेश एवं साहित्य संचय फाउंडेशन, दिल्ली के साझा आयोजन में सम्मानित। ८. The Spirit Mania द्वारा TSM POPULAR AUTHOR AWARD 2K19 के लिए सम्मानित। ९. २२ दिसंबर, २०१९ को बक्सर हिन्दी साहित्य सम्मेलन, बक्सर द्वारा सम्मानित। १०. अक्टूबर, २०२० में श्री नर्मदा प्रकाशन द्वारा काव्य शिरोमणि सम्मान। आदि। हिन्दी एवं भोजपुरी भाषा के प्रति समर्पित कार्यों के लिए छोटे बड़े विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित। संस्थाओं से जुड़ाव :- १. जिला अर्थ मंत्री, बक्सर हिंदी साहित्य सम्मेलन, बक्सर बिहार। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना से सम्बद्ध। २. राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सह न्यासी, भोजपुरी विकास न्यास, बक्सर। ३. जिला कमिटी सदस्य, बक्सर। भोजपुरी साहित्य विकास मंच, कलकत्ता। ४. सदस्य, राष्ट्रवादी लेखक संघ ५. जिला महामंत्री, बक्सर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद। ६. सदस्य, राष्ट्रीय संचार माध्यम परिषद। ईमेल :- ashwinirai1980@gmail.com ब्लॉग :- shoot2pen.in

Similar Articles

Comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Advertisment

Instagram

Most Popular

मणिकर्णिका घाट

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। काशी...

पंचगंगा घाट

काशी की बसावट के लिहाज से शहर के उत्तरी छोर से गंगा की विपरीत धारा की ओर चलें तो आदिकेशव घाट व राजघाट के...

आदिकेशव घाट

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। काशी...