नामवर सिंह

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि एवम प्रमुख समकालीन आलोचक नामवर सिंह (Namvar Singh) जन्म १ मई, १९२७ को वाराणसी ज़िले के जीयनपुर नामक गाँव में हुआ था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उन्होंने हिन्दी में एम.ए. और पी.एच डी. की उपाधि ली। जब वे गांव में थे तो ब्रजभाषा में प्रायः श्रृंगारिक कविताएं लिखा करते थे। मगर बनारस आने के पश्चात उन्होंने खड़ी बोली हिंदी में लिखना शुरू किया।

बनारस…

बनारस में नामवर की अभिन्नता ठाकुर प्रसाद सिंह से थी। वे व्यक्तित्व के सरल आदमी थे। वे बनारस के ईश्वरगंगी मुहल्ले में रहते थे। वर्ष १९४० ई. में उन्होंने ‘नवयुवक साहित्यिक संघ’ नामक एवं साहित्यिक संस्था अपने सहयोगी पारसनाथ मिश्र ‘सेवक’ के साथ निर्मित की थी, जिसमें हर सप्ताह एक साहित्यिक गोष्ठी होती थी। वर्ष १९४४ ई. से नामवर भी इसकी गोष्ठियों में शामिल होते थे। ठाकुर प्रसाद सिंह ने ईश्वरगंगी मुहल्ले में भारतेन्दु विद्यालय एवं ‘ईश्वरगंगी पुस्तकालय’ की स्थापना की थी। १९४७ ई. में उनकी नियुक्ति बलदेव इंटर कॉलेज, बड़ागांव में हो गई। ‘नवयुवक साहित्य संघ’ की जिम्मेवारी उन्होंने नामवर और सेवक जी को दे दी। इसकी गोष्ठियां ठाकुर प्रसाद सिंह के बगैर भी बरसों चलती रहीं। बाद में इसका नाम सिर्फ ‘साहित्यिक संघ’ हो गया। इसकी गोष्टियों में बनारस के तत्कालीन प्रायः सभी साहित्यकार उपस्थित होते थे। नामवर के साथ त्रिलोचन एवं साही की इसमें नियमित उपस्थिति होती थी। नामवर की काव्य-प्रतिभा के निर्माण में इस संस्था का भी अप्रतिम योगदान है।

पहली कविता…

नामवर सिंह के स्कूल के छात्र संघ से एक मासिक पत्रिका निकलती थी- ‘क्षत्रिय मित्र’। सरस्वती प्रसाद सिंह उसके संपादक थे। आगे चलकर शम्भूनाथ सिंह उसके संपादक हुए। कुछ समय तक त्रिलोचन ने भी उसका संपादन किया था। कवि नामवर की कवितांए उसमें छपने लगी। पहली कविता ‘दीवाली’ शीर्षक से छपी। दूसरी कविता थी-‘सुमन रो मत, छेड़ गाना’: त्रिलोचन ने पढ़ने की ओर, ख़ासकर आधुनिक साहित्य, उन्हें प्रेरित किया। उनकी ही प्रेरणा से उन्होंने पहली बार दो पुस्तकें ख़रीदी। पहली निराला की ‘अनामिका’,एवं दूसरी इलाचन्द्र जोशी द्रारा अनूदित गोर्की की ‘आवारा की डायरी’। बनारस में सरसौली भवन में सागर सिंह नामक एक साहित्यिक व्यक्ति रहते थे। उनके घर पर ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की एक गोष्ठी हुई थी, जिसमें त्रिलोचन कवि नामवर को भी ले गए थे यहीं पहली बार शिवदान सिंह चौहान और शमशेर बहादुर सिंह से परिचय हआ। यह बनारस की पहली गोष्ठी थी जिसमें उन्होंने कविता-पाठ किया।

बनारस द्वारा साहित्यिक संस्कार…

कहा जाता है कि बनारस अपने आप में एक अद्भुत शहर है, तरह-तरह के मंदिर, गंगा के अनेक घाट, पंडे, पुरोहित, पतली-पतली गलियां और सनातन काल से अपने पांडित्य, शास्त्रीयता के लिए प्रसिद्ध लोग। बनारस के विषय में नामवर सिंह कहते हैं, “काशी पंडे-पुरोहित और धार्मिक लोगों की है, किंतु उसमें कबीर और तुलसीदास की भी उपस्थिति है। उसी काशी में प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद हुए, इसलिए हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि काशी केवल एक पुरातनपंथी शहर ही नहीं है, बल्कि उसके विरोधी लड़ने वाले विचारक भी हुए। उसी काशी में सारनाथ भी है और विश्वनाथ भी है। काशी में क्वींस कॉलेज है, जो कभी अंग्रेज़ियत का गढ़ था और गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज हुआ करता था, जिसमें संस्कृत के बड़े-बड़े विद्वान् हुआ करते थे, जिसे अंग्रेज़ों ने बनाया था और वहीं मदनमोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित किया। वहीं बाबू शिवप्रसाद गुप्त और आदरणीय नरेन्द्र देव ने काशी विद्यापीठ स्थापित किया। उस काशी में आया तो एक ओर नागरी प्रचारिणी सभा और दूसरी ओर प्रगतिशील लेखक संघ था। काशी में प्रेमचंद का ‘हंस’ निकलता था, जो तब प्रगतिशील लेखक संघ का मुख पत्र था। उस काशी में जहां एक ओर भारत धर्म मंडल था, वहां कम्युनिस्ट पार्टी का दफ्तर भी था। वहीं कांग्रेस का दफ्तर था, वहीं कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का भी दफ्तर था। तो काशी के कई रूप हैं।”

व्यक्तित्व…

नामवर के व्यक्तित्व के विकास में काशी की परंपरा और परिवेश की अहम भूमिका है। काशी उनके संस्कार में रचा-बसा है। लेकिन उनके निर्माण में आवाजापुर की साहित्यिक मंडली के बाद बनारस के हीवेट क्षत्रिय स्कूल के परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जहां एक से एक तपे-तपाए शिक्षक थे। उस स्कूल के प्राचार्य पहले अंग्रेज़ हुआ करते थे, पहले भारतीय प्राचार्य जगदीश प्रसाद सिंह थे, जिन्हें लोग जे.पी. सिंह कहा करते थे। वे सेंट जोन्स कॉलेज, आगरा के पढ़े थे और अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। उस समय बनारस में लोगों की यह धारणा थी कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति राधाकृष्णन सबसे अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं और दूसरे जे.पी. सिंह। उनका अंग्रेज़ी कविता पढ़ाने का प्रभावशाली ढंग था। नामवर कहते हैं, “वे कविता बहुत अच्छी तरह पढ़ाते थे। ‘गोल्डन ट्रेजरी’ पढ़ाई थी। वे इस कदर पढ़ाते थे कि कविता याद तो हो ही जाती थी, यह भी कि कविता को किस तरह पढ़ना चाहिए। रिसाइट कैसे करना चाहिए, एप्रीशिएट कैसे करना चाहिए। समझाना कैसे चाहिए।”

खड़ी बोली का सवैया…

‘तान के सोता रहा जल चादर, वायु-सा खींच जगा गया कोई।’ मैं जब उसे पढ़ता था तो वे साथ-साथ उसे गाते थे। बड़े सहृदय थे। संगीत के मर्मज्ञ थे। गाते अच्छा थे क्लासिकल। तो एक उनकी छाप पड़ी। उनकी याददाश्त अद्भुत थी। जिसका नाम वो एक बार सुन लेते थे, याद रहता था। स्कूल के हजार-बारह सौ विद्यार्थी और सबके नाम उन्हें याद थे। किसी को देख लेते तो नाम से बुलाते। एक बार की घटना है। कुछ विद्यार्थी छिपकर सिनेमा देखने गए थे और देर से लौटे थे। छह बजे शाम के बाद आए। सर्दियों के दिन थे। धुंधलका हो चुका था। तांगे पर से उतरकर जैसे ही अंदर घुसे कि प्रिंसिपल साहब छड़ी उठाकर सामने थे। टोका। बारहों विद्यार्थियों को खड़ा कर दिया। नए लड़के थे। सबका नाम पूछा और सबको जाने दिया। अगले दिन जिस क्रम से वे खड़े थे, उसी क्रम से नोटिस उनको पहुंच गया और उन्हें उसी क्रम से प्रिंसिपल रूम में बुलाया गया। तो अद्भुत स्मरणशक्ति थी। आवाज़ गूंजती थी।’ हीवेट क्षत्रिय स्कूल, इंटर में उदय प्रताप कॉलेज के नाम से जाना जाता था। पहले वहां इंटर तक की पढ़ाई होती थी। अब तो वह पी.जी. कॉलेज हो गया है। नामवर सिंह ने १९४१ से १९४७ तक वहां पढ़ाई की। जे.पी. सिंह के कारण स्कूल में कड़ा अनुशासन था। एक से एक शिक्षक थे। सुबह पी.टी. से लेकर शाम तक के हर घंटे का हिसाब था। पढ़ने का, खेलने का निर्धारित समय था। साप्ताहिक सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्यक्रम होते थे।

बनारस में निराला का अभिनंदन वर्ष १९४७ ई. में उन्होंने बारहवीं की परीक्षा पास की। इसी वर्ष बनारस में निराला का अभिनंदन किया गया था। समारोह का आयोजन नन्ददुलारे वाजपेयी ने किया था। इस आयोजन में कई युवा कवियों ने काव्य-पाठ किया था। निराला के हाथों नामवर सिंह को सौ रुपए का पुरस्कार भी मिला था। इस अवसर पर निराला ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ का पाठ भी किया था। इसी वर्ष इलाहाबाद में प्रगतिशील लेखक संघ का सम्मेलन भी हुआ था, जिसमें पहली बार राहुल सांकृत्यायन से भेंट हुई। उन्होंने समारोह की अध्यक्षता की थी। अज्ञेय, सज्जाद जहीर, नेमिचन्द्र जैन, प्रभाकर माचवे आदि ने इसमें भाग लिया था। यशपाल ने ‘शेखर : एक जीवनी’ की कड़ी आलोचना करते हुए एक लेख पढ़ा था।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश…

नामवर सिंह ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बी.ए. में प्रवेश किया तो रहने के लिए विश्वविद्यालय के पास ही संकटमोचन के इलाके में स्थित एक छात्रवास में आ गए। त्रिलोचन जी तब लंका मोहल्ले के अकनू भवन में रहते थे। प्राय: रोज सुबह गंगा-स्नान त्रिलोचन के साथ होता। वे इस क्रम में बताते हैं, “अक्षर-स्नान के साथ-साथ गंगा-स्नान भी रोज ही होता था। वर्ष १९४७ से १९५१ तक रोज गंगा-स्नान करता था। यह क्रम बरसात में भी चलता था। बल्कि बरसात में जो चिकनी मिट्टी घुली रहती, बदन पर कुछ मलना नहीं पड़ता। उनको लहरों से होड़ करने में आनंद आता था। गंगा की चिकनी मिट्टी से बढ़िया साबुन आज तक नहीं बना। हम पैदल भी खूब चलते थे। इक्के-घोड़े पर चलना अय्याशी-सी लगती। तैरने और चलने में त्रिलोचन जी का साथ रहता।” एक बार की बात है। त्रिलोचन ने नामवर से कहा, “मैंने तो बनारस की बाढ़ आई गंगा तैरकर पार की है, चलो, फिर पार करते हैं। वे दोनों तैरने लगे। थोड़ी दूर जाने के बाद त्रिलोचन ने कहा- छोड़ो, लौट चलो। पर नामवर आगे बढ़ गए। आधी नदी पार करने के बाद बांहें भरी और थकी हुई लगने लगीं। आगे बढ़ने की हिम्मत जवाब देने लगी। उस समय लगने लगा कि बचपन में तो डूबने से बच गया था, लेकिन आज तो डूब ही जाऊंगा। कोई बचाने वाला भी नहीं था। दूर-दूर तक कोई नाव भी नहीं दिखाई दे रही थी। लेकिन फिर हिम्मत जुटाई और केवल अपने को बचाया ही नहीं, गंगा भी पार की। शायद यह इसलिए कर सके कि तैरने का लगातार अभ्यास था।”

योगदान…

बनारस में नामवर की अभिन्नता ठाकुर प्रसाद सिंह से थी। वे व्यक्तित्व के सरल आदमी थे। वे बनारस के ईश्वरगंगी मुहल्ले में रहते थे। वर्ष १९४० ई. में उन्होंने ‘नवयुवक साहित्यिक संघ’ नामक एवं साहित्यिक संस्था अपने सहयोगी पारसनाथ मिश्र ‘सेवक’ के साथ निर्मित की थी, जिसमें हर सप्ताह एक साहित्यिक गोष्ठी होती थी। वर्ष १९४४ ई. से नामवर भी इसकी गोष्ठियों में शामिल होते थे। ठाकुर प्रसाद सिंह ने ईश्वरगंगी मुहल्ले में भारतेन्दु विद्यालय एवं ‘ईश्वरगंगी पुस्तकालय’ की स्थापना की थी। वर्ष १९४७ ई. में उनकी नियुक्ति बलदेव इंटर कॉलेज, बड़ागांव में हो गई। ‘नवयुवक साहित्य संघ’ की जिम्मेवारी उन्होंने नामवर और सेवक जी को दे दी। इसकी गोष्ठियां ठाकुर प्रसाद सिंह के बगैर भी बरसों चलती रहीं। बाद में इसका नाम सिर्फ साहित्यिक संघ हो गया। इसकी गोष्ठियों में बनारस के तत्कालीन प्राय: सभी साहित्यकार उपस्थित होते थे। नामवर के साथ त्रिलोचन एवं विजयदेव नारायण साही की इसमें नियमित उपस्थिति होती थी। नामवर की काव्य-प्रतिभा के निर्माण में इस संस्था का भी अप्रतिम योगदान है।

कार्यक्षेत्र…

अध्यापन… नामवर सिंह ने अध्यापन कार्य का आरम्भ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (१९५३-१९५९) किया और फिर जोधपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष (१९७०-७४), आगरा विश्वविद्यालय के क.मु. हिन्दी विद्यापीठ के प्रोफेसर निदेशक (१९७४), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में भारतीय भाषा केन्द्र के संस्थापक अध्यक्ष तथा हिन्दी प्रोफेसर (१९६५-९२) और अब उसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर इमेरिट्स भी हुए। नामवर सिंह महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी रहे।

सम्पादन…

१. आलोचना त्रैमासिक के प्रधान सम्पादक।

२. जनयुग साप्ताहिक और आलोचना का सम्पादन।

३. १९९२ से राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान के अध्यक्ष

सम्पादित ग्रंथ…

१. कहानी : नई कहानी

२. कविता के नये प्रतिमान

३. दूसरी परम्परा की खोज

४. वाद विवाद संवाद

५. कहना न होगा

कृतियाँ…

१. बकलम खुद

२. हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग

३. पृथ्वीराज रासो की भाषा

४. आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ

५. छायावाद, इतिहास और आलोचना।

निधन…

हिंदी के जाने माने साहित्यकार नामवर सिंह ९३ वर्ष आयु में १९ फरवरी, २०१९ की रात्रि में नयी दिल्ली स्थित एम्स में निधन हो गया। वह काफी समय से बीमार चल रहे थे और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती थे।

अश्विनी रायhttp://shoot2pen.in
माताजी :- श्रीमती इंदु राय पिताजी :- श्री गिरिजा राय पता :- ग्राम - मांगोडेहरी, डाक- खीरी, जिला - बक्सर (बिहार) पिन - ८०२१२८ शिक्षा :- वाणिज्य स्नातक, एम.ए. संप्रत्ति :- किसान, लेखक पुस्तकें :- १. एकल प्रकाशित पुस्तक... बिहार - एक आईने की नजर से प्रकाशन के इंतजार में... ये उन दिनों की बात है, आर्यन, राम मंदिर, आपातकाल, जीवननामा - 12 खंड, दक्षिण भारत की यात्रा, महाभारत- वैज्ञानिक शोध, आदि। २. प्रकाशित साझा संग्रह... पेनिंग थॉट्स, अंजुली रंग भरी, ब्लौस्सौम ऑफ वर्ड्स, उजेस, हिन्दी साहित्य और राष्ट्रवाद, गंगा गीत माला (भोजपुरी), राम कथा के विविध आयाम, अलविदा कोरोना, एकाक्ष आदि। साथ ही पत्र पत्रिकाओं, ब्लॉग आदि में लिखना। सम्मान/पुरस्कार :- १. सितम्बर, २०१८ में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विश्व भर के विद्वतजनों के साथ तीन दिनों तक चलने वाले साहित्योत्त्सव में सम्मान। २. २५ नवम्बर २०१८ को The Indian Awaz 100 inspiring authors of India की तरफ से सम्मानित। ३. २६ जनवरी, २०१९ को The Sprit Mania के द्वारा सम्मानित। ४. ०३ फरवरी, २०१९, Literoma Publishing Services की तरफ से हिन्दी के विकास के लिए सम्मानित। ५. १८ फरवरी २०१९, भोजपुरी विकास न्यास द्वारा सम्मानित। ६. ३१ मार्च, २०१९, स्वामी विवेकानन्द एक्सिलेन्सि अवार्ड (खेल एवं युवा मंत्रालय भारत सरकार), कोलकाता। ७. २३ नवंबर, २०१९ को अयोध्या शोध संस्थान, संस्कृति विभाग, अयोध्या, उत्तरप्रदेश एवं साहित्य संचय फाउंडेशन, दिल्ली के साझा आयोजन में सम्मानित। ८. The Spirit Mania द्वारा TSM POPULAR AUTHOR AWARD 2K19 के लिए सम्मानित। ९. २२ दिसंबर, २०१९ को बक्सर हिन्दी साहित्य सम्मेलन, बक्सर द्वारा सम्मानित। १०. अक्टूबर, २०२० में श्री नर्मदा प्रकाशन द्वारा काव्य शिरोमणि सम्मान। आदि। हिन्दी एवं भोजपुरी भाषा के प्रति समर्पित कार्यों के लिए छोटे बड़े विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित। संस्थाओं से जुड़ाव :- १. जिला अर्थ मंत्री, बक्सर हिंदी साहित्य सम्मेलन, बक्सर बिहार। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना से सम्बद्ध। २. राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सह न्यासी, भोजपुरी विकास न्यास, बक्सर। ३. जिला कमिटी सदस्य, बक्सर। भोजपुरी साहित्य विकास मंच, कलकत्ता। ४. सदस्य, राष्ट्रवादी लेखक संघ ५. जिला महामंत्री, बक्सर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद। ६. सदस्य, राष्ट्रीय संचार माध्यम परिषद। ईमेल :- ashwinirai1980@gmail.com ब्लॉग :- shoot2pen.in

Similar Articles

Comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Advertisment

Instagram

Most Popular

मणिकर्णिका घाट

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। काशी...

पंचगंगा घाट

काशी की बसावट के लिहाज से शहर के उत्तरी छोर से गंगा की विपरीत धारा की ओर चलें तो आदिकेशव घाट व राजघाट के...

आदिकेशव घाट

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। काशी...