समानता का पाखंड: पीढ़ियों की तपस्या बनाम मुफ्तखोरी की राजनीति
”वाह रे राजनीति! किसी की पूरी जिंदगी की, पीढ़ियों की कमाई को एक पल में गंवाने का नुस्खा तैयार किया जा रहा है। वो लगे हैं देश को ‘समान भाव’ में लाने में! एक तरफ वह व्यक्ति है जो अपनी पूरी जिंदगी कंजूसी करके, अपने एक-एक सुख और इच्छा का गला घोंटकर पैसा जोड़ता है, और यही संस्कार उसकी आने वाली नस्लें भी दोहराती हैं—तब जाकर समाज में एक मान-सम्मान और साम्राज्य खड़ा होता है। दूसरी तरफ वह परिवार है जो अपनी कमाई को ऐयाशी में उड़ाता है और ताउम्र गरीब बना रहता है। अब तमाशा देखिए, एक सिर्फ मेहनत करता है और अमीर बनता है, दूसरा सिर्फ गरीबी का रोना रोता है और ऐश करता है। और तभी सरकार बदलती है, एक कानून आता है—’सब बराबर!’… हो गया बराबर? अगर सब ऐसे ही बराबर होने लगा, तो कल कौन नौकरी करेगा और कौन बिजनेस? तब तो सब ऐश ही करना चाहेंगे!”
यह आक्रोश किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि देश के उस हर कर्मठ नागरिक का है जो अपनी मेहनत के दम पर शून्य से शिखर तक का सफर तय करता है। ‘सबको बराबर’ करने का यह जो सियासी और किताबी ढोंग रचा जाता है, वह वास्तव में प्रतिभा, पुरुषार्थ और श्रम का सबसे बड़ा अपमान है।
साम्राज्य एक दिन में नहीं बनते: टाटा से लेकर बड़े किसान तक का सच
आज लोग बड़ी आसानी से किसी संपन्न व्यक्ति या घराने की संपत्ति पर उंगली उठा देते हैं। लोग सोचते हैं कि टाटा (Tata) का साम्राज्य इतना बड़ा है, तो उसे बांट देना चाहिए। अरे भाई! उनके इस साम्राज्य की एक-एक ईंट में उनकी कितनी पीढ़ियां और हर पीढ़ी के कितने लोगों का खून-पसीना, त्याग और दूरदर्शिता जुड़ी है, आप उसे क्यों नहीं देखते? जमशेदजी टाटा से लेकर आज तक, कितनी रातों की नींद और कितने जोखिमों को उठाकर वह ढांचा खड़ा हुआ है, उसे एक झटके में ‘बराबर’ कर देना कहाँ का न्याय है?
यही बात हमारे देश के बड़े किसानों और कृषि परिवारों पर भी लागू होती है। आज जो कोई दस या बीस एकड़ का मालिक है, वह ज़मीन उसे खैरात में नहीं मिली। उसके दादा-परदादा ने तपती दोपहरी और कड़कड़ाती ठंड में उस बंजर मिट्टी को अपने पसीने से सींचकर उपजाऊ बनाया है। पीढ़ियों तक परिवार के सुखों की आहुति देकर जो कृषि साम्राज्य खड़ा हुआ, आज सरकारें और कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी उसे ‘भूमि सुधार’ या ‘समानता’ के नाम पर बांटने की बात करते हैं। यह उन पुरखों के श्रम का कत्ल है।
दोमंजिला मकान और मुफ्तखोरों की बोलती बंद
समाज में एक अजीब सी बीमारी फैल गई है—दूसरों की जेब से दरियादिली दिखाने की। जब कोई महोदय किसी बड़े किसान या व्यवसायी से कहते हैं कि “तुम इतने बड़े हो, तुम्हें अपनी संपत्ति गरीबों में बांट देनी चाहिए, तुम्हारी वजह से गरीबी बढ़ रही है”… तो यह उनकी कुंठा और अज्ञानता को दर्शाता है।
ऐसे लोगों के लिए बस एक ही इलाज काफी है, जो हमने आज़माया: “भाई साहब! आपके पापा और दादा ने मिलकर, धीरे-धीरे तिनका जोड़कर जो यह दोमंजिला मकान बनाया है, जिसमें इतने सारे कमरे हैं; उन्हें आप बाज़ार में बैठे इन बेघर गरीबों में क्यों नहीं बांट देते? आखिर आप अकेले इतने कमरों का क्या करेंगे?” यकीन मानिए, इस एक सवाल पर बड़े-बड़े समाजवादियों की बोलती बंद हो जाती है। अपनी गाढ़ी कमाई का एक कमरा किसी को न देने वाले लोग, दूसरों की पीढ़ियों की जागीर पर डाका डालना चाहते हैं।
सरकार की नीतियां और ब्यावसाई वर्ग (Business Class) का दमन
जब-जब सरकारें वोट बैंक के लालच में ‘सब बराबर’ करने वाले आत्मघाती कानून लाती हैं, तब-तब देश गर्त में जाता है।
प्रतिभा का पलायन (Brain Drain): अगर मेहनत करने वाले और ऐयाशी करने वाले को एक ही कतार में लाकर खड़ा कर दिया जाएगा, तो कोई जोखिम क्यों लेगा? कोई नया उद्योग क्यों लगाएगा?
उद्योगों की तालाबंदी: जब आप व्यवसायी वर्ग पर टैक्स का बोझ लादकर उस पैसे को मुफ्त की रेवड़ियों (Freebies) में बांटने लगेंगे, तो व्यापार ठप हो जाएगा। परिणाम यह होगा कि जो नौकरियां पैदा हो रही थीं, वे भी खत्म हो जाएंगी।
इतिहास गवाह है कि जिन-जिन देशों ने जबरन ‘समानता’ लाने की कोशिश की (जैसे सोवियत संघ या वेनेजुएला), वे देश आज कंगाली की कगार पर हैं। जहाँ पुरुषार्थ का सम्मान नहीं होता, वह व्यवस्था सड़ जाती है।
निष्कर्ष: बैसाखी नहीं, पंख दीजिए
गरीबी का हल अमीरों को लूटकर उन्हें गरीब बनाना नहीं है, बल्कि गरीबों को मेहनत करना सिखाकर आत्मनिर्भर बनाना है। जो अपनी कमाई ऐयाशी में उड़ा रहा है, उसकी गरीबी की जिम्मेदारी समाज या सरकार की नहीं हो सकती।
यदि देश को आगे ले जाना है, तो सरकारों को ‘मुफ्तखोरी और जबरन समानता’ की राजनीति बंद करनी होगी। पीढ़ियों की मेहनत से खड़े हुए साम्राज्यों, व्यवसायों और बड़े किसानों का सम्मान करना होगा। जब तक मेहनत करने वाले को उसकी मेहनत का पूरा फल सुरक्षित नहीं मिलेगा, तब तक यह देश घिसटता रहेगा।
काफिला और शून्य: वीआईपी संस्कृति और राजनीतिक अवसरवाद का कड़वा सच