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न्यूटन का तीसरा नियम, ‘चक्का जाम’ और डिजिटल राष्ट्र का मोहभंग!

 

​”वोट की चोट बड़ी गहरी होती है साहब,

जब अपनों से दगा मिले, तो न्यूटन याद आ ही जाते हैं।”

​आइए, आज लोकतंत्र के उस ‘सच्चे और सीधे’ नागरिक की डायरी के पन्ने पलटते हैं, जिसने पिछले दस साल केवल इसी उम्मीद में बिता दिए कि—”बंदा कड़क है, कुछ तो पक्का करेगा!”

​साल २०१४ में जब अच्छे दिनों का ढिंढोरा पीटा गया, तो इस सीधे-सादे नागरिक ने झूमकर वोट दिया। फिर साल २०१६ में एक रात अचानक घोषणा हुई—’नोटबंदी!’ देश का यह राष्ट्रभक्त नागरिक एटीएम की लाइनों में भूखा-प्यासा खड़ा रहा, पैरों में छाले पड़ गए, जेब में रखे अपने ही पैसे ‘कागज का टुकड़ा’ हो गए, लेकिन उसने मन को समझाया—”कोई बात नहीं भाई! काला धन बाहर आ रहा है, बंदा देश के लिए कुछ बड़ा कर रहा है।” छोटे-मोटे धंधे बंद हो गए, पर राष्ट्रवाद का नशा तैरता रहा।

​थोड़े दिन बीते तो बाज़ार में ‘जीएसटी’ का आगमन हुआ। हर सामान पर टैक्स के गणित ने छोटे दुकानदारों को गणितज्ञ बना दिया। कंप्यूटर के सर्वर क्रैश होते रहे, फॉर्म पर फॉर्म भरते रहे, धंधा मंदा होता रहा, लेकिन नागरिक ने फिर ताली बजाई—”वाह! पूरा देश डिजिटल हो रहा है, बंदा कुछ तो पक्का करेगा!”

​परंतु, कहानी में ट्विस्ट तब आया जब सरकार ने एक ऐसा यू-टर्न लिया कि सीधे-सादे वोटर का ‘वैचारिक नेटवर्क’ ही उड़ गया! सुप्रीम कोर्ट ने जब SC-ST Act के दुरुपयोग पर थोड़ा सा नियंत्रण लगाने की कोशिश की, तो सरकार को अचानक याद आया कि न्याय से बड़ा तो ‘चुनावी गणित’ होता है। फटाफट संसद बुलाई गई, अध्यादेश का हथौड़ा चला और कोर्ट का फैसला पलट दिया गया।

​तब उस निष्ठावान और सीधे नागरिक ने अपना सिर पकड़ लिया और कहा—”अरे ये क्या किया? तूने तो अपनों को ही दगा दे दिया!” यानी जिनके भरोसे सत्ता का सिंहासन सजाया, उन्हीं के अधिकारों और सुरक्षा को राजनीतिक वेदी पर चढ़ा दिया गया।

​अब जब रोज़गार के नाम पर हज़ारों डिग्रीधारी युवा हाथ में ‘नीट’ और ‘यूजीसी-नेट’ के लीक हुए पेपर लेकर घूम रहे हैं, जब महँगाई रसोई से लेकर बाज़ार तक तांडव कर रही है, और जब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एड-हॉक की नौकरी से निकाल कर सड़क पर खड़े कर दिए गए हैं, तब जाकर देश के इस पढ़े-लिखे मिडिल क्लास को ‘न्यूटन का तीसरा नियम’ याद आया है।

​वही न्यूटन का नियम—”प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है!”

​घर बैठे-बैठे जब युवाओं और मध्यम वर्ग ने इस नियम का व्यावहारिक परीक्षण करने की सोची, तो परिणाम सामने आ गया—हो गया चक्का जाम! जब नीतियाँ ज़मीन देखकर नहीं, बल्कि केवल रैलियों का शोर देखकर बनाई जाने लगें, तो जनता भी ‘एक्शन का रिएक्शन’ देना सीख जाती है। अब देखना यह है कि इस वैचारिक ‘चक्का जाम’ के बाद दिल्ली के दरबार का नेटवर्क सही पकड़ता है या फिर जनता न्यूटन के अगले नियमों की तैयारी करती है!

 

 

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⚠️ अस्वीकरण (Disclaimer)

इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी और स्वतंत्र वैचारिक विश्लेषण हैं। आलेख का उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल, संस्था, समुदाय या व्यक्ति विशेष की छवि को धूमिल करना या उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक विमर्श के अंतर्गत नीतिगत फैसलों, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा करना है। आलेख में दिए गए तथ्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध विभिन्न रिपोर्टों, समाचारों और तात्कालिक विधिक साक्ष्यों पर आधारित हैं। पाठक इसे केवल एक वैचारिक और साहित्यिक दृष्टिकोण के रूप में लें।

 

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