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काफिला और शून्य

 

​वह टकटकी लगाए देखता रहा,

वीआईपी को तो कभी खुद को।

​सोचता क्या अथवा सोचे क्या?

इससे पहले ही किसी ने वहाँ से,

धक्के लगा निकाल दिया।

​अपने आप को उस जगह पर सजाने को…

 

​वीआईपी का काफिला आगे बढ़ा,

साफ़-सुथरे सफेद कुर्ते-पाजामे ने,

दूसरे व्यक्ति को वहाँ से हटा दिया,

​इस बार खुद को वहाँ टिकाने को…

 

​लेकिन काफिला वहाँ रुका नहीं, आगे निकल गया,

भीड़ छंट गई।

​पहले ने अपलक उन्हें देखा,

जो शून्य में ताके जा रहे थे,

नज़ारे देखने आए थे, नज़रें चुराए जा रहे थे।

 

​लंबी खामोशी वहाँ छाई थी, लेकिन

अंतर्मन का शोर उन्हें खाए जा रहा था।

 

 

धक्के और शून्य: वीआईपी संस्कृति और आम आदमी के द्वंद्व पर एक मर्मस्पर्शी लघु कहानी

 

 

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