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निगाहें और वफ़ा

 

​उनकी हिकारत को हम सहते रहे,

मगर लब सदा ख़ामोश रहते थे।

करते थे उनसे बेपनाह मोहब्बत,

पर तन्हाई का ज़हर अकेले सहते थे।

 

​अजीब निगाहों से वो देखते रहे,

उन्हें हमारी वफ़ा पे जो शक था।

अपनी मजबूरियों की ज़ंजीर में था,

मगर मैं कभी भी बेवफ़ा न था।

 

​हक़ है उन्हें, कि शक की निगाहों से देखें,

किन्तु एक बार हमारी आँखों में तो देख।

माना कि लाख ऐब भरे हैं हममें,

पर ऐ दोस्त! पुरानी वफ़ादारी को भी देख।

 

​हर बार हम ही क्यूँ हुए हैं ढेर,

उनकी निगाहों की बेरुखी से कटकर।

मगर आज भी ज़िंदा खड़े हैं हम,

अपनी ही वफ़ा की तरफ़दारी में डटकर।

 

​उन पर हमने लुटा दिया था अपना,

ये जिस्म-ओ-जाँ, चैन और सुकून।

बदले में पाया क्या? बस ये लाचार आँखें,

और ढलती शाम का ये बिखरा हुआ ख़ून।

 

​ऐ दोस्त! अपनी ज़रा निगाह तो बदल,

मोहब्बत के उस एक पल को तो याद कर।

शक से अक्सर दिलों की दूरियां बढ़ जाती हैं,

सूखे मन में फिर प्यार की फुहार तो भर।

 

 

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