धक्के और शून्य
धूप तेज़ थी, और सड़क के किनारे धूल की एक महीन परत जम चुकी थी। अश्विनी पिछले दो घंटे से एक ही जगह पर पैर टिकाए खड़ा था। उसकी फटी एड़ियों और ढीले पड़ चुके चप्पल गवाही दे रहे थे कि वह इस तपस्या में कितनी देर से लगा है। वह टकटकी लगाए सड़क के उस छोर को देख रहा था जहाँ से बड़े साहब का काफिला गुज़रने वाला था। उसके हाथ में एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ था—एक अर्ज़ी, जो शायद उसके जीवन की सबसे बड़ी मजबूरी थी। वह बस एक बार साहब की नज़र में आ जाना चाहता था।
तभी पीछे से एक भारी हाथ ने उसे झटके से पीछे धकेल दिया।
“हट बे यहाँ से! बड़े आए साहब को देखने वाले। चल पीछे हट!”
अश्विनी संभल पाता, इससे पहले ही उसकी उस मनपसंद जगह पर एक कड़े बदन का, रोबीला और ताकतवर आदमी आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी मूंछों पर ताव दिया, कुर्ते की आस्तीन चढ़ाई और खुद को उस मुख्य जगह पर ऐसे सजा लिया जैसे वह ज़मीन उसी के बाप-दादा की हो। वह साहब के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर इलाके में अपना रसूख बढ़ाना चाहता था। अश्विनी चुपचाप पीछे खड़ा होकर अपनी किस्मत और उस ताकतवर आदमी को देखने लगा।
अभी काफिले के सायरन की आवाज़ दूर से सुनाई ही देने लगी थी कि अचानक माहौल में थोड़ी और हलचल हुई। एक सफेद, कड़कदार धोती-कुर्ते और गले में तिरंगा गमछा डाले ‘नेता टाइप’ आदमी अपने दो चेलों के साथ वहाँ पहुँचा। मौके की नजाकत को भांपते हुए उसने बिना समय गंवाए उस दूसरे ताकतवर आदमी के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शातिर मुस्कान के साथ कहा, “थोड़ा पीछे हो जाओ भाई, साहब हमें व्यक्तिगत रूप से जानते हैं।”
ताकतवर आदमी का रसूख उस राजनीतिक रसूख के आगे फीका पड़ गया। सफेद कुर्ते वाले ने उसे धीरे से किनारे हटाया और खुद को ठीक सड़क के मुहाने पर टिका दिया, ताकि साहब की गाड़ी रुकते ही वह सबसे पहले हाथ मिला सके।
सायरन की आवाज़ तेज़ हुई। धूल का एक गुबार उड़ा। पाँच चमचमाती काली गाड़ियाँ तेज़ी से आगे बढ़ीं। नेता जी ने हाथ जोड़ा, ताकतवर आदमी ने छाती चौड़ी की, और अश्विनी ने अपनी अर्ज़ी ऊपर उठाई।
लेकिन… काफिला वहाँ रुका नहीं।
काली गाड़ियों के शीशे ऊपर ही रहे। साहब ने न किसी की अर्ज़ी देखी, न किसी का रसूख, और न ही किसी का कुर्ता। काफिला पलक झपकते ही धूल उड़ाता हुआ आगे निकल गया।
कुछ ही पलों में सायरन की आवाज़ धुंधली हो गई। सड़क पर सिर्फ धूल के गुबार और गाड़ियों के धुएं का सन्नाटा रह गया। तमाशबीन भीड़ छंटने लगी।
अब वहाँ सिर्फ तीन लोग बचे थे। अश्विनी ने अपनी अपलक निगाहें ऊपर उठाईं और उन दोनों की तरफ देखा। वह ताकतवर आदमी जो कुछ देर पहले शेर बना खड़ा था, और वह नेता जो साहब का खास होने का नाटक कर रहा था—दोनों शून्य में ताके जा रहे थे। ये यहाँ तमाशा देखने आए थे या खुद का तमाशा दिखाने आए थे? वे अब एक-दूसरे से और खुद की नज़रों से नज़रें चुरा रहे थे।
वहाँ एक लंबी, डरावनी खामोशी छाई थी, लेकिन उस खामोशी के पीछे उन दोनों के अंतर्मन का शोर उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रहा था कि आखिर उनकी हैसियत उस उड़ती हुई धूल से ज़्यादा कुछ नहीं थी। अश्विनी ने अपनी मुड़ी-तुड़ी अर्ज़ी जेब में रखी और एक ठंडी सांस लेकर वापस अपने रास्ते चल दिया।