धर्मवीर भारती का ‘अंधा युग’: महाभारत का पुनर्मूल्यांकन या सनातन दर्शन का निराशावादी विकृतीकरण?
‘अंधा युग’ का मूल स्वर यह है कि महाभारत का युद्ध किसी ‘धर्म की स्थापना’ के लिए नहीं हुआ था, बल्कि यह केवल दोनों पक्षों (कौरव और पांडव) के ‘अंधेपन’, अमानवीयता और मूल्यों के पतन की पराकाष्ठा था। इसी केंद्रीय विचार को गढ़ने के लिए लेखक ने सनातन संस्कृति और महाभारत के मूल दर्शन के साथ चार बड़े वैचारिक प्रयोग किए:
१. ‘धर्म-युद्ध’ और विजय का ‘मूल्यहीन अंधापन’ घोषित करना
महर्षि वेदव्यास रचित मूल महाभारत का स्पष्ट उद्घोष है: “यतो धर्मस्ततो जयः” (जहाँ धर्म है, वहीं विजय है)। कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल ज़मीन का टुकड़ा हासिल करने का युद्ध नहीं, बल्कि अधर्म और अनैतिकता के विरुद्ध धर्म और न्याय की पुनर्स्थापना का ऐतिहासिक संघर्ष था।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: भारती जी पूरे नाटक में यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि इस युद्ध से किसी का कल्याण नहीं हुआ। पांडवों की विजय भी उतनी ही पतित, अर्थहीन और अंधी थी जितनी कौरवों की पराजय। युधिष्ठिर के ‘धर्म’ को भी छल और कुंठा का पर्याय बना दिया गया।
पोस्टमार्टम: यह सनातन चेतना पर सीधा आघात था। धर्मवीर भारती ने सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय के बीच के मौलिक अंतर को ही मिटा दिया। जब आप धर्म-रक्षा के लिए दिए गए महान बलिदानों को भी कौरवों की अमानवीयता के बराबर खड़ा कर देते हैं, तो आप समाज के मन से ‘न्याय के लिए संघर्ष’ की प्रेरणा ही समाप्त कर देते हैं। यह युद्ध-विरोध नहीं, बल्कि नैतिक नपुंसकता का प्रचार है।
२. श्रीकृष्ण के ईश्वरत्व और ‘धर्म-स्थापना’ के संकल्प को ‘अपराधी’ बनाना
नाटक में श्रीकृष्ण का चरित्र पांडवों या कौरवों की तरह ही एक ‘विवश और विवादित’ पात्र के रूप में उभारा गया है। गांधारी के शाप को श्रीकृष्ण द्वारा स्वीकार किए जाने के दृश्य को अत्यंत त्रासद और पतनशील रूप में पेश किया गया।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: गांधारी द्वारा श्रीकृष्ण को समस्त नरसंहार का दोषी ठहराना और उन्हें शाप देना, तथा श्रीकृष्ण का एक असहाय, थके हुए व्यक्ति की तरह उसे स्वीकार करना।
पोस्टमार्टम: श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण का स्पष्ट कथन है—”धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे”| परंतु ‘अंधा युग’ में श्रीकृष्ण के इस सर्वसमर्थ, योगेश्वर और धर्म-स्थापक स्वरूप को घटाकर एक ‘पराजित और बेबस’ नायक के रूप में ढाल दिया गया। पश्चिमी अस्तित्ववाद (Existentialism) के प्रभाव में आकर भारती जी ने भारतीय आस्था के सबसे बड़े प्रतीक को ही ‘अपराध बोध’ (Guilt) से भर दिया।
३. अश्वत्थामा और युयुत्सु के माध्यम से ‘अराजकता और आत्महत्या’ का उदात्तीकरण
‘अंधा युग’ के सबसे प्रभावशाली पात्र अश्वत्थामा और युयुत्सु हैं।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: अश्वत्थामा का आदमखोर और हिंसक अंधापन तथा धर्म का पक्ष लेने वाले युयुत्सु का अंत में आत्म-घृणा और निराशा के कारण आत्महत्या कर लेना।
पोस्टमार्टम: नाटक यह अति-विषाक्त संदेश देता है कि यदि आप ‘धर्म’ (पांडवों) का पक्ष लेंगे (जैसा युयुत्सु ने किया), तो अंत में आपको केवल समाज का तिरस्कार, ग्लानि और आत्महत्या ही मिलेगी! धर्म और नीति का पक्ष लेने वाले पात्र की ऐसी दुर्गति दिखाकर नाटककार ने पाठक के मन में यह बैठाया कि धर्म के मार्ग पर चलना निरर्थक और आत्मघाती है।
४. पश्चिमी निराशावाद (Nihilism) को भारतीय साहित्य पर थोपना
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोप में जो वैचारिक शून्यता (Nihilism) और निराशा फैली थी (कैमूस और सार्त्र का अस्तित्ववाद), उसे धर्मवीर भारती ने उठाकर महाभारत के कथानक पर चिपका दिया।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: पूरे नाटक का माहौल अवसादग्रस्त, अंधकारमय, और घोर निराशावादी है जहाँ कोई प्रकाश की किरण नहीं दिखती।
पोस्टमार्टम: भारतीय दर्शन कभी भी ‘निराशावादी’ या शून्यवाद में अंत होने वाला दर्शन नहीं रहा। महाभारत जैसे महाकाव्य का अंत श्रीमद्भागवत और शांतिपर्व के उस अमूल्य ज्ञान में होता है जो मानव जाति को पुनरुत्थान और निष्काम कर्म की प्रेरणा देता है। परंतु भारती जी ने भारतीय पाठकों को केवल अंधकार, कुंठा और “हम सब अंधे हैं” की हीनभावना पर लाकर छोड़ दिया।
निष्कर्ष (The Bottom Line)
धर्मवीर भारती का ‘अंधा युग’ सनातन साहित्य का कालजयी रूपांतरण नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक मनीषा पर पश्चिमी निराशावाद का औपनिवेशिक हमला है।
इस नाटक ने:
१. धर्म और अधर्म के बीच के भेद को मिटाकर ‘न्याय के लिए संघर्ष’ को अर्थहीन घोषित किया।
२. योगेश्वर श्रीकृष्ण के ओजस्वी और सर्वसमर्थ स्वरूप को कमजोर व अपराधी बनाकर प्रस्तुत किया।
३. धर्म का पक्ष लेने वाले पात्रों की दुर्गति दिखाकर समाज में निराशा, ग्लानि और वैचारिक नपुंसकता का बीज बोया।
शेखर: एक जीवनी का पोस्टमार्टम: व्यक्ति-स्वातंत्र्य या अनैतिकता और बौद्धिक अराजकता का एजेंडा?