वन्दे मातरम् – स्वदेशी अंक’ (वर्ष 2026-27)
वन्दे मातरम् – स्वदेशी अंक: राष्ट्र चेतना और आर्थिक संप्रभुता का शंखनाद
भूमिका:
आज के दौर में जब वैश्विक बाजारवाद हमारी संस्कृति और अर्थव्यवस्था को अपनी गिरफ्त में ले रहा है, तब ‘जनहित परिवार पत्रिका’ का ‘वन्दे मातरम् – स्वदेशी अंक’ एक मशाल की तरह सामने आया है। इस अंक का उद्देश्य स्पष्ट है—भारतीय मानस को जगाना (चेतना) और आने वाले संकटों के प्रति सावधान करना (चेतावनी)।
संपादकीय विश्लेषण: अतुल प्रकाश की पैनी दृष्टि
संपादक अतुल प्रकाश जी ने अपने संपादकीय में भारत की नियति और सत्ता के बदलते स्वरूपों पर बहुत ही बेबाक टिप्पणी की है। उनके अनुसार:
पश्चिमी दासता: १९४७ के बाद सत्ता ऐसे वर्ग के पास रही जो ‘अंग्रेजियत’ से मुक्त नहीं हो पाया।
संस्थानिक षड्यंत्र: विश्व व्यापार संगठन और IMF जैसी संस्थाओं के माध्यम से भारत की संप्रभुता पर चोट की गई।
सत्ता का भटकाव: १९९९ से लेकर वर्तमान तक की सरकारों के स्वदेशी दावों और उनके द्वारा किए गए अंतर्राष्ट्रीय समझौतों (जैसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’) के बीच के विरोधाभास को उन्होंने बड़ी निडरता से उजागर किया है। यह संपादकीय एक आईना है जो बताता है कि राष्ट्रवाद केवल नारों में नहीं, बल्कि नीतियों में होना चाहिए।
पत्रिका का कलेवर: तीन खंड, एक लक्ष्य
यह पत्रिका तीन विशिष्ट खंडों में विभाजित है, जो इसे पूर्णता प्रदान करते हैं:
१. गद्य-खंड (इतिहास और दर्शन): यहाँ ‘वन्दे मातरम्’ गीत के ऐतिहासिक गौरव और स्वदेशी के अटूट संबंध को वैज्ञानिक और वैचारिक धरातल पर रखा गया है। यह खंड हमें बताता है कि स्वदेशी केवल वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की वापसी है।
२. पद्य-खंड (भाव और भक्ति): यहाँ वर्तमान कवियों की लेखनी से उपजी नूतन रचनाएँ हैं, जो हृदय में देशप्रेम की ज्योति जलाती हैं।
३. चेतावनी खंड (यथार्थ की दस्तक): यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उस कुचक्र को बेनकाब करता है जिसके जरिए भारत की संपदा लूटी जा रही है।
‘अरुण’ की गूँज: बेज़ुबान की जबान हाँथ
इस अंक में आपके मित्र विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ की रचना “स्वदेशी का संकल्प: आत्मनिर्भर भारत और खादी के गौरव पर एक ओजस्वी कविता” समाज की विद्रूपताओं पर सीधा प्रहार करती है। कुछ पंक्तियाँ:
यही मंत्र है, यही तंत्र है, मुक्ति का उल्लास,
अपनी माटी, अपनी मेहनत, अपना ही विश्वास।
यह कविता इस पत्रिका के ‘स्वदेशी’ और ‘चेतावनी’ भाव को पूरी तरह आत्मसात करती है। जहाँ एक ओर मशीनीकरण ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हाथ काट दिए हैं, वहीं दूसरी ओर ‘सत्याचार’ के हाथों से भ्रष्टाचार की जीत हो रही है। अरुण जी ने जिस ‘श्मशान की आबादी’ और ‘दरकती सभ्यता’ की बात की है, वह इस पत्रिका के चेतावनी खंड का ही काव्य रूप है।
निष्कर्ष
‘वन्दे मातरम् – स्वदेशी अंक’ पढ़ना हर उस भारतीय के लिए आवश्यक है जो भारत को केवल एक भौगोलिक मानचित्र नहीं, बल्कि एक ‘जीता-जागता राष्ट्रपुरुष’ मानता है। यह पत्रिका हमें स्वदेशी की जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करती है।
जनहित परिवार पत्रिका का डिजिटल संस्करण पीडीएफ आप सभी के अवलोकनार्थ प्रेषित किया गया है। हमें विश्वास है कि आप सभी को यह बेहद पसंद आएगी।
वन्दे मातरम् – स्वदेशी अंक’ (वर्ष 2026-27)