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मणिकर्णिका घाट

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। काशी में लगभग ८४ घाट हैं, जो लगभग ४ मील लम्‍बे तट पर बने हुए हैं। इन ८४ घाटों में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से ‘पंचतीर्थ’ कहा जाता है। ये हैं असी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट।

परिचय…

मणिकर्णिका घाट काशी का प्रसिद्ध श्मशान घाट है, जो कि समस्त भारत में प्रसिद्ध है। यहाँ पर शिव जी एवं माँ दुर्गा का प्रसिध्य मंदिर भी है, जिसका निर्माण मगध के राजा ने करवाया था। मणिकर्णिका घाट का इतिहास बहुत पुराना है। कई राज इस घाट से जुड़े हुए है। कहते हैं कि चिता की आग यहां कभी शांत नहीं होती।

स्नान…

मणिकर्णिका घाट पर कार्तिक शुक्ल की चतुर्दशी अर्थात बैकुंठ चतुर्दशी और वैशाख माह में स्नान करने का विशेष महत्व है। इस दिन घाट पर स्नान करने से हर तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है।

वैश्याओं का नृत्य…

चैत्र नवरात्री की अष्टमी के दिन वैश्याओं का विशेष नृत्य का कार्यक्रम होता है। कहते हैं कि ऐसा करने से उन्हें इस तरह के जीवन से मुक्ति मिलती है, साथ ही उन्हें इस बात का उम्मीद भी होता है कि अगले जन्म में वे वैश्या नहीं बनेंगी।

चिता की राख से होली…

फाल्गुन माह की एकादशी के दिन चिता की राख से होली खेली जाती है। कहते हैं कि बाबा विश्वनाथन अपनी माता पार्वती का गौना कराकर लौट रहे थे। जब डोली इस घाट के पास से गुजरी तो सभी अघोरी नाच गा कर रंगों से इनका स्वागत करने लगे। तब से यहां की होली मशहूर हो गई।

शक्तिपीठ…

ग्रथों आदि के अनुसार माता सती के कान का कुंडल यहीं गिरा था, इसीलिए इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा। यहां पर माता का शक्तिपीठ भी स्थापित है। जब भी यहां किसका दाह संस्कार किया जाता है, तो अग्निदाह से पूर्व उससे पूछा जाता है, क्या उसने भगवान शिव की धर्मपत्नी माता सती के कान का कुंडल देखा। यहां भगवान शिव अपने औघढ़ स्वरूप में सैदव ही निवास करते हैं।

प्राचीन कुंड…

एक बार भगवान शिव हजारों वर्षों से योग निंद्रा में थे, तब विष्णु जी ने अपने चक्र से एक कुंड को बनाया था जहां भगवान शिव ने तपस्या से उठने के बाद स्नान किया था और उस स्थान पर उनके कान का कुंडल खो गया था जो आज तक नहीं मिला। तब ही से उस कुंड का नाम मणिकर्णिका घाट पड़ गया। काशी खंड के अनुसार गंगा अवतरण से पूर्व से ही इसका अस्तित्व है। मणिकर्णिका घाट पर भगवान विष्णु ने सबसे पहले स्नान किया। इसीलिए वैकुंठ चौदस की रात के तीसरे प्रहर यहां पर स्नान करने से मुक्ति प्राप्त होती है। यहां पर विष्णु जी ने शिवजी की तपस्या करने के बाद एक कुंड बनाया था। 

कुंड से निकली थी प्राचीन प्रतिमा… 

प्राचीन काल में मां मणिकर्णिका की अष्टधातु की प्रतिमा इसी कुंड से निकली थी। कहते हैं कि यह प्रतिमा वर्षभर ब्रह्मनाल स्थित मंदिर में विराजमान रहती है परंतु अक्षय तृतीया को सवारी निकालकर पूजन-दर्शन के लिए प्रतिमा कुंड में स्थित १० फीट ऊंचे पीतल के आसन पर विराजमान कराई जाती है। इस दौरान कुंड का जल सिद्ध हो जाता है जहां स्नान करने से मुक्ति मिलती है।

माता सती का अंतिम संस्कार…

भगवान् भोलेनाथ जी द्वारा यही पर माता सती जी का अंतिम संस्कार किया था। इसी कारण यह घाट महाश्मशान घाट प्रसिद्ध है।

मणिकर्णिका घाट की होली

पंचगंगा घाट

काशी की बसावट के लिहाज से शहर के उत्तरी छोर से गंगा की विपरीत धारा की ओर चलें तो आदिकेशव घाट व राजघाट के बाद पंचगंगा घाट प्रमुख घाट आता है। पंचगंगा घाट को पंचगंगा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह घाट पांच नदियों – गंगा, सरस्वती (कहीं कहीं विशाखा), धूतपापा, यमुना और किरना के संगम पर बसा है। इन पांच नदियों में से सिर्फ गंगा ही एक ऐसी नदी है, जिसे देखा जा सकता है, बाकी की चार नदियां पृथ्‍वी में समा गईं।

परिचय…

धार्मिकता-अध्यात्मिकता के स्तर पर इस घाट की काशी के पंच तीर्थों में मान्यता है तो इसे पंचनद तीर्थ भी कहा जाता है। कार्तिक मास में गंगा के विभिन्न घाट व सरोवरों पर कार्तिकी डुबकी के लिए श्रद्धालु उमड़ते हैं लेकिन पंचनदतीर्थ (पंचगंगा) स्नान की विशेष महत्ता है। ऐसे में यहां स्नान से हर तरह के पापों का शमन होता है। पुराणों में भी वर्णन है कि पंचनद तीर्थ में स्वयं तीर्थराज प्रयाग भी कार्तिक मास में स्नान करते हैं।

पंचगंगा घाट तीन प्रसिद्ध ऐतिहासिक कारण…

१. संत तुलसी दास, जिन्‍होने प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथ रामायण को रचा था, उन्‍होने अपनी खास रचना विनायक पत्रिका को इसी स्‍थान पर बैठ कर लिखा था।

२. वेदों के महान ज्ञाता और शिक्षक स्‍वामी रामानंद अपने शिष्‍यों को यहीं शिक्षा दिया करते थे।

३. मुगल शासक औरंगजेब ने यहां स्थित विष्‍णु मंदिर को नष्‍ट कर दिया था, जिसे मराठा सरदार बेनी मधुर राव सिंधिया ने बनवाया था और इसके स्‍थान पर औरंगजेब ने आलमगीर मस्जिद का निर्माण करा दिया था।

मान्यता…

मान्यताओं के आधार पर भगवान शिव की प्राचीन नगरी काशी में कार्तिक माह श्री विष्णु के नाम होता है। शरद पूर्णिमा की रात वैभव लक्ष्मी की आराधना से शुरू स्नान उत्सव पूरे माह चलता है। स्नान के बाद पंचगंगा घाट पर श्रीहरि स्वरूप बिंदु माधव के दर्शन का विधान है।

पितरों की राह आलोकित करने के लिए कार्तिक के पहले ही दिन से लेकर आखिरी दिन तक आकाशदीप जलाए जाते हैं। पंचगंगा घाट पर इनकी आभा निराली होती है। इसकी प्राचीनता का अंदाज श्रीमठ में स्थापित हजारे से लगाया जा सकता है। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने वर्ष १७८० में लाल पत्थरों से इसका निर्माण कराया था।

विशेष…

काशी के इस क्षेत्र को अवस्थित सप्तपुरियों में कांचीपुरी क्षेत्र माना गया है। १४वीं -१५वीं शताब्दी में वैष्णव संत रामानंद इस घाट पर ही निवास करते थे। गंगा के इस तट से ही उन्होंने काशी में रिम भक्ति को आंदोलन का रुप दिया। घाट की पथरीली सीढियों पर कबीर को गुरु मंत्र प्रदान किया और रामभक्ति की सगुण के साथ ही निर्गुण धारा को प्रवाह दे दिया। घाट पर आज भी रामानंद संप्रदाय की मूल पीठ श्रीमठ स्थित है। खास यह की इस मठ के श्री-आशीषों से सींच कर ही बनारस को देव दीपावली महोत्सव सौगात में मिला। इसकी शुरूआत कार्तिक के पहले दिन आकाशदीप प्रज्जवलन से होती है।

इतिहास…

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार रघुनाथ टण्डन ने वर्ष १५८० में इस घाट का पक्का निर्माण कराया। सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में आमेर के राजा मान सिंह ने भगवान बिंदु माधव मंदिर का निर्माण कराया था। इसे बाद में औरंगजेब द्वारा नष्ट कर आलमगीर मस्जिद का रूप दे दिया गया और तब से घाट का नाम पंचगंगा कहा जाने लगा। घाट के महात्म्य को देखते हुए वर्ष १९६५ में सरकार ने निचले भाग को भी पक्का कर दिया।

मठ और मंदिर…

श्रीमठ के साथ ही तैलंग स्वामी मठ का भी नाम आता है। उन्नीसवीं शताब्दी में महान संत तैलंग स्वामी यहां निवास करते थे। मठ में उनके हाथों स्थापित लगभग पचास मन भार का शिवलिंग आज भी पूजित है। घाट पर बिंदु विनायक, राम मंदिर (कंगन वाली हवेली), राम मंदिर (गोकर्ण मठ), रामानंद मंदिर, धूतपापेश्वर (शिव), रेवेन्तेश्वर (शिव) मंदिर आदि प्रमुख हैं। 

स्नान और मेला…

घाट पर कार्तिक शुल्क एकादशी से पूर्णिमा तक पंचगंगा स्नान का मेला लगता है। स्नानोपरांत श्रद्धालु जन मिट्टी से निर्मित भीष्म प्रतिमा का पूजन करते हैं।

 

मणिकर्णिका घाट 

आदिकेशव घाट

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। काशी में लगभग ८४ घाट हैं, जो लगभग ४ मील लम्‍बे तट पर बने हुए हैं।

आदिकेशव घाट…

काशी के इन ८४ घाटों में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से ‘पंचतीर्थ’ कहा जाता है। ये हैं असीघाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट। गंगा घाटों की पहचान और परंपरा के क्रम में इस बार हम लेकर आए हैं, ‘आदिकेशव घाट’ के ऐतिहासिक और पौराणिक महात्म्य को आपसे मिलाने के लिए।

आस्था इतिहास…

ग्यारहवीं सदी में गढ़वाल वंश के राजाओं ने आदिकेशव मंदिर व घाट का निर्माण कराया था। मान्यता है कि ब्रह्मालोक निवासी देवदास को शर्त के अनुसार ब्रह्मा जी ने काशी की राजगद्दी सौंप दिया और देवताओं को मंदराचल पर्वत जाना पड़ा। शिवजी इससे बहुत व्यथित हुये क्योंकि काशी उनको बहुत प्यारी थी। तमाम देवताओं को उन्होंने काशी भेजा ताकि वापस उन्हें मिल जाय लेकिन जो देवता यहां आते यहीं रह जाते। अखिर हारकर शिवजी ने श्रीविष्णु और लक्ष्मी जी को अपनी व्यथा कह सुनाई और उन्हें काशी वापस दिलाने का अनुरोध किया। लक्ष्मीजी के साथ श्रीविष्णु काशी में वरुणा व गंगा के संगम तट पर आये। यहां विष्णुजी के पैर पड़ने से इस जगह को श्री विष्णु चरणपादुका के नाम से भी जाना जाता है। यहीं पर स्नान करने के उपरान्त श्री विष्णु ने तैलेक्य व्यापनी मूर्ति को समाहित करते हुये एक काले रंग के पत्थर की अपनी आकृति की मूर्ति स्थापना की और उसका नाम आदि केशव रखा। उसके बाद ब्रह्मालोक में देवदास के पास गये और उसको शिवलोक भेजा और शिवजी को काशी नगरी वापस दिलायी।

अविमुक्त अमृतक्षेत्रेये अर्चनत्यादि केशवं ते मृतत्वं भजंत्यो सर्व दु:ख विवर्जितां,

अर्थात : अमृत स्वरूप अवमुक्त क्षेत्र काशी में जो भी हमारे आदि केशव रुप का पूजन करेगा वह सभी दु:खों से रहित होकर अमृत पद को प्राप्त होगा।

इतिहास…

स्व. झूमक महाराज के वंशज विनय कुमार त्रिपाठी के अनुसार काशी खंड के तीसरे भाग में इसकी चर्चा की गयी है। उनके अनुसार, ‘वर्ष ११९६ में सिराबुद्दीन ने अपनी सेना के साथ इस मंदिर पर आक्रमण किया और लूटपाट और क्षतिग्रस्त करके चला गया। बाद में १८वीं शती में सिंधिया के दीवान भालो जी ने इस मंदिर का निर्माण कार्य कराया।’ अठ्ठारहवीं शताब्दी में बंगाल की महारानी भवानी ने घाट का पक्का निर्माण कराया था। परन्तु कुछ वर्षो के पश्चात यह क्षतिग्रस्त हो गया जिसका पुन: निर्माण वर्ष १९०६ में ग्वालियर राज के दीवान नरसिंह राव शितोले ने कराया।

मंदिर एवम तीर्थ…

घाट पर आदि केशव के अतिरिक्त ज्ञान केशव, संगमेश्वर शिव चिन्ताहरण गणेश, पंचदेवता एवं एक अन्य शिव मंदिर स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि संगमेश्वर शिवलिंग की स्थापना स्वयं परमपिता ब्रह्मा जी ने की है। मत्यस्यपुराण के अनुसार इस घाट को काशी के प्रमुख पांच घाट तीर्थो में स्थान प्राप्त है एवं काशी का प्रथम विष्णु तीर्थ माना जाता है। इस संदर्भ में मान्यता है कि श्रीविष्णु जब काशी में पधारे तो इसी गंगातट पर अपने पैर धोये। इस घाट के सम्मुख गंगा में विष्णु से सम्बन्धित पदोदक, अम्बरीश, महालक्ष्मी, चक्त्र, गदा, पद्म, आदित्यकेशव एवं श्वेतदीप तीथरें की स्थिति मानी गई है। लिंगपुराण एवं काशीखण्ड के अनुसार घाट के सम्मुख गंगा में स्नान, स्पर्श या जलग्रहण मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

महात्म…

घाट का महात्म गहड़वाल काल से ही रहा है, घाट के समीप ही गहड़वाल शासकों का किला था, इनके दानपत्रों में घाट पर मुण्डन संस्कार, नामकरण, उपनयन एवं अन्य संस्कारों के सम्पन्न होने का प्रमाण है। यहां भाद्र माह के शुक्ल द्वादशी घाट को वारूणी पर्व का मेला आयोजित होता है जिसमें विभिन्न सास्कृतिक कार्यक्त्रमों का आयोजन किया जाता है। काशी के पंचतीर्थी एवं पंचक्त्रोशी यात्री इस घाट पर स्नान एवं दर्शन के पश्चात आगे की यात्रा करते हैं जो मणिकर्णिका घाट पर जाकर समाप्त होता है।

परिचय…

घाट के ऊपरी भाग में एक व्यायामशाला भी है। वर्तमान में मुख्य घाट पक्का है किन्तु शहर के बाहर स्थित होने के कारण यहाँ दैनिक स्नानार्थियों की संख्या कम होती है। पर धार्मिक महात्म्य के कारण स्थानीय एवं पर्व विशेष पर स्नान करने वाले स्नानार्थियों का आगमन होता है। सन् १९८५ में राज्य सरकार के द्वारा घाट का मरम्मत कराया गया एवं वर्तमान में इसकी स्वच्छता को बनाये रखने के लिये सराहनीय प्रयास किये जा रहे हैं।

पंचगंगा घाट 

मामा जी की स्मृति से

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अपने बेटों से परेशान होकर एक महोदय कैंट स्टेशन के एक बैंच पर सोए हुए थे। उन्हें कहीं जाना था, मगर कहां यह उन्हें भी पता नहीं था। बस जाना था, तो जाना था। उनकी पांच फुट आठ या नौ इंच स्थूल शरीर पर अच्छे कपड़े थे और वे गेहूवें रंग के रौबदार चेहरे वाले थे, मगर उनके दांत गंदे थे, जैसे; पान, मसाला, सुपारी आदि खाए हुए से हों। साठ या पैंसठ वर्ष की उम्र रही होगी उनकी, जब वाराणसी कैंट पर हमारे मामाजी से उनकी मुलाकात हुई थी। 

मामाजी को लखनऊ जाना था और वे अपनी छुक छुक गाड़ी का इंतजार करने के लिए, उसी बैंच के पास आ गए जहां श्रीमान गुमशुदा अथवा माननीय खफा अपनी नींद ले रहे थे। मामाजी ने उनसे गुजारिश की, ‘श्रीमान, आप या तो बैठ जाएं अथवा पीछे वाले बैंच पर सो जाएं, जिससे मैं यहां बैठकर अपनी गाड़ी का इंतजार कर सकूं।’ बेचारे भले मानस थे, अपने दर्द को लेकर भी मुस्कुरा दिए और बोले, ‘जी! आइए हम भी गाड़ी का ही इंतजार कर रहे हैं।’

दोनों जन अपनी अपनी गाड़ी का इंतजार करने लगे या यूं कहें कि एक ही गाड़ी का। अब आप यह सोच रहे होंगे कि एक ही गाड़ी का इंतजार वो दोनों कर रहे थे यह हम कैसे जानते हैं? तो साहब! श्रीमान गुमशुदा जी ने मामाजी से स्वयं ही बताया था कि जो भी गाड़ी स्टेशन पर पहले आयेगी मुझे उसी से जाना है। इस पर मामाजी चौंक गए, उनके मन में उत्सुकता और डर का मिला जुला भाव अंगड़ाई लेने लगा। कुछ देर तक वे चुप रहे, मगर जब उनके मन में व्यग्रता बढ़ने लगी तो उन्होंने महोदय से पूछा, ‘अगर आप बुरा ना माने तो, एक बात जानना चाहता हूं।’ महोदय ने धीरे से कहा, ‘पूछिए’ जैसे वो पहले से ही जानते हों कि वो क्या पूछने वाले हैं। मामाजी ने कहा, ‘आपने यह क्यों कहा कि जो भी पहली गाड़ी आएगी मैं उसी से जाऊंगा?’ महोदय ने कहा, ‘मैं घर छोड़कर जा रहा हूं।’ इसपर मामाजी ने चौंकते हुए पूछा, ‘क्यों? कोई परेशानी है क्या? या पैसे की किल्लत है? या फिर घर में कोई झगड़ा वैगरह कुछ हुआ है?’ एक साथ इतने सारे सवाल सुन, महोदय ने कहा, ‘जी, ऐसी कोई बात नहीं है, मैं बनारस का ही रहने वाला हूं, मेरी यहां एक कपड़े की बहुत बड़ी दुकान है, जिसे मैंने स्वयं अपने खून पसीने से बनाया है। मगर आज उस दुकान का कोई और मालिक बनने की ख्वाईश रखता है और उसके लिए रोज घर में कोहराम मचा रहता है, उसी वजह से मैं आज घर छोड़कर जा रहा हूं। मैने मोबाइल भी घर पर ही छोड़ दिया है। इतना कह वे चुप हो गए। 

मामाजी, उन्हें एक टक निहारते रहे, फिर धीरे से पूछा, ‘वह कौन व्यक्ति है जो आपसे आपकी जीवन भर की कमाई, आपकी दुकान का मालिकाना छीनना चाहता है?’ और कौन जी? मेरे अपने बेटे, उन्होंने थोड़ा खीझते हुए कहा। इस बार थोड़ी देर के लिए दोनो चुप रहे। फिर से चुप्पी को तोड़ते हुए मामाजी ने कहा, ‘आपने अपनी पत्नी को बताया है कि आप कहां जा रहे हैं।’ नहीं! उनका संक्षिप्त जवाब। तब मामाजी ने उन्हें समझते हुए कहा, ‘आप अपनी जिम्मेदारियों से बच कर भाग नहीं सकते, आपने यह सोचा कि आपके भाग जाने से उन पर क्या गुजरेगी या अभी क्या गुजर रही होगी। जो बेटे आपके नहीं हुए, क्या वो आपकी पत्नी को यानी अपनी मां के प्रति समर्पित रह पाएंगे। क्या उन्हें वे खुश रख पाएंगे। या फिर आपके ना रहने से आपकी पत्नी खुश रह पाएंगी? जरा विचार कीजिए। चलिए, मैं आपको आपके घर छोड़ देता हूं। इस पर वे महोदय बोले, ‘आप पान खाते हैं?’ जी नहीं! मैं पान आदि का शौक नहीं रखता।’ मामाजी ने कहा। वे महोदय खड़े हो गए और फिर कुछ सोच कर अपना मोबाइल नंबर उन्हें दे एक ओर निकल गए। मामा जी उन्हें ताकते रह गए।

अरे भाई! जरा ठहरो, बात यहां खत्म कहां हुई है…

कुछ विचारों के धमक से मामाजी एकाएक चौंकते हुए उठ खड़े हुए। उनके दिमाग में दो बातें एक साथ मिलकर उन्हें परेशान करने लगीं, पहली यह कि कहीं मैं किसी बात से ट्रैप तो नहीं हो रहा और दुसरी बात यह कि अगर वह व्यक्ति सच बोल रहा हो और कहीं चला गया तो मैं स्वयं को जीवन पर्यंत तो नहीं, मगर कुछ दिन जरूर माफ नहीं कर पाऊंगा और यह बात हमेशा सलता रहेगा, मैंने सच का पता नहीं लगाया। इसके लिए उन्होंने पहले उस नंबर पर फोन लगाया, जिसे श्रीमान गुमशुदा ने दिया था। फोन लगा, तो दूसरी तरफ से किसी महिला ने फोन उठाया। फोन पर पहले परिचय तत्पश्चात श्रीमान गुमशुदा जी के बारे में कुछ बातें हुईं। मामाजी ने उन्हें यह भी बताया की आपके पति कैंट स्टेशन पर हैं और कहीं जाने का विचार कर रहे हैं, अतः आप उनसे जितनी जल्दी हो सके आकर मिल लें।

उसके बाद मामाजी ने फोन काट दिया। फोन कटने के दो तीन मिनट के अंदर ही माननीय खफाजी के किसी बेटे का फोन आया, ‘सर! अभी आप कहां हैं? और मेरे पापा कहां हैं? क्या वो अभी आपके पास हैं? आदि आदि।’ इसपर मामाजी ने कहा, ‘भाई! वो हमारे पास नहीं हैं, वो अभी अभी पांच मिनट हुए, कहीं चले गए हैं।’ इसपर बेटे ने कराहते हुए कहा, ‘अंकल जी! कृपया कर आप उन्हें ढूंढें, हम अभी वहां आते हैं। जब वो मिल जाएं तो, उन्हें रोके रहिएगा। जितनी जल्दी हो सकेगा हम वहां पहुंचते हैं।

अब मामाजी असमंजस में पड़ गए कि एक तरफ गाड़ी आने वाली है, उसे पकड़ें या फिर उन महोदय को खोजें। आखिर कैंट स्टेशन कोई छोटा भी तो नहीं है। फिर एकाएक मामाजी को ख्याल आया कि महोदय को पान खाने की बड़ी तलब लगी थी, तभी तो वो उन्हें पान खाने का ऑफर दे रहे थे। चलकर बाहर देखा जाए, शायद कहीं दिख जाएं। इतना सोच, बाहर की ओर वे तेजी से भागे। और किस्मत तो देखिए, श्रीमान गुमशुदा जी ठीक स्टेशन के मुख्य द्वार के सामने से आते दिख पड़े। मामाजी ने उन्हें वहीं पकड़ा, बातों में फंसाया, वहीं बैठाया, और वैसे ही उलझाए रखा। कुछ अपनी आपबीती कही तो कुछ उनकी बातें सुनी। कुछ दर्द उनके थे, जो बाहर आ निकले तो कुछ दर्द मामाजी के थे, जो माननीय खफा जी के घाव भरने में सहायक हो रहे थे। दोनों के दर्द मिलकर हमदर्द बन गए। इस बीच दो बार श्रीमान गुमशुदा जी के बेटे का फोन आया, तो मामाजी ने उन्हें अपने स्थान का विवरण उन्हें बता दिया, जहां वे दोनों आपसी खट्टी मीठी बातों में मशगूल थे। 

दोनो ही बेटे आ धमके, आते ही उन्होंने अपने पापा की कुछ विशेष प्रकार की गालियां खाई, तो कुछ आंसू भी बहाए। बेटे उनके पैरों में गिर उन्हें मनाने लगे। वे मामाजी के शुक्रगुजार थे, जिसे उनके आंसुओं ने गवाही दी। उन्होंने मामाजी के पैर को भी अपनी जागीर समझ रखा था और बेहद आत्मीयता से अपना हक जताने लगे। यह देख कैसे किसी बाप का दिल पिघल ना जाता, वो चलने को तैयार हो गए। इधर मामाजी के गाड़ी का समय भी होने वाला था, तो मामाजी बाप और बेटों को छोड़ और उनसे विदा ले अपनी गाड़ी पकड़ने चल दिए।

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

दशाश्वमेध घाट

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। काशी में लगभग ८४ घाट हैं, जो लगभग ४ मील लम्‍बे तट पर बने हुए हैं। इन ८४ घाटों में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से ‘पंचतीर्थ’ कहा जाता है। ये हैं असी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट।

दशाश्वमेध घाट…

काशी के पंचतीर्थ में से एक दशाश्वमेध घाट का अपना अलग ही धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। काशीखंड के अनुसार शिवप्रेषित ब्रह्मा ने काशी में आकर यहीं दस अश्वमेध यज्ञ किए। शिवरहस्य के अनुसार यहाँ पहले रुद्रसरोवर था परंतु गंगागमन के बाद पूर्व गंगापार, दक्षिण दशहरेश्वर, पश्चिम अगस्त्यकुंड और उत्तर सोमनाथ इसकी चौहद्दी बनी। यहाँ प्रयागेश्वर का मंदिर है।

इतिहास…

काशीप्रसाद जायसवाल के अनुसार भारशिवों राजभर ने जिस स्थान पर दस अश्वमेघ किए वह यही भूमि है। वर्ष १९२९ में यहाँ रानी पुटिया के मंदिर के नीचे खोदाई में अनेक यज्ञकुंड निकले थे। त्रितीर्थी में यहाँ स्नान करना अनिवार्य है।

आदिकेशव घाट 

काशी के घाट भाग – २

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। काशी में लगभग ८४ घाट हैं, जो लगभग ४ मील लम्‍बे तट पर बने हुए हैं। इन ८४ घाटों में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से ‘पंचतीर्थ’ कहा जाता है। ये हैं असी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट।

१. अक्रूर घाट का निर्माण राय शिव प्रसाद जी ने करवाया था।

२. अग्निश्वर घाट का निर्माण माधोराव पेशवा ने करवाया था।

३. अमरोहागिरी बावली घाट का निर्माण बाबू केशव दास जी ने करवाया था।

४. असीघाट का निर्माण बनारस के तत्कालीन महाराज ने करवाया था। घाट के पास कई मंदिर ओर अखाड़े हैं। असीघाट के उत्तर में ‘जगन्नाथ मंदिर’ है, जहाँ प्रतिवर्ष मेले का आयोजन किया जाता है। यह घाट श्रद्धालुओं की आस्था व आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है।

५. अमरोहागिरी बावली घाट का निर्माण बाबू केशव दास जी ने करवाया था।

६. आदिकेशव घाट काशी के वरुणा व गंगा के संगम पर स्थित है। यहाँ संगमेश्वर व ब्रह्मेश्वर मंदिर दर्शनीय हैं।

७. केदारी घाट का निर्माण कुमार स्वामी ने करवाया था। केदार घाट का नाम केदारेश्वर महादेव मंदिर के नाम पर पड़ा है। केदारी घाट के समीप में ही स्वामी करपात्री आश्रम व गौरी कुंड स्थित है।

८. खिरकी घाट का निर्माण महाराजा, इंदौर ने करवाया था।

९. खोरी घाट का निर्माण कवीन्द्र नारायण सिंह ने करवाया था।

१०. गंगामहल घाट का निर्माण मथुरा पांडे ने करवाया था।

११. गणेश घाट का निर्माण माधोराव पेशवा ने करवाया था।

१२. गायघाट का निर्माण घाट के ब्राह्मण समाज ने करवाया था।

१३. गुलरिया घाट का निर्माण लल्लू जी अग्रवाल ने करवाया था।

१४. गोला घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है।

१५. घोड़ा घाट का निर्माण भी नगर निगम ने करवाया है।

१६. चेतसिंह घाट का निर्माण पंचकोट के राजा ने करवाया है।

१७. चौकी घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है।

१८. चौसट्ठी घाट वाराणसी घाट का निर्माण उदयपुर के राजा ने करवाया है।

१९. जलसाई घाट का निर्माण उदयपुर के राजा ने करवाया है।

२०. जानकी घाट का निर्माण अशर्फी सिंह ने करवाया है।

२१. जैन घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है।

काशी के घाट भाग – ३ 

काशी के घाट भाग – ३

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। जानकारी के अनुसार ये लगभग ८४ घाट हैं, जो लगभग ४ मील लम्‍बे तट पर बने हुए हैं। यहां के ८४ घाटों में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से ‘पंचतीर्थ’ कहा जाता है। ये हैं असी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट।

२२. तुलसी घाट का निर्माण महंत स्वामीनाथ ने करवाया था, जो कि प्रसिद्ध है गोस्वामी श्री तुलसीदास जी से। इस घाट पर गोस्वामी जी ने श्रीरामचरित मानस के कई अंशों की रचना की थी। कहा जाता है कि तुलसीदास जी ने अपना आखिरी समय इसी स्थल पर व्‍यतीत किया था। जो कि पूर्व में लोलार्क घाट के नाम से जाना जाता था।

२३. तेलियानाला घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया था।

२४. त्रिपुरा भैरवी घाट का निर्माण महाराजा, बनारस ने करवाया था।

२५. त्रिलोचन घाट का निर्माण नारायण दीक्षित ने करवाया था।

२६. दंडी घाट का निर्माण लल्लू जी अग्रवाल ने करवाया था।

२७. दरभंगा घाट का निर्माण महाराजा, दरभंगा ने करवाया था।

२८. दशाश्वमेध का निर्माण नगर निगम ने करवाया है। दशाश्वमेध घाट गोदौलिया से गंगा जाने वाले मार्ग के अंतिम छोर पर पड़ता है। प्राचीन ग्रंथो के मुताबिक़ राजा दिवोदास द्वारा यहाँ दस अश्वमेध यज्ञ कराने के कारण इसका नाम दशाश्वमेध घाट पड़ा। एक अन्य मत के अनुसार नागवंशीय राजा वीरसेन ने चक्रवर्ती बनने की आकांक्षा में इस स्थान पर दस बार अश्वमेध कराया था।

२९. दिग्पतिया घाट का निर्माण दिग्पतिया स्टेट (बंगाल) ने करवाया था।

३०. दुर्गा घाट का निर्माण नारायण दीक्षित ने करवाया था।

३१. धोबिया घाट का निर्माण कुमार स्वामी ने करवाया था।

३२. नंदू घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया था।

३३. नया घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है।

३४. नरवा घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है।

३५. नवला घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है।

३६. नारद घाट का निर्माण दत्तात्रेय स्वामी ने करवाया था।

३७. निरंजनी घाट का निर्माण पंचकोट के राजा ने करवाया था।

३८. निषाद राज घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है।

३९. नेपाली घाट का निर्माण नानही बाबू ने करवाया था।

४०. पंचगंगा घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पंचगंगा घाट से गंगा, यमुना, सरस्वती, किरण व धूतपापा नदियाँ गुप्त रूप से मिलती हैं। इसी घाट की सीढि़यों पर गुरु रामानंद जी से संत कबीरदास ने दीक्षा ली थी।

४१. पक्का घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है।

४२. पांडे घाट का निर्माण बबुआ पांडे ने करवाया था। 

काशी के घाट भाग -४ 

काशी के घाट भाग -४

काशी में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। इनकी गड़ना लगभग ८४ है। ये घाट लगभग ४ मील लम्‍बे तट पर बने हुए हैं। इन ८४ घाटों में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से ‘पंचतीर्थ’ कहा जाता है। ये हैं असी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट।

४३. प्रभुघाट का निर्माण निर्मल कुमार जी ने करवाया था।

४४. प्रयाग घाट का निर्माण रानी हेमन्द कुमारी देवी ने करवाया था।

४५. प्रह्लाद घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया था।

४६. फूटा घाट का निर्माण स्वामी, महेश्वरानंद ने करवाया था।

४७. बच्छराज घाट का निर्माण बाबू शेखर चंद ने करवाया था।

४८. बाजीराव घाट का निर्माण महाराजा, इंदौर ने करवाया था।

४९. बाभाजी घाट का निर्माण माधोराव पेशवा ने करवाया था।

५०. बालाबाई घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया था।

५१. बेनीमाधव घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया था।

५२. ब्रह्म घाट का निर्माण नारायण दीक्षित ने करवाया था।

५३. भदैनी घाट घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया था।

५४. भोंसला घाट का निर्माण महाराजा नागपुर ने करवाया था।

५५. मणिकर्णिका घाट का निर्माण महाराजा, इंदौर ने करवाया था। पौराणिक मान्यताओं से जुड़े मणिकर्णिका घाट का धर्मप्राण जनता में मरणोपरांत अंतिम संस्कार के लिहाज से अत्यधिक महत्त्व है। इस घाट की गणना काशी के पंचतीर्थो में की जाती है। मणिकर्णिका घाट पर स्थित भवनों का निर्माण पेशवा बाजीराव तथा अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था।

५६. माता आनंदमयी घाट का निर्माण लाला बच्छराज ने करवाया था।

५७. मान मंदिर घाट का निर्माण महाराजा, जयपुर ने करवाया था।

५८. मानसरोवर घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया था।

५९. मीर घाट का निर्माण मीर रुस्तम अली ने करवाया था।

६०. मुंशी घाट का निर्माण श्रीधर मुंशी ने करवाया था।

६१. मेहता घाट का निर्माण माधोराव पेशवा ने करवाया था।

६२. मैसूर घाट का निर्माण मैसूर राज्य ने करवाया था।

६३. राज घाट का निर्माण नगर निगम ने करवाया है, जो काशी रेलवे स्टेशन से सटे मालवीय सेतु (डफरिन पुल) के पा‌र्श्व में स्थित है। यहां संत रविदास का भव्य मंदिर भी है।

काशी के घाट भाग – ५