चंदामामा के दो स्तंभ: बी. नागी रेड्डी और चक्रपाणि, जिन्होंने भारतीय बाल-साहित्य का इतिहास रच दिया
“एक की दृष्टि में व्यापार की व्यापकता थी,
दूसरे के विचार में साहित्य की अमरता,
रेड्डी और चक्रपाणि मिले जब,
तो ‘चंदामामा’ बनकर चमकी
भारतीय संस्कृति की नवरस-रसधारा।”
विषय: ‘चंदामामा’ और ‘विजया वाहिनी स्टूडियो’ के संस्थापक बी. नागी रेड्डी एवं चक्रपाणि (अलुरु वेंकट सुब्बाराव) की जीवन-यात्रा
शोध एवं विमर्श: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
विधा: शोधपरक biographical एवं सांस्कृतिक आलेख (कहानी शैली)
दो विचारकों का मिलन और एक सपने का आगाज़
यह कहानी है दो ऐसे दूरदर्शियों की, जिनके बिना बीसवीं सदी के भारतीय सिनेमा और बाल-साहित्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
पहले थे बी. नागी रेड्डी (२ दिसंबर १९१२ – २५ फ़रवरी २००४), जो एक कुशल उद्यमी, दूरदर्शी फ़िल्म निर्माता और निष्ठावान देशभक्त थे। दूसरे थे अलुरु वेंकट सुब्बाराव, जिन्हें पूरा देश उनके साहित्यिक उपनाम ‘चक्रपाणि’ (५ अगस्त १९०८ – २४ सितंबर १९७५) के नाम से जानता है। चक्रपाणि जी एक प्रखर लेखक, अनुवादक और अद्वितीय संपादक थे।
१९४० के दशक में जब मद्रास (चेन्नई) में इन दो महानुभावों की मित्रता हुई, तो यह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था, बल्कि कला और साहित्य के दो ध्रुवों का संगम था। दोनों का एक ही ध्येय था—भारतीय संस्कृति, लोककथाओं और नैतिक मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाना।
जुलाई १९४७: ‘चंदामामा’ का पावन अवतरण
देश की आजादी (अगस्त १९४७) से ठीक एक महीने पहले, जुलाई १९४७ में मद्रास से ‘चंदामामा’ (तेलुगु में चंदमामा) का पहला अंक प्रकाशित हुआ।
बी. नागी रेड्डी ने प्रकाशन का सारा वित्तीय और प्रशासनिक उत्तरदायित्व संभाला, जबकि चक्रपाणि जी इसके प्रधान संपादक बने। चक्रपाणि जी का मानना था कि भारतीय बच्चों को पश्चिमी कथाओं के बजाय अपनी पौराणिक धरोहर—रामायण, महाभारत, उपनिषद्, जातक कथाएँ और पंचतंत्र—सरल और सुबोध भाषा में पढ़नी चाहिए।
चक्रपाणि जी का संपादन इतना सटीक और अद्भुत था कि ‘चंदामामा’ केवल तेलुगु या तमिल तक सीमित नहीं रही। चक्रपाणि जी की देखरेख में इसे हिंदी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, बंगाली, उड़िया, असमिया, पंजाबी, संथाली, अंग्रेजी और यहाँ तक कि सिंधी सहित १३ से अधिक भारतीय भाषाओं में एक साथ प्रकाशित किया जाने लगा। भारत के इतिहास में किसी भी बाल-पत्रिका के लिए यह एक अटूट और अद्वितीय कीर्तिमान है।
विजया वाहिनी स्टूडियो: सिनेमा के क्षितिज पर नागी रेड्डी और चक्रपाणि
‘चंदामामा’ के साथ-साथ इस जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को भी नए आयाम दिए। उन्होंने ‘विजया वाहिनी स्टूडियो’ (Vijaya Vauhini Studios) की स्थापना की, जो उस दौर में एशिया के सबसे बड़े फ़िल्म स्टूडियो में से एक था।
नागी रेड्डी और चक्रपाणि की जोड़ी ने मिलकर ऐसी कालजयी और ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण किया जिन्होंने भारतीय सिनेमा का व्याकरण बदल दिया:
‘पाताळ भैरवी’ (१९५१) — जिसने भारतीय सिनेमा में फैंटेसी और पौराणिक विधा की नींव रखी।
‘माया बाज़ार’ (१९५७) — जिसे आज भी भारतीय सिनेमा की सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिना जाता है।
‘राम और श्याम’ (१९६७) — जिसमें दिलीप कुमार ने दोहरी भूमिका निभाई थी और जो ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई।
‘श्रीमंतुडू’, ‘मिसम्मा’, ‘जुड़वा’ जैसी अनेक सफल फ़िल्में।
राष्ट्रीय सम्मान और अमर विरासत
भारतीय सिनेमा और बाल-साहित्य में अप्रतिम योगदान के लिए बी. नागी रेड्डी जी को वर्ष १९८६ में भारत सरकार द्वारा सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादासाहेब फाल्के पुरस्कार’ से अलंकृत किया गया। इसके अलावा उन्हें ‘पद्म भूषण’ से भी सम्मानित किया गया।
१९७५ में चक्रपाणि जी के निधन के बाद भी, नागी रेड्डी जी ने ‘चंदामामा’ की उस पावन ज्योति को बुझने नहीं दिया और जीवन के अंतिम क्षणों तक इसके सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा की।
निष्कर्ष
बी. नागी रेड्डी और चक्रपाणि जी की यह जोड़ी भारतीय बाल-साहित्य की ‘राम-लक्ष्मण’ की जोड़ी थी। जहाँ नागी रेड्डी जी ने ‘चंदामामा’ रूपी वटवृक्ष को अपनी दृष्टि और संसाधनों से सींचा, वहीं चक्रपाणि जी ने अपनी संपादकीय मेधा से उसमें प्राण फूँके।
यदि ‘चित्रा’ और ‘शंकर’ इस पत्रिका के रंग और रूप थे, तो नागी रेड्डी और चक्रपाणि इसके प्राण और आत्मा थे।
ऐसे महान युगद्रष्टाओं और संस्कृति के संरक्षकों के चरणों में मेरी सहस्र-सहस्र श्रद्धांजलि!
श्रद्धावनत:
विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरूण’
मांगोडेहरी, बक्सर, बिहार
संस्थापक व प्रबंधक: ‘साहित्य सम्मेलन’
चंदामामा के प्रथम शिल्पी ‘चित्रा’: एम.टी.वी. आचार्य की जीवनी और कला-साधना | अश्विनी राय ‘अरुण’