तुलिका का अमर साधक: के.सी. शिवशंकर, जिन्होंने ‘चंदामामा’ के पन्नों पर भारत का बचपन उकेरा
“कंधे पर बेताल, हाथ में तलवार,
और दृढ कदमों की आहट,
जिस रेखांकन ने रचा इतिहास,
वही थी शिवशंकर की तूलिका की आहट।”
विषय: ‘चंदामामा’ के महान चित्रकार पद्मश्री के.सी. शिवशंकर का जीवन एवं कला-यात्रा
श्रद्धांजलि एवं विमर्श: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
विधा: शोधपरक biographical एवं सांस्कृतिक आलेख (कहानी शैली)
१. समय का पहिया और बचपन की वो चमकदार खिड़की
एक समय था जब बच्चों की सुबह और शामें मोबाइल या टीवी की डिजिटल स्क्रीनों से नहीं, बल्कि गत्ते के रंगीन पन्नों वाली ‘चंदामामा’ पत्रिका से रोशन होती थीं। पत्रिका हाथ में आते ही पृष्ठ पलटे जाते और सबसे पहले नज़र टिकती थी उन सम्मोहक, जीवंत और रहस्यमयी चित्रों पर।
उनमें से एक चित्र तो जैसे देश के करोड़ों भारतीयों के अवचेतन मन में सदा के लिए अंकित हो गया—घने, भयावह जंगल की काली रात, राजा विक्रमादित्य के कंधे पर उल्टा लटका बेताल, हाथ में चमकती नंगी तलवार और अडिग संकल्प से आगे बढ़ते राजा के चरण।
लेकिन क्या हमने कभी उस दिव्य शिल्पी के बारे में सोचा, जिसकी उँगलियों ने इस पौराणिक कथा को हमारी आँखों के सामने साकार कर दिया?
उस महान चित्रकार का नाम था—कराथोलुवु चंद्रशेखरन शिवशंकरन, जिन्हें दुनिया ‘चंदामामा शंकर’ या के.सी. शिवशंकर (K.C. Sivasankar) के नाम से जानती है। २९ सितंबर २०२० को जब चेन्नई में ९६ वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, तो केवल एक हाड़-मांस का कलाकार शांत नहीं हुआ, बल्कि भारतीय बाल-साहित्य और पौराणिक चित्रकला का एक पूरा स्वर्णिम युग इतिहास के पन्नों में सिमट गया।
२. इरोड के छोटे से गाँव से मद्रास स्कूल ऑफ आर्ट्स तक: संघर्ष और साधना
१९ जुलाई १९२४ को तमिलनाडु के इरोड जिले के पास एक अत्यंत साधारण और निर्धन परिवार में शिवशंकर का जन्म हुआ। पिता गाँव के ही एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन्हें ड्राइंग पेपर, वाटर कलर या महंगे ब्रश मिल सकें।
परंतु, प्रतिभा जब जन्मजात होती है, तो अभाव भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं। स्कूल में इतिहास की परीक्षा देते समय जब अन्य बच्चे केवल उत्तर लिखते थे, तब बाल शिवशंकर उत्तरों के साथ-साथ ऐतिहासिक पात्रों के जीवंत स्केच भी उत्तर-पुस्तिका के किनारों पर उकेर देते थे। उनके इस हुनर को देखकर शिक्षक आश्चर्यचकित रह जाते।
सप्ताहांत में वे अपने ड्राइंग मास्टर की सहायता करते, और बदले में वह शिक्षक उन्हें कागज़ और रंगों के कुछ टुकड़े दे देता। यही शिवशंकर की सबसे बड़ी वसीयत थी। उनके ड्राइंग मास्टर ने उनकी असाधारण मेधा को पहचान लिया और उन्हें मद्रास (चेन्नई) के ऐतिहासिक ‘गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स’ जाने की सलाह दी।
१९४१ में उन्होंने वहाँ प्रवेश लिया और अगले पाँच वर्षों तक कला की शास्त्रीय बारीकियों को सीखा। सस्ते कागज़ और साधारण इंक से भी अद्भुत कैनवास रचने की उनकी क्षमता ने उनके प्रोफेसरों को आश्चर्यचकित कर दिया था।
३. ‘कलैमगल’ से ‘चंदामामा’ तक: साठ वर्षों का अखंड तप
१९४६ में शिक्षा पूरी करने के बाद, शिवशंकर ने तमिल पत्रिका ‘कलैमगल’ (Kalaimagal) से अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की। लेकिन नियति ने उनके लिए एक बड़ा कैनवास चुन रखा था।
१९४७ में प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता बी. नागी रेड्डी और चक्रपाणि ने मिलकर ‘चंदामामा’ (मूलतः तेलुगु में ‘चंदमामा’) की शुरुआत की थी। देखते ही देखते यह पत्रिका हिंदी, तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी और अंग्रेजी सहित भारत की १३ से अधिक भाषाओं में प्रकाशित होने लगी।
१९५२ में के.सी. शिवशंकर ‘चंदामामा’ से जुड़े। उस दौर में मनोरंजन के साधन नगण्य थे। न टीवी था, न इंटरनेट। ऐसे में हर महीने घर आने वाली ‘चंदामामा’ बच्चों के लिए एक फैंटेसी लोक की तरह थी। और इस फैंटेसी लोक के निर्विवाद राजा थे—के.सी. शिवशंकर। वे १९५२ से लेकर २०१२ तक—लगातार साठ वर्षों तक ‘चंदामामा’ के मुख्य चित्रकार रहे।
चंदामामा के संस्थापक बी. नागी रेड्डी प्रायः कहा करते थे:
“चित्रा (एम.टी.वी. आचार्य/चित्रा) और शंकर ‘चंदामामा’ की बैलगाड़ी के दो बैल हैं। यदि इनमें से एक भी हट जाए, तो यह गाड़ी गाँव तक नहीं पहुँच सकती।”
४. विक्रम-बेताल और पौराणिक कथाओं का रेखांकन: अनुसंधान और कला का अनूठा संगम
१९६० के दशक में जब शिवशंकर ने ‘विक्रम और बेताल’ की कथा शृंखला के लिए मुख्य इलस्ट्रेशन (Illustration) तैयार किया, तो उन्होंने केवल एक चित्र नहीं बनाया, बल्कि भारतीय लोककथा का ‘चेहरा’ तय कर दिया।
शिवशंकर जी का मानना था कि पौराणिक और ऐतिहासिक चित्र बनाना दुनिया का सबसे कठिन काम है। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था:
“एक पौराणिक चित्रकार को केवल रेखाएँ खींचना नहीं आना चाहिए। उसे उस पात्र के युग, उसकी वेशभूषा, आभूषण, मुकुट, स्थापत्य कला (Architecture) और यहाँ तक कि उसके स्वभाव और धर्मशास्त्र की भी गहरी समझ होनी चाहिए।”
उनकी चित्रकला केवल भारतीय शैली तक सीमित नहीं थी। उनकी रेखाओं में भारतीय मूर्तिकला, अजंता-एलोरा के भित्तिचित्र, ओरिएंटल कला और यूरोपीय यथार्थवाद (Realism) का ऐसा अद्भुत समन्वय था कि पात्र कागज़ से निकलकर सामने खड़े महसूस होते थे। उन्होंने केवल विक्रम-बेताल ही नहीं, बल्कि रामायण, महाभारत, जातक कथाओं, पंचतंत्र और उपनिषदों की हज़ारों कथाओं को अपनी तूलिका से अमर कर दिया।
५. ढलती साँझ, पद्मश्री का सम्मान और अमिट विरासत
२०१२ में जब ‘चंदामामा’ का प्रिंट संस्करण बंद हो गया, तब भी शिवशंकर की तूलिका नहीं रुकी। ९० वर्ष से अधिक आयु होने के बावजूद वे ‘रामकृष्ण विजयम’ जैसी आध्यात्मिक पत्रिकाओं के लिए नियमित रूप से चित्र बनाते रहे।
देश ने भले ही उन्हें राष्ट्रीय सम्मान देने में थोड़ा विलंब किया, परंतु अंततः भारत सरकार ने वर्ष २०२१ में उन्हें मरणोपरांत ‘पद्मश्री’ सम्मान से अलंकृत किया। यह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, बल्कि भारत के उस पूरे बचपन का सम्मान था, जो उनके चित्रों को देखकर बड़ा हुआ था।
आज जब बच्चे मोबाइल और डिजिटल स्क्रीन पर 3D और CGI एनिमेशन देखते हैं, तो वे केवल तैयार छवियाँ देखते हैं—उनकी अपनी कल्पनाशक्ति शांत रहती है। लेकिन शिवशंकर जी के दौर में, एक स्थिर रेखाचित्र बच्चे के मन में पूरी कहानी का सिनेमा चला देता था।
जब आज भी किसी पुरानी अलमारी से धूल भरी ‘चंदामामा’ निकलती है, तो उसके पन्ने खोलते ही बीती हुई सदियों का वैभव और हमारा बचपन मुस्कुरा उठता है। यही के.सी. शिवशंकर की सबसे बड़ी विजय है।
ऐसे महान शिल्पी, भारतीय कला के मूक तपस्वी के.सी. शिवशंकर जी के चरणों में मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
श्रद्धावनत:
विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरूण’
मांगोडेहरी, बक्सर, बिहार
संस्थापक व प्रबंधक: ‘साहित्य सम्मेलन’
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