लाला लाजपत राय: ‘पंजाब केसरी’ का राष्ट्रवाद और वैचारिक क्रांति
प्रस्तावना
“पराजय और असफलता कभी-कभी विजय की ओर जरूरी कदम होते हैं।” लाला लाजपत राय जी के ये शब्द आज के भारत के लिए एक चेतावनी भी हैं और प्रेरणा भी। वे भली-भांति जानते थे कि केवल अतीत की जुगाली करना व्यर्थ है। उन्होंने स्पष्ट कहा था, “अतीत को देखते रहना व्यर्थ है, जब तक उस अतीत पर गर्व करने योग्य भविष्य के निर्माण के लिए कार्य न किया जाए।” लाला जी जानते थे कि आने वाला भारत कहीं सपनों की छाँव में खाट बिछाए आलसी न हो जाए, इसलिए उन्होंने कर्म और साहस को नेतृत्व का असली पैमाना माना।
लाल-बाल-पाल: पूर्ण स्वराज की त्रिमूर्ति
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जब ‘नरम दल’ अपनी संवैधानिक सीमाओं में संघर्ष कर रहा था, तब बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय की त्रिमूर्ति ने देश को ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ का स्वप्न दिखाया।
तिलक और लाला जी का संबंध: जहाँ तिलक ने महाराष्ट्र में जन-जागरण किया, वहीं लाला जी ने पंजाब में स्वराज की अलख जगाई। इन दोनों महापुरुषों ने मिलकर कांग्रेस की दिशा को ‘प्रार्थना’ से ‘प्रतिरोध’ की ओर मोड़ा।
पंजाब केसरी: जन्म और वैचारिक पृष्ठभूमि
लाला लाजपत राय जी का जन्म २८ जनवरी, १८६५ को पंजाब के मोगा जिले के एक अग्रवाल परिवार में हुआ था। वे जैन धर्म के अग्रवंश की उस महान परंपरा से थे जिसने हमेशा समाज की सेवा को सर्वोपरि माना। अपनी निर्भीकता के कारण ही वे ‘पंजाब केसरी’ के नाम से विख्यात हुए।
शिक्षा, समाज सुधार और आर्य समाज
लाला जी का योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती के साथ मिलकर पंजाब में आर्य समाज को घर-घर पहुँचाया।
शिक्षा का प्रसार: लाला हंसराज के साथ मिलकर उन्होंने ‘दयानन्द एंग्लो वैदिक’ (DAV) विद्यालयों और कॉलेजों की श्रृंखला खड़ी की, जो आज भी भारत में शिक्षा का प्रमुख स्तंभ हैं।
मानवीय सेवा: अकाल के समय शिविर लगाकर लोगों की सेवा करना हो या दलितों के उत्थान की बात, लाला जी हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहे।
आर्थिक राष्ट्रवाद: PNB और आत्मनिर्भरता
दादाभाई नौरोजी के आर्थिक सिद्धांतों को धरातल पर उतारते हुए लाला जी ने भारतीय पूँजी पर आधारित संस्थानों की नींव रखी। आज का पंजाब नैशनल बैंक (PNB) और लक्ष्मी बीमा कम्पनी उनकी इसी दूरदर्शिता के परिणाम हैं। वे जानते थे कि आर्थिक गुलामी, राजनीतिक गुलामी से कहीं अधिक खतरनाक है।
हिंदी और साहित्य सेवा
लाला जी केवल तलवार और लाठी के नहीं, बल्कि कलम के भी धनी थे। वे हिंदी के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने शिवाजी और श्रीकृष्ण जैसे महापुरुषों की जीवनियाँ हिंदी में लिखकर देश में राष्ट्रीय गौरव का संचार किया। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए उन्होंने व्यापक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया।
अंतिम बलिदान: ब्रिटिश ताबूत की आखिरी कील
३० अक्टूबर, १९२८ का वह मनहूस दिन इतिहास में दर्ज है, जब लाहौर में साइमन कमीशन के विरुद्ध प्रदर्शन करते हुए उन पर बेरहमी से लाठियां बरसाई गईं। घायल लाला जी ने उस समय गर्जना की थी:
“मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।”
उनकी यह भविष्यवाणी सच हुई और उनके बलिदान के २० वर्षों के भीतर ही ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्यास्त हो गया।
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