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चंदामामा के प्रथम शिल्पी ‘चित्रा’: एम.टी.वी. आचार्य, जिन्होंने भारतीय बाल-साहित्य को पहली बार रूप और रंग दिया

 

“जिस रेखांकन ने बाल-मन में सपनों के बीज बोया,

जिसकी तूलिका ने ‘चंदामामा’ के पहले पन्ने को संजोया।”

 

विषय: ‘चंदामामा’ के संस्थापक मुख्य चित्रकार एम.टी.वी. आचार्य (‘चित्रा’) की जीवन-गाथा

शोध एवं विमर्श: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

विधा: शोधपरक biographical एवं सांस्कृतिक आलेख (कहानी शैली)

 

१. वो पहला पन्ना और ‘चित्रा’ का अविर्भाव

जुलाई १९४७। देश आज़ादी की देहलीज पर खड़ा था। उसी ऐतिहासिक दौर में दक्षिण भारत से एक ऐसी पत्रिका का जन्म हो रहा था, जिसने आगे चलकर भारत की १३ से अधिक भाषाओं में करोड़ों बच्चों के बचपन को गढ़ा—’चंदामामा’।

जब पत्रिका के संस्थापक बी. नागी रेड्डी और चक्रपाणि ने इस पत्रिका की परिकल्पना की, तो उनके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि ‘चंदामामा’ का चेहरा कैसा होगा? पत्रिका का लोगो (Logo) कैसा दिखेगा? पौराणिक राजा, रक्षक, राक्षस और गाथाओं के पात्र किस शैली में उकेरे जाएँगे?

इस ऐतिहासिक दायित्व के लिए जिस साधक को चुना गया, वे थे मैसूर की माटी से उपजे महान चित्रकार एम.टी.वी. आचार्य (M.T.V. Acharya), जिन्हें पूरी दुनिया ने उनके उपनाम ‘चित्रा’ (Chitra) के रूप में पूजा।

 

२. मैसूर की कला-परंपरा से ‘चित्रा’ बनने का सफर

१९१० में कर्नाटक के मैसूर में जन्मे मैसूर थिम्मप्पय्या वेंकटप्पय्या आचार्य (M.T.V. Acharya) का बचपन मैसूर पैलेस की भव्य चित्रकला और शास्त्रीय परिवेश के बीच बीता। मैसूर शैली की पारंपरिक चित्रकारी—जिसमें सूक्ष्म रेखाएँ, आभूषणों की बारीक नक्काशी और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है—आचार्य जी के रग-रग में बसी हुई थी।

जब १९४७ में बी. नागी रेड्डी ने उन्हें मद्रास (चेन्नई) आमंत्रित किया और ‘चंदामामा’ का मुख्य चित्रकार (Chief Illustrator & Art Director) नियुक्त किया, तो आचार्य जी ने अपने वास्तविक नाम के बजाय एक छोटा और कलात्मक नाम चुना—’चित्रा’।

‘चंदामामा’ के शुरुआती ५-६ वर्षों (१९४७ से १९५२ तक) में जितने भी मुख्य पृष्ठ (Cover Pages), शीर्षक चित्र, और पौराणिक कहानियों के रेखांकन छपे, उन सभी के कोने पर केवल एक हस्ताक्षर होता था—’Chitra’।

 

३. ‘विक्रम-बेताल’ और ‘चंदामामा’ का सिग्नेचर स्टाइल

बहुत कम लोग जानते हैं कि ‘चंदामामा’ का सुप्रसिद्ध शीर्षक लोगो (Title Design), जिसमें चंद्रमा के भीतर से झांकते हुए पात्र दिखाई देते हैं, उसकी मूल परिकल्पना आचार्य ‘चित्रा’ जी ने ही की थी।

इसके अलावा, ‘विक्रम और बेताल’ का वह ऐतिहासिक ढाँचा—कंधे पर बेताल को लादे राजा विक्रम का पहला स्वरूप—भी सबसे पहले ‘चित्रा’ जी की तूलिका से ही निकला था। उन्होंने अजंता के भित्तिचित्रों और भारतीय मूर्तिकला का अध्ययन करके पात्रों के मुकुट, धोती, आभूषण और राजसी चाल-ढाल का एक ऐसा मापदंड (Template) तैयार किया, जिसे बाद में के.सी. शिवशंकर (‘शंकर’) और अन्य कलाकारों ने आगे बढ़ाया।

 

४. बी. नागी रेड्डी का कथन और ‘बैलगाड़ी का पहला बैल’

जब १९५२ में के.सी. शिवशंकर (‘शंकर’) चंदामामा से जुड़े, तो ‘चित्रा’ और ‘शंकर’ की जोड़ी ने मिलकर एक नया इतिहास रचा। इन दोनों की कलात्मक जुगलबंदी को देखकर ही चंदामामा के संस्थापक बी. नागी रेड्डी ने वह अमर वाक्य कहा था:

“चित्रा और शंकर ‘चंदामामा’ की बैलगाड़ी के दो बैल हैं। यदि इनमें से एक भी हट जाए, तो यह गाड़ी गाँव तक नहीं पहुँच सकती।”

आचार्य ‘चित्रा’ जी ने न केवल बाल-साहित्य को सजाया, बल्कि भारतीय पौराणिक पात्रों को एक ऐसी शास्त्रीय गरिमा दी जो न तो अति-काल्पनिक थी और न ही पश्चिमी प्रभावों से दूषित।

 

५. ‘आचार्य चित्रकला भवन’ और कला-साधना का विस्तार

१९५० के दशक के मध्य में, चंदामामा में अपनी अमिट छाप छोड़ने के बाद, एम.टी.वी. आचार्य बेंगलुरु लौट आए। वे केवल स्वयं चित्र बनाकर संतुष्ट होने वाले कलाकार नहीं थे; वे भावी पीढ़ियों को कला सिखाना चाहते थे।

बेंगलुरु में उन्होंने ‘आचार्य चित्रकला भवन’ की स्थापना की। यह कोई व्यावसायिक अकादमी नहीं थी, बल्कि कला का एक ऐसा गुरुकुल था जहाँ डाक के माध्यम से (Distance/Postal Art Education) और प्रत्यक्ष रूप से हज़ारों निर्धन व मेधावी युवाओं को चित्रकला का प्रशिक्षण दिया गया। दक्षिण भारत के सैकड़ों प्रसिद्ध चित्रकारों और इलस्ट्रेटर्स ने आचार्य जी के इसी गुरुकुल से कला की वर्णमाला सीखी।

१९९२ में जब इस महान कला-ऋषि ने अंतिम साँस ली, तब तक वे भारत की तीन पीढ़ियों के अवचेतन में रंगों के माध्यम से जीवित हो चुके थे।

 

६. निष्कर्ष

एम.टी.वी. आचार्य ‘चित्रा’ केवल एक चित्रकार नहीं थे, वे भारतीय बाल-साहित्य के ‘विश्वकर्मा’ थे। यदि उन्होंने ‘चंदामामा’ की नींव न रखी होती, तो शायद वह पत्रिका भारतीय संस्कृति का वह जीवंत दस्तवेज़ न बन पाती जिसे आज हम याद करते हैं।

ऐसे युगद्रष्टा और कला-महर्षि एम.टी.वी. आचार्य ‘चित्रा’ जी के चरणों में मेरी सहस्र-सहस्र श्रद्धांजलि!

 

श्रद्धावनत:

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरूण’

मांगोडेहरी, बक्सर, बिहार

संस्थापक व प्रबंधक: ‘साहित्य सम्मेलन’

 

 

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