images (1)

भर्तृहरि का जीवन: भोग, वैभव और पीड़ा से चैतन्य की ओर

 

प्रस्तावना
भर्तृहरि ने सब कुछ देखा, सब कुछ जिया। वे एक ऐसे राजा थे जिनके पास वैभव था, प्रेम था और सत्ता का शिखर था। लेकिन उनके जीवन की यात्रा केवल राज-पाट तक सीमित नहीं रही; यह यात्रा ‘भोग से योग’ और ‘मोह से मोक्ष’ की एक जीवंत गाथा है। बहुत कम लोग इतने पक कर संसार छोड़ते हैं, जितना भर्तृहरि ने छोड़ा। उन्होंने संसार की एक-एक बूंद निचोड़ ली, पर अंत में पाया—सब शून्य, सब सपने।

 

शृंगार से वैराग्य: दो शतक का दर्शन
भोग के दिनों में उन्होंने “शृंगार-शतक” लिखा, जो प्रेम और सौंदर्य का अनसूया शास्त्र है। यह किसी कोरे विचारक की बातें नहीं थीं, बल्कि एक अनुभवी की अनुभव-सिद्ध वाणी थी। शृंगार-शतक में उन्होंने संसार का सारा सार समाया।
परंतु, जब प्रेम में छलावा मिला और अपनों के रक्त से हाथ सने, तो मन थक गया। भर्तृहरि जंगल की ओर चल पड़े। वहाँ उन्होंने “वैराग्य-शतक” लिखा—वैराग्य का वह शास्त्र जिसका विश्व साहित्य में कोई मुकाबला नहीं। भोग को जाना तो भोग की पूरी बात की, वैराग्य को जाना तो वैराग्य की पूरी बात की।

 

नीति-शतक: जीवन प्रबंधन के सूत्र
इन दोनों के बीच भर्तृहरि ने समाज और व्यवहार को समझने के लिए “नीति-शतक” की रचना की। यह ग्रंथ आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनके कुछ सूत्र अमर हैं:
विवेकहीनता का पतन: “विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः” अर्थात विवेक से गिरे हुए व्यक्ति का पतन सैकड़ों प्रकार से होता है।
मूर्खता का उपचार: वे कहते हैं कि दुनिया में हर बीमारी की दवा है, पर मूर्खता का कोई इलाज नहीं।
परोपकार: उन्होंने सिखाया कि वही हाथ सुंदर हैं जो दान देते हैं, न कि वे जो केवल आभूषणों से सजे हैं।

 

हीरे का दृष्टांत: साक्षी भाव का जागरण
एक दिन जंगल में एक चट्टान पर बैठे भर्तृहरि ने जीवन का सबसे बड़ा सत्य देखा। सूरज की सुनहरी किरणों के बीच धूल में पड़ा एक हीरा चमक रहा था। दो घुड़सवार वहां पहुँचे और उस हीरे के लिए आपस में लड़ मरे। दोनों की लाशें लहूलुहान जमीन पर थीं, और वह ‘निर्दोष पत्थर’ वहीं पड़ा रहा।
भर्तृहरि देखते रहे। एक क्षण को उनकी वासना जागी थी, पर तुरंत ही साक्षी भाव जाग गया। उन्होंने सोचा—”अरे पागल! इसी चमक के पीछे तूने भी कभी अपना संसार जलाया था।” उस एक पत्थर ने उन्हें समझा दिया कि संसार की हर चमक के पीछे अंततः मृत्यु और विषाद खड़ा है। एक के लिए वह पत्थर वैराग्य बन गया और दो के लिए मौत।

 

जीवन का गहरा सत्य: चैतन्य ही सूत्र
भर्तृहरि बैठे-बैठे जीवन के सारे अनुभव से गुजर गए—भोग के, नीति के और वैराग्य के। उन्होंने उपनिषद के सूत्र “तेन त्यक्तेन भुंजीथा:” को जी कर दिखाया—अर्थात जो छोड़ने योग्य है, उसे छोड़कर ही वास्तविक भोग (आनंद) को जाना जा सकता है।

 

निष्कर्ष:
भर्तृहरि का जीवन हमें सिखाता है कि जीवन का सबसे गहरा सत्य तुम्हारा चैतन्य है। सारा खेल वहीं है। संसार के सारे सूत्र तुम्हारे भीतर हैं। जब साक्षी भाव जागता है, तो पत्थर पत्थर हो जाता है और आत्मा परमात्मा।

 

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *