खिड़की: एक आत्म-साक्षात्कार
खिड़की से जब बाहर झांकता हूँ,
यादें चुपके से पास चली आती हैं।
दिखते हैं कुछ पुराने अज़ीज़ दोस्त,
तो कुछ अपने ही दोष नज़र आते हैं।
खिड़की के बाहर कुछ प्रफुल्लित प्रसंग हैं,
तो कुछ भयावह स्मृतियों के घेरे भी।
पर इस खिड़की से बाहर देखना भाता है,
जैसे जीवन में प्रवेश कर कोई,
खिड़की से खुद को ही ताकता है।
बाहर प्राणवायु सी बहती खुली हवा है,
तो खिली है सुनहरी जीवन की धूप।
जहाँ फैली है वह पावन स्वतंत्र रोशनी,
उसे लूटने को खड़े हैं कतार में बड़े-बड़े भूप।
बाहर दूर तलक फैली है उम्र की ज़मीन,
उसे भटकाने या फिर समेट लेने को—
तान रखा है आकांक्षाओं ने अपना आकाश,
जहाँ उम्मीद उम्र के साथ अक्सर भटकती है,
और टूट जाते हैं समय के कुछ सुरीले तार।
कभी डर जाता हूँ, तो कभी उद्वेलित हो उठता हूँ,
और सहसा घबराकर खिड़की बंद कर देता हूँ।
सोचता हूँ शायद समय यहीं ठहर गया होगा,
फिर अपनी मूर्खता पर ज़ोर से हँस देता हूँ।
खोल देता हूँ किवाड़, फिर उसी उत्साह से,
देखता हूँ कि ज़िंदगी तो कहीं रुकी ही नहीं थी।
वो तो एक निरंतर चलचित्र की भाँति,
खिड़की के पार फिर से… चलने लगी थी।