समीक्षा: चलती का नाम गाड़ी (१९५८) एक ‘फ्लॉप’ होने की चाहत, जो ‘ब्लॉकबस्टर’...
वो भी क्या मुसाफ़िरी, जो बस मंज़िल तक पहुँचा दे, मज़ा तो उस रास्ते...
।। अवधपुरी का प्रकाश ।। भय प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी, बक्सर की...
वंदे मातरम! वंदे मातरम! यही मंत्र है, यही तंत्र है, मुक्ति का उल्लास,...
अंगूठों की थिरकन में, दिन गुज़र जाते हैं, अपनों के पास होकर भी, दूर...
सामने रोशन मंच सजा, किरदार बुलाते हैं, झूठी हँसी के गहने, सबको यहाँ सुहाते...
सच नंगा फिरता है, कोई पास नहीं आता, रेशम पहने झूठे से, हर कोई...
भीड़ भरी दुनिया में, मैं तन्हा सा रहता हूँ, खामोशी की चादर ओढ़े, मन...
सिग्नल की चार लकीरें, जब मरघट सी सो जाती हैं, जुड़ी हुई ये सारी...
किताबों की सूखी हुई वो महक याद है, बिना बात के ही खिलखिलाना याद...