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प्रेम आखों कि ईनायत है
वो दिल कि बरकत है
वो उपजता है चोर निगाहों से
घायल मगर दिल हो जाता है

चोरी कि सजा
अकेलेपन कि मुहताज है
ये सच में प्रेम है या
आकर्षण बेआवाज है

जैसे शीशे में कैद हों सूरज
अथवा आईने में तेरी सूरत
मैं देखता हूं चोर निगाहों से
दिल में बसा लेता हूं तेरी मूरत

बस एक एहसास ऐसा है
जैसे विस्मय में सुकून है
ब्रह्मांड कदमों में पड़ा हो
और चाँद पाने का जुनून है

चोरी के प्रेम में
अथवा प्रेम कि चोरी में
अजीब समानता आज दिखी है
जैसे संबंध की सोच से जान पड़ी है

अश्विनी राय ‘अरुण’

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