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आज हम बात करने वाले हैं, एक समाचारपत्र के बारे में, जिसका नाम है… केसरी! जी हां वही केसरी जिसे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने स्थापना की थी।

प्रकार : दैनिक समाचारपत्र
प्रारूप : मुद्रण
स्वामित्व/प्रकाशक : केसरी महरट्टा ट्रस्ट
संस्थापना : ४ जनवरी, १८८१

परिचय…

केसरी का मराठी भाषा में शाब्दिक अर्थ शेर होता है और यह मराठी भाषा का ही एक समाचारपत्र है, जिसकी स्थापना ४ जनवरी, १८८१ को में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने इस पत्र का उपयोग भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वाणी देने के लिये की थी। यह समाचारपत्र आज भी तिलक जी के वंशजों एवं केसरी महरट्टा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित होता है।

राजनीतिक चेतना…

केसरी के साथ तिलक जी ने एक और साप्ताहिक समाचार पत्र, जो अंग्रेज़ी में था ‘द मराठा’ का प्रकाशन शुरू किया। इन दोनों साप्ताहिक पत्रों के माध्यम से उन्होंने लोगों की राजनीतिक चेतना को जगाने का काम शुरू किया। इन समाचार पत्रों के ज़रिये ब्रिटिश शासन तथा उदार राष्ट्रवादियों की, जो पश्चिमी तर्ज़ पर सामाजिक सुधारों एवं संवैधानिक तरीक़े से राजनीतिक सुधारों का पक्ष लेते थे, कटु आलोचना के लिए वह विख्यात हो गए। तिलक जी का मानना था कि सामाजिक सुधार में जनशक्ति खर्च करने से वह स्वाधीनता के राजनीतिक संघर्ष में पूरी तरह नहीं लग पाएगी।

छपाई…

उन पत्रों ने देसी पत्रकारिता के क्षेत्र में शीघ्र ही अपना विशेष स्थान बना लिया। विष्णु शास्त्री चिपलूनकर ने इन दोनों समाचारपत्रों के लिए दो मुद्रणालय भी स्थापित किए। छपाई के लिए ‘आर्य भूषण’ और ‘ललित कला’ को प्रोत्साहन देने के वास्ते ‘चित्रशाला’ दी गई। कुछ ही समय में ‘मराठा’ और ‘केसरी’ डेक्कन के प्रमुख समाचारपत्र बन गए।

केसरी और मराठा में प्रकाशित कुछ लेखों में कोल्हापुर के तत्कालीन महाराजा शिवाजी राव के साथ किए गए व्यवहार की कठोर आलोचना की गई थी। राज्य के तत्कालीन प्रशासक ‘श्री एम. डब्ल्यू. बर्वे’ ने इस पर मराठा और केसरी के संपादक के रूप में क्रमश: तिलक और श्री आगरकर के विरुद्ध मानहानि का मुक़दमा चला दिया। कुछ समय बाद इन लोगों की कठिनाइयाँ और बढ़ गईं क्योंकि जब यह मामला विचाराधीन था, तभी ‘श्री वी.के. चिपलूनकर जी’ का देहांत हो गया। उसके बाद ‘तिलक’ और ‘आगरकर’ को दोषी पाया गया। उन्हें चार-चार महीने की साधारण क़ैद की सज़ा सुना दी गई।

तिलक और आगरकर के मध्य मतभेद…

वर्ष १८८८ के दौरान तिलक और आगरकर के मध्य सामाजिक और धार्मिक प्रश्नों पर मतभेद शुरू हो गए। इसकी वजह से ‘श्री आगरकर’ ने ‘केसरी’ के सम्पादक पद से इस्तीफा दे दिया और अपने पत्र सुधारक का प्रकाशन शुरू किया। इधर प्रो. केलकर को दोनों पत्रों का प्रभारी संपादक बना दिया गया।

परंतु शीघ्र ही प्रो. केलकर को समाचारपत्र के साथ अपना संबंध पूरी तरह समाप्त कर देना पड़ा। तब तिलक दोनों पत्रों के संपादक बन गए। तिलक ‘केसरी’ और ‘मराठा’ समाचारपत्रों के एकमात्र मालिक और संपादक हो गए। इस तरह दोनों समाचारपत्रों को अपने जन्म के बाद से अनेकों उतार-चढ़ावों से गुज़रना पड़ा। परंतु तिलक जी के द्वारा केसरी को संभालने के बाद से ही उसकी ग्राहक संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई। उन दिनों इसकी ग्राहक संख्या देश के किसी भी अन्य समाचारपत्र की ग्राहक संख्या से बहुत अधिक थी।

अपनी बात…

तिलक जी ने केसरी में “देश का दुर्भाग्य” नामक शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसमें ब्रिटिश सरकार की नीतियों का कड़ा विरोध किया गया था। परिणाम स्वरूप उन्हें ६ वर्ष के कठोर कारावास के अंतर्गत वर्मा के मांडले जेल में बंद कर दिया गया।

विशेष…

१. वर्ष १८७० में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय दंड संहिता में धारा १२४-ए जोड़ा जिसके अंतर्गत “भारत में विधि द्वारा स्थापित ब्रिटिश सरकार के प्रति विरोध की भावना भड़काने वाले व्यक्ति को ३ वर्ष की कैद से लेकर आजीवन देश निकाला तक की सजा दिए जाने का प्रावधान था।”

२. तिलक जी को भारतीय दंड संहिता की धारा १२४-ए के अंतर्गत राजद्रोह के अभियोग में २७ जुलाई, १८९७ को गिरफ्तार कर लिया गया था।

३. कारावास के दौरान तिलक जी ने “आर्कटिक होम आफ द वेदाज” तथा “गीता रहस्य” नामक ग्रंथ की रचना की।

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