राम! राम! राम!
पिछले तीन भागों में हमने ई.वी. रामास्वामी पेरियार के जीवन, उनकी राजनीतिक यात्रा और उनकी पुस्तक ‘सच्ची रामायण’ की विवादित प्रस्तावना का विश्लेषण किया। पेरियार ने रामायण को एक ‘आर्य-द्रविड़’ युद्ध के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। लेकिन क्या ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और भाषाई साक्ष्य उनके दावों का समर्थन करते हैं? आइए, सत्य की गहराई में उतरते हैं।
१. आर्य-द्रविड़ सिद्धांत: एक औपनिवेशिक मिथक
पेरियार के तर्कों का मुख्य आधार ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ (Aryan Invasion Theory) था। यह सिद्धांत ब्रिटिश शासन के दौरान मैक्स मूलर जैसे विचारकों द्वारा गढ़ा गया था ताकि भारतीयों को ‘उत्तर’ और ‘दक्षिण’ में विभाजित किया जा सके।
सत्य: आधुनिक DNA शोध (जैसे राखीगढ़ी और जीनोम अध्ययन) यह प्रमाणित कर चुके हैं कि भारत के लोगों का मूल एक ही है। उत्तर और दक्षिण भारतीयों के पूर्वज अलग-अलग नस्ल के नहीं थे। पेरियार जिस ‘नस्लीय श्रेष्ठता’ या ‘विभाजन’ की बात कर रहे थे, वह एक वैज्ञानिक झूठ (Scientific Myth) के सिवाय कुछ नहीं था।
२. रावण: द्रविड़ राजा या ब्राह्मण पुत्र?
पेरियार ने रावण को ‘तमिल/द्रविड़ नायक’ के रूप में पेश किया, लेकिन रामायण और पुराणों के अनुसार रावण की वंशावली कुछ और ही कहती है:
पितृवंश: रावण के पिता महर्षि विश्रवा थे, जो महान ऋषि पुलस्त्य के पुत्र और ब्रह्मा के प्रपौत्र थे। वे स्पष्ट रूप से उत्तर भारतीय ब्राह्मण थे।
मातृवंश: उनकी माता कैकसी राक्षस कुल की थीं।
अतः रावण को केवल ‘द्रविड़’ कहना ऐतिहासिक और शास्त्रीय रूप से गलत है। वह एक महान विद्वान और शिव भक्त था, जिसका सम्मान स्वयं राम ने भी किया था।
३. ‘वानर’ और ‘राक्षस’: कोई अपमान नहीं, बल्कि विशिष्ट पहचान
पेरियार का आरोप था कि दक्षिण के लोगों को ‘बंदर’ (वानर) और ‘राक्षस’ कहकर अपमानित किया गया।
सत्य: संस्कृत में ‘वानर’ का एक अर्थ ‘वन-नर’ (वन में रहने वाले मनुष्य) भी होता है। हनुमान जी को वेदों का ज्ञाता और व्याकरण का पंडित कहा गया है। यदि वे ‘बंदर’ मात्र होते, तो आज भारत के हर कोने (उत्तर से दक्षिण तक) में वे भगवान के रूप में न पूजे जाते।
इसी प्रकार, ‘राक्षस’ शब्द उनकी तामसी प्रवृत्ति और आचरण के कारण था, न कि उनकी भौगोलिक स्थिति के कारण। विभीषण भी उसी कुल के थे, लेकिन वे राम के परम मित्र और आज भी पूजनीय हैं।
४. राम: उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाले सेतु
पेरियार ने राम को ‘उत्तर भारतीय हमलावर’ कहा। परंतु, रामायण का भूगोल इसके विपरीत है। राम ने अयोध्या से रामेश्वरम तक की यात्रा में किसी भी क्षेत्र को ‘जीतकर’ अपनी सत्ता नहीं जमाई।
बाली वध: उन्होंने बाली को मारकर सुग्रीव को राजा बनाया।
लंका विजय: रावण का वध करने के बाद उन्होंने विभीषण को राजपाठ सौंपा।
राम ने कभी दक्षिण पर शासन करने की चेष्टा नहीं की, बल्कि उन्होंने उत्तर और दक्षिण को भक्ति और नैतिकता के एक सूत्र में बांध दिया।
निष्कर्ष: सत्यमेव जयते
‘सच्ची रामायण’ जैसे ग्रंथों का उद्देश्य सत्य की खोज नहीं, बल्कि वैचारिक विद्वेष और अलगाववाद को बढ़ावा देना था। राम और रामायण भारत की सांस्कृतिक अखंडता के प्रतीक हैं। कम्ब रामायण (तमिल), रंगनाथ रामायण (तेलुगु) और अध्यात्म रामायण (मलयालम) इस बात का प्रमाण हैं कि दक्षिण भारत ने राम को कभी ‘बाहरी’ नहीं माना, बल्कि अपना आराध्य माना।
राम न उत्तर के हैं, न दक्षिण के; राम संपूर्ण चराचर जगत के हैं।