॥ राम भारत के पूर्णत्व ॥
उत्तर की ऊँची चोटी से,
दक्षिण के सागर-संगम तक,
हर कंकड़ में जो प्राण फूँक दे,
उस गौरवमय उद्गम तक।
राम नहीं केवल इक नाम,
राम भारत की धड़कन हैं,
राम सनातन की मर्यादा,
राम राष्ट्र का वन्दन हैं।
भारत की आत्मा में राम हैं…
जब-जब संकट की छाया ने,
इस पावन भू को घेरा है,
राम-नाम की उजियाली ने,
लाया नया सवेरा है।
कहीं कम्ब की मधुर ऋचा में,
कहीं तुलसी की चौपाई,
राम बसे हैं शबरी के घर,
और निषाद की परछाई।
न भाषा ने बाँधा इनको,
न भूगोल की सीमा ने,
राम को पाया श्रद्धा ने,
राम को खोया अभिमानी ने।
झूठे तर्क, मिथ्या कुचक्र,
सब धूल समान उड़ जाएँगे,
जब तक बहती गंगा-रेवा,
राम यहीं रह जाएँगे।
राम में ही भारत का पूर्णत्व है…
सरयू का जो धीर नीर है,
रामेश्वर का कंकण है,
राम ही इस धरती का संयम,
राम ही युग का दर्पण हैं।
अखंड भारत के प्राणों में,
जो शौर्य सतत मुसकाता है,
राम वही हैं जिनके पथ पर,
यह राष्ट्र स्वयं को पाता है।
राम ही आदि, राम ही अंत,
राम ही पूर्ण सत्य का सार,
राम बिना भारत अधूरा,
राम ही हैं जग का आधार।