॥ मकर संक्रांति: सांस्कृतिक एकात्मकता का पर्व ॥
तिल-गुड़ की मिठास और पतंगों की उड़ान,
सूर्य ने बदला मार्ग, अब जागा है हिंदुस्तान।
शिशिर की विदाई हुई, अब बसंत की बारी है,
विविधता में एकता की, यह दिव्य चित्रकारी है।
कहीं ‘खिचड़ी’ की महक है, कहीं ‘उत्तरायण’ की शान,
कहीं ‘लोहड़ी’ की अग्नि में, झूम रहा सारा जहान।
बिहार-झारखंड मनाते ‘संक्रांति’ का पावन स्नान,
यूपी के ‘खिचड़ी’ पर्व में, छिपा है प्रेम का दान।
आसाम का ‘बीहू’ नाचे, बंगाल की ‘पौष’ है आई,
महाराष्ट्र में ‘तिल-गुड़’ की, सबने है कसम खाई।
आंध्र की ‘पेड़ा पंडुया’, कर्नाटक ‘मकरा संक्रमना’,
तमिलनाडु के ‘पोंगल’ में, सूर्य को शीश झुकाना।
केरल की ‘मकरा विलक्कू’, जो ज्योति का प्रकाश है,
उत्तराखंड की ‘घुघतिया’ में, पहाड़ों का विश्वास है।
नाम भले हैं सौ यहाँ, पर भाव वही है एक पावन,
सूर्य देव की कृपा बरसे, जैसे सावन का हो मन।
कहे अश्विनी कि जीवन में, सूर्य सा तेज समाए,
मकर संक्रांति की आपको, हृदय से शुभकामनाएँ!
विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’