राम! राम! राम!
पिछले पाँच भागों में हमने पेरियार के जीवन, उनकी विवादित पुस्तक, उनके नस्लीय सिद्धांतों और रामायण की तार्किक समीक्षा की यात्रा की। इस विस्तृत विवेचन के बाद अब समय है उस सत्य को समझने का, जो पेरियार जैसे मिथ्याकारों के तमाम विरोधों के बावजूद हज़ारों वर्षों से अटल खड़ा है।
१. राम: राजनीति नहीं, राष्ट्र की आत्मा
पेरियार ने राम को एक राजनैतिक मोहरे के रूप में देखा और उन्हें उत्तर-दक्षिण के विवाद में झोंकने की कोशिश की। परंतु, राम किसी सत्ता का नाम नहीं हैं; वे इस राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से कटक तक, राम एक ऐसा धागा हैं जिसने भारत की विविधता को ‘एकता’ के मणियों में पिरोया है। जब एक दक्षिण भारतीय रामेश्वरम में जल चढ़ाता है और एक उत्तर भारतीय धनुषकोटि के दर्शन की अभिलाषा रखता है, तो वह किसी ‘आर्य विजेता’ की नहीं, बल्कि अपने आराध्य की शरण में होता है।
२. विरोध की लहरें और मर्यादा का हिमालय
इतिहास गवाह है कि समय-समय पर राम के अस्तित्व और उनके चरित्र पर प्रहार किए गए। कभी उन्हें काल्पनिक कहा गया, कभी उन्हें शोषक बताया गया। ‘सच्ची रामायण’ जैसे ग्रंथ इसी नकारात्मक विचारधारा की उपज थे। परंतु, जैसे हिमालय पर धूल फेंकने से हिमालय की ऊंचाई कम नहीं होती, वैसे ही कुतर्कों से राम की मर्यादा धूमिल नहीं हो सकती। पेरियार का आंदोलन कुछ दशकों तक राजनैतिक शोर तो मचा सका, लेकिन वह दक्षिण भारत के घरों में जलने वाले राम-नाम के दीपों को बुझा नहीं सका।
३. आधुनिक समय में राम की प्रासंगिकता
आज जब समाज फिर से जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर बँटने की कोशिश कर रहा है, तब राम का ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ स्वरूप और भी आवश्यक हो गया है।
राम वह हैं जो सत्ता छोड़कर वन जाने में संकोच नहीं करते (त्याग)।
राम वह हैं जो गिद्ध राज जटायु का अंतिम संस्कार अपने पिता की तरह करते हैं (करुणा)।
राम वह हैं जो वानर और भालुओं को संगठित कर अधर्म का विनाश करते हैं (सामूहिक शक्ति)।
४. अंतिम निष्कर्ष: सत्यमेव जयते
‘सच्ची रामायण’ का सच यह है कि वह ‘सत्य’ नहीं, बल्कि ‘असूया’ (ईर्ष्या) पर आधारित थी। पेरियार ने रामायण के अक्षरों को तो पढ़ा, लेकिन उसके भाव को नहीं समझ सके। राम किसी भौगोलिक सीमा में नहीं बँधे हैं। वे थाईलैंड के ‘रामाकियन’ में हैं, इंडोनेशिया के ‘काकाविन’ में हैं और कम्ब के ‘इरामावतारम’ में हैं।
राम भारत की वह शक्ति हैं जो हर युग में विरोधियों के मिथ्या प्रलाप को शांत कर, ‘सत्य’ और ‘धर्म’ की विजय का उद्घोष करती है। यह श्रृंखला इस विश्वास के साथ समाप्त होती है कि सनातनी संस्कृति का यह गौरवपुंज सदैव अखंड रहेगा।
भारत की आत्मा में राम हैं, और राम में ही भारत का पूर्णत्व है।
जय श्री राम