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मैथिली उपन्यास जगत् के श्लाका पुरुष: केदारनाथ चौधरी का जीवन और साहित्यिक अवदान

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: लोकभाषा और आधुनिक चेतना के शिल्पी

​मैथिली साहित्य के आधुनिक इतिहास में केदारनाथ चौधरी एक ऐसा देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी अनूठी दृष्टि और लोकभाषा के अनूठे प्रयोग से मैथिली उपन्यास जगत् को एक नया धरातल प्रदान किया। उन्हें मैथिली उपन्यास संसार का ‘श्लाका पुरुष’ (शिखर पुरुष) माना जाता है। केदारबाबू ने अपनी कृतियों का मुख्य आधार महलों या काल्पनिक दुनिया को नहीं, बल्कि सीधे आम जनमानस की ठेठ लोकभाषा को बनाया। यही कारण है कि उनके उपन्यासों के पात्र केवल पन्नों पर नहीं सिमटते, बल्कि सीधे पाठकों के जेहन में हमेशा के लिए बस जाते हैं। उन्होंने पारंपरिक बंधनों से इतर, हमेशा नई पीढ़ी के नजरिए और आधुनिक सामाजिक सरोकारों को केंद्र में रखकर अपनी कालजयी रचनाएँ लिखीं।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

​मैथिली के इस अनन्य साधक का जन्म ३ जनवरी, सन १९३६ को बिहार के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से अत्यंत समृद्ध केंद्र ‘दरभंगा’ में हुआ था। मिथिला की सांस्कृतिक आबोहवा और विदेह की इस धरती के संस्कारों ने उनके भीतर बचपन से ही कला और साहित्य के प्रति एक गहरा अनुराग पैदा कर दिया था, जो आगे चलकर उनकी लेखनी के माध्यम से वैश्विक पटल पर प्रकट हुआ।

वैश्विक शिक्षा एवं बहुआयामी कार्य-क्षेत्र

​केदारनाथ चौधरी जी की शैक्षणिक और व्यावसायिक यात्रा विस्मयकारी और अत्यंत प्रेरणादायी रही है। वे केवल साहित्य के मनीषी नहीं थे, बल्कि अर्थशास्त्र और कानून के भी प्रकांड विद्वान थे। उनकी शैक्षणिक और कार्य-यात्रा की कड़ियाँ इस प्रकार हैं:

प्रारंभिक उच्च शिक्षा: उन्होंने वर्ष १९५८ में अर्थशास्त्र विषय से स्नातकोत्तर (M.A.) की उपाधि प्राप्त की। इसके ठीक अगले वर्ष, यानी वर्ष १९५९ में उन्होंने कानून (LL.B.) की उच्च शिक्षा पूर्ण की।

​अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सफर: उच्च शिक्षा की ललक उन्हें सात समंदर पार ले गई। वर्ष १९६९ में उन्होंने अमेरिका के विख्यात ‘कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय’ से अर्थशास्त्र में एक बार फिर स्नातकोत्तर की उपाधि अर्जित की। इसके पश्चात, वर्ष १९७१ में उन्होंने ‘सैन फ्रांसिस्को विश्वविद्यालय’ से प्रबंधन के क्षेत्र में एम.बी.ए. (M.B.A.) की प्रतिष्ठित डिग्री प्राप्त की।

स्वदेश वापसी और विदेश सेवा: अमेरिका में उच्च शिक्षा और कार्य का अनुभव लेने के बाद, वर्ष १९७८ में वे अपनी मातृभूमि भारत वापस लौट आए। इसके बाद वर्ष १९८१ से १९८६ तक वे तेहरान (ईरान) में महत्वपूर्ण प्रशासनिक/व्यावसायिक पदों पर रहे।

मिथिलांचल में पुनर्वास: तेहरान से लौटने के बाद बम्बई (मुंबई) और पुणे जैसे महानगरों में अपनी सेवाएँ देने के उपरांत, वर्ष २००० में वे अपनी जड़ों की ओर वापस लौटे और दरभंगा के ऐतिहासिक ‘लहेरियासराय’ में स्थायी रूप से निवास करने लगे।

 

​सिनेमाई इतिहास में कीर्तिमान: पहली मैथिली फ़िल्म

​साहित्य और अर्थशास्त्र के साथ-साथ केदारनाथ चौधरी जी का नाम सिनेमा के इतिहास में भी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। सन १९६६ में निर्मित हुई पहली मैथिली फ़िल्म ‘ममता गाबय गीत’ के वे स्वयं लेखक और निर्माता रहे। इस फ़िल्म के माध्यम से उन्होंने मैथिली भाषा, संस्कृति और लोक-संगीत को दृश्य-श्रव्य माध्यम के ज़रिए एक बहुत बड़ा और वैश्विक मंच प्रदान किया। मिथिलांचल के सिनेमाई इतिहास में उनका यह योगदान हमेशा मील का पत्थर रहेगा।

 

​साहित्य जगत् में पदार्पण और प्रमुख कृतियाँ

​यह अत्यंत रोचक तथ्य है कि वैश्विक स्तर पर इतनी व्यस्तता के बावजूद केदारबाबू का साहित्य जगत् में विधिवत पदार्पण वर्ष २००४ में हुआ। इस वर्ष उनका पहला उपन्यास ‘चमेली रानी’ प्रकाशित हुआ, जिसने आते ही मैथिली पाठक वर्ग और समीक्षकों का ध्यान अपनी ओर तीव्रता से आकृष्ट किया। इसके बाद उनकी लेखनी अनवरत चलती रही। वर्ष २०१६ में प्रकाशित उनकी कालजयी रचना ‘आवारा नहितन’ ने आधुनिक मैथिली कथा-साहित्य में नए वैचारिक आयाम स्थापित किए, जिसमें नई पीढ़ी के जीवन-दर्शन और द्वंद्वों को बहुत बारीकी से उकेरा गया है।

 

​पुरस्कार एवं गरिमामयी सम्मान

​केदारनाथ चौधरी जी की उत्कृष्ट साहित्यिक और भाषाई सेवा के लिए उन्हें कई सर्वोच्च नागरिक और साहित्यिक सम्मानों से अलंकृत किया गया:

प्रबोध साहित्य सम्मान (२०१६): वर्ष २०१६ के लिए मैथिली भाषा का यह सर्वोच्च और अत्यंत प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार कथाकार केदारनाथ चौधरी को प्रदान किया गया। इस पुरस्कार के लिए शांति निकेतन के विख्यात प्रोफेसर डॉ. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ की अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय दस सदस्यीय निर्णायक मंडली ने सर्वसम्मति से उनके नाम का चयन किया था। यह सम्मान मैथिली आंदोलन के अग्रणी और महान नेता प्रबोध नारायण सिंह की स्मृति में वर्ष २००४ से निरंतर दिया जा रहा है।

​केदार सम्मान (२०१६): इसी वर्ष (२०१६) केदारनाथ चौधरी जी को उनके सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘आवारा नहितन’ के लिए ‘केदार सम्मान’ से भी पुरस्कृत और सम्मानित किया गया था।

 

उपसंहार: लोक और आधुनिकता के अमर सेतु

​पंडित केदारनाथ चौधरी का संपूर्ण जीवन इस बात का साक्ष्य है कि कोई व्यक्ति चाहे दुनिया के किसी भी कोने में रह ले, उसकी आत्मा अपनी मातृभाषा और माटी में ही बसती है। कैलिफ़ोर्निया से लहेरियासराय तक का उनका सफ़र और मैथिली साहित्य को दिए गए उनके बेहतरीन उपन्यास आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करेंगे। मैथिली कथा-जगत् में वे अपने अभूतपूर्व प्रयोगों के लिए सदैव आदर के साथ याद किए जाएंगे।

​धन्यवाद!

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