जय बक्सर: सिद्धाश्रम की सिद्धियों से आज़ादी के बलिदान तक
भूमिका
बक्सर, जिसे कभी ज्ञान-विज्ञान का तपोवन और ‘सिद्धाश्रम’ कहा गया, अपने भीतर युगों का इतिहास समेटे हुए है। त्रेतायुग में महर्षि विश्वामित्र की यह वह तपोस्थली थी, जहाँ श्रीराम ने ताड़का और सुबाहु जैसी आसुरी शक्तियों का संहार कर ऋषियों के तप की रक्षा की थी। बाघों की प्यास बुझाने वाले ‘व्याघ्रसर’ से लेकर आधुनिक ‘बक्सर’ बनने तक की यह यात्रा शौर्य, कूटनीति और बलिदान की अनूठी गाथा है।
१. पौराणिक गौरव: सिद्धाश्रम और वेदगर्भापुरी
बक्सर वह पावन भूमि है जहाँ महर्षि विश्वामित्र, लोपमुद्रा और अन्य ऋषियों ने ऋग्वेद की ऋचाओं का सृजन किया। इसे ‘वेदगर्भापुरी’ भी कहा जाता है। भगवान के वामन अवतार की लीला स्थली होने के कारण आज भी यहाँ पंचकोसी मेला (माघ पंचमी) आस्था का केंद्र है। अहिरौली से शुरू होकर चरित्रवन तक की यह यात्रा ‘लिट्टी-चोखा’ के प्रसाद के साथ संपन्न होती है, जो सादगी और शुचिता का प्रतीक है।
२. बक्सर के दो निर्णायक युद्ध: जिन्होंने भारत का भाग्य बदला
चौसा का युद्ध (१५३९ ई.): यहाँ शेरशाह सूरी ने हुमायूं को पराजित किया। इसी युद्ध ने ‘निजाम भिश्ती’ जैसे साधारण व्यक्ति को ढाई दिन का बादशाह बनाया, जिसने इतिहास में अपनी याद छोड़ने के लिए चमड़े के सिक्के चलवाए।
बक्सर का युद्ध (१७६४ ई.): यह वह युद्ध था जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी के पैर भारत में पूरी तरह जमा दिए। संगठित अंग्रेजी सेना और बंदूकों के आगे संयुक्त भारतीय सेना की विशाल संख्या भी कम पड़ गई। यहाँ के विजय स्तंभ को १९४२ में देशभक्तों ने ढहाकर गुलामी की जंजीरों को चुनौती दी थी।
३. बक्सर कारागार: जहाँ तैयार होता है ‘मनीला फंदा’
बक्सर का कारागार पूरे भारत में एकलौता ऐसा स्थान है, जहाँ फांसी का फंदा तैयार किया जाता है। १८४४ से शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है। यहाँ बनने वाली ‘मनीला रस्सी’ १८७ किलो तक का वजन संभाल सकती है। इसी जेल की कोठरियों में महेन्दर मिसिर जैसे ‘पूरबी’ के बेताज बादशाह ने भोजपुरी रामायण की रचना की, जिनकी तान सुनकर अंग्रेज अधिकारी भी मुग्ध हो जाते थे।
४. आज़ादी का दो दिवसीय जश्न और अमर शहीद
बक्सर में १५ और १६ अगस्त, दोनों दिन आज़ादी का पर्व मनाया जाता है। १६ अगस्त १९४२ को डुमरांव थाने पर कपिल मुनि, रामदास सुनार, रामदास लोहार और गोपाल जी ने शहादत दी थी। इन शहीदों के लहू से सिंचित यह मिट्टी आज भी हर नागरिक के भीतर राष्ट्रवाद की ऊर्जा भरती है।
५. अपनी जड़ों की खोज: भेलूपुर से त्रिनिदाद तक
बक्सर की मिट्टी की महक सात समंदर पार तक फैली है। भेलूपुर गाँव के रामलखन मिश्र के वंशज कमला प्रसाद बिसेसर जब कैरेबियन द्वीप समूह के प्रधानमंत्री बनकर अपनी जड़ों को खोजने आए, तो इतिहासकार शम्सुद्दीन के प्रयासों ने उस भावुक क्षण को साकार किया। यह बक्सर के वैश्विक प्रभाव का जीवंत उदाहरण है।
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
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