ताजमहल का ऐतिहासिक सच (भाग-२): ‘बादशाहनामा’ के गुप्त पन्ने, राजा जयसिंह की हवेली और स्थापत्य का अंतर्विरोध
(नोट: यह आलेख इस श्रृंखला का दूसरा भाग है। पहले भाग में हमने ताजमहल को ‘तेजो महालय’ शिव मंदिर घोषित करने की मांग को लेकर साल २००० से २०२६ तक देश की विभिन्न अदालतों (सुप्रीम कोर्ट से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट) में दायर मुकदमों और उन पर हुई कानूनी कार्यवाहियों का विस्तृत विश्लेषण किया था। इस भाग में हम उन प्राथमिक लिखित और ऐतिहासिक साक्ष्यों की ओर बढ़ रहे हैं, जिन्हें हिंदू पक्षकार अपनी दलीलों का मुख्य आधार बनाते हैं।)
ताजमहल विवाद की जड़ें केवल अदालती दलीलों में नहीं, बल्कि इतिहास के उन पन्नों में दबी हैं जिन्हें मुगलों ने स्वयं अपने हाथों से लिखा था। हिंदू पक्षकारों का दावा है कि शाहजहाँ ने शून्य से किसी नई इमारत का निर्माण नहीं कराया, बल्कि एक पहले से मौजूद भव्य राजपूत महल और मंदिर परिसर को अधिग्रहित करके उसे इस्लामिक मकबरे का रूप दे दिया था। इस दावे को सबसे मजबूत आधार स्वयं शाहजहाँ के शासनकाल का आधिकारिक दस्तावेज प्रदान करता है, जिसे ‘बादशाहनामा’ कहा जाता है।
१. ‘बादशाहनामा’ के पन्ने और राजा जयसिंह की हवेली का सच
ताजमहल विवाद में हिंदू पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत सबसे अकाट्य और प्राथमिक लिखित साक्ष्य ‘बादशाहनामा’ (या पादशाहनामा) को माना जाता है। बादशाहनामा कोई सामान्य या बाहरी किताब नहीं है; यह मुगल बादशाह शाहजहाँ के शासनकाल का आधिकारिक और दरबारी इतिहास है, जिसे उनके मुख्य दरबारी इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी ने फारसी भाषा में लिखा था।
इस ऐतिहासिक ग्रंथ के पहले खंड (Volume 1) के पृष्ठ संख्या ४०२ और ४०३ पर दर्ज विवरण को हिंदू पक्षकार अपने दावे का मुख्य आधार बनाते हैं।
बादशाहनामा में दर्ज वास्तविक विवरण (अनुवादित अंश)
अब्दुल हमीद लाहौरी ने मुमताज महल के शव को बुरहानपुर (मध्य प्रदेश) से आगरा लाए जाने और उसे दफनाए जाने के घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया है। ग्रंथ के अनुसार:
“आगरा (अकबरबाद) के दक्षिण में स्थित एक बेहद शानदार और आलीशान हवेली/इमारत (आली मंजिल), जो आदरणीय और पूर्वजों की यादों से समृद्ध थी, को बेगम के शव को दफनाने के लिए चुना गया। यह भव्य हवेली उस समय जयपुर के कछवाहा राजपूत राजा, मिर्जा राजा जयसिंह (राजा मानसिंह के पोते) के अधिकार में थी।”
लाहौरी आगे लिखते हैं:
“यद्यपि राजा जयसिंह इस आलीशान विरासत को अपने पूर्वजों की निशानी मानकर बेहद प्यार करते थे और इसे देना नहीं चाहते थे, लेकिन शहंशाह के सम्मान और राजकीय आदेश के कारण वे इसके लिए सहमत हो गए। इसके बदले में शाहजहाँ ने राजा जयसिंह को आगरा शहर के भीतर चार अन्य भव्य और कीमती हवेलियाँ (मुनावजे के रूप में) प्रदान कीं।”
[कछवाहा राजपूत वंश की संपत्ति]
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(राजा मानसिंह की भव्य हवेली)
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(पोते राजा जयसिंह को विरासत में मिली)
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[हिंदू पक्ष का तर्क] [मुगल इतिहास का पक्ष]
• यह हवेली "तेजो महालय" शिव मंदिर थी। • यह केवल एक रिहायशी हवेली थी।
• शाहजहाँ ने इसके गुंबद को बदला। • शाहजहाँ ने जमीन खरीदी और मकबरा बनाया।
२. इस साक्ष्य पर हिंदू पक्ष के तर्क और ऐतिहासिक निष्कर्ष
‘बादशाहनामा’ के इस विशिष्ट पैराग्राफ को आधार बनाकर हिंदू सेना और एडवोकेट हरिशंकर जैन जैसे पक्षकारों ने अदालत में निम्नलिखित गंभीर तर्क प्रस्तुत किए हैं:
- शून्य से निर्माण नहीं (No Construction from Scratch): सरकारी इतिहासकार का यह लेख स्वयं प्रमाणित करता है कि जिस स्थान पर आज ताजमहल खड़ा है, वहाँ शाहजहाँ के निर्माण शुरू करने से पहले ही एक अत्यंत विशाल, आलीशान और गुंबददार भव्य इमारत (आली मंजिल) पहले से मौजूद थी। शाहजहाँ ने किसी खाली जमीन पर नींव नहीं रखी थी।
- राजा मानसिंह का इतिहास: यह परिसर मूल रूप से अकबर के नवरत्नों में शामिल राजा मानसिंह का निवास या उनके द्वारा निर्मित परिसर था। हिंदू ग्रंथों और राजपूत इतिहास के अनुसार, राजा मानसिंह एक परम शिव भक्त थे और उन्होंने अपने जीवनकाल में कई भव्य शिव मंदिरों का निर्माण कराया था। ‘तेजो महालय’ इसी श्रृंखला का हिस्सा था।
- इमारत की उम्र का विरोधाभास: इतिहासकार पी. एन. ओक और अन्य शोधकर्ताओं का दावा है कि बादशाहनामा में जिस ‘आली मंजिल’ का जिक्र है, वह तत्कालीन समय में भी सदियों पुरानी और मजबूत संरचना थी। शाहजहाँ ने केवल उसके बाहरी हिस्से में कुछ रिनोवेशन (बदलाव) कराते हुए उस पर अरबी आयतें खुदवाईं और उसे मकबरे का रूप दे दिया।
३. शाहजहाँ और राजा जयसिंह के बीच के शाही फरमान (दस्तावेजी साक्ष्य)
इस दावे को मजबूती देने के लिए राजस्थान के बीकानेर आर्काइव (National Archives) में सुरक्षित कुछ ऐतिहासिक ‘शाही फरमानों’ (दस्तावेजों) का भी हवाला दिया जाता है।
- २८ दिसंबर १६३३ का फरमान: इस आधिकारिक दस्तावेज पर शाहजहाँ और मिर्जा राजा जयसिंह के हस्ताक्षर हैं। इस सौदे के तहत यह स्पष्ट दर्ज है कि मुमताज के मकबरे के लिए चुनी गई जमीन (हवेली) के बदले राजा जयसिंह को आगरा के मुख्य और सुरक्षित रिहायशी इलाकों में चार आलीशान हवेलियाँ हस्तांतरित की गई थीं।
- राजघराने का समर्थन: जयपुर के पूर्व राजघराने के सदस्यों ने भी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि उनके पास मौजूद पोथियों और गुप्त रिकॉर्ड्स में यह स्पष्ट दर्ज है कि वह जमीन और उस पर बनी मूल संरचना कछवाहा राजपूत वंश की निजी संपत्ति थी, जिसे बाद में मुगलों ने अधिग्रहित कर लिया था।
४. मुख्यधारा के इतिहासकारों का प्रति-तर्क
इसके विपरीत, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और मुख्यधारा के वामपंथी व आधुनिक इतिहासकारों का तर्क है कि ‘बादशाहनामा’ में जिस ‘हवेली’ शब्द का प्रयोग हुआ है, उसका अर्थ केवल एक रिहायशी महल से है, न कि किसी क्रियाशील शिव मंदिर से। उनके अनुसार, शाहजहाँ ने राजा जयसिंह से केवल वह भूमि और हवेली ली, उसे पूरी तरह ध्वस्त किया और फिर सन १६३२ से १६५३ के बीच २२ वर्षों की कड़ी मेहनत और २०,००० से अधिक मजदूरों की मदद से वर्तमान ताजमहल की नींव रखी और उसका निर्माण कराया।
हालांकि, हिंदू पक्ष का सवाल आज भी वही है कि यदि पुरानी इमारत को पूरी तरह गिरा दिया गया था, तो ताजमहल के नीचे बने दो मंजिला प्राचीन तहखाने और राजपूत शैली की मजबूत दीवारें आज भी वहां कैसे मौजूद हैं?
अगले भाग की ओर:
‘बादशाहनामा’ के इन लिखित साक्ष्यों के बाद, इस विवाद का सबसे रहस्यमयी हिस्सा आता है—ताजमहल के नीचे स्थित वे २२ बंद कमरे।
‘बादशाहनामा’ के इन लिखित साक्ष्यों के बाद, इस विवाद का सबसे रहस्यमयी हिस्सा आता है—ताजमहल के नीचे स्थित वे २२ बंद कमरे।