ताजमहल का ऐतिहासिक सच: ‘तेजो महालय‘ शिव मंदिर होने के दावे, अदालती साक्ष्य और वर्तमान कानूनी स्थिति
ताजमहल वास्तव में मुगल बादशाह शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया एक मकबरा है या यह राजा परमार देव द्वारा ११५६ ईस्वी में निर्मित ‘तेजो महालय‘ नाम का एक प्राचीन हिंदू शिव मंदिर था, यह विवाद पिछले कई दशकों से भारतीय न्यायपालिका और इतिहास जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। जहाँ मुख्यधारा के इतिहासकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इसे मुगल वास्तुकला का शिखर मानते हैं, वहीं हिंदू पक्षकारों का दावा है कि यह एक पवित्र ज्योतिर्लिंग मंदिर (अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर) है, जिसे शाहजहाँ ने अधिग्रहित करके एक इस्लामिक मकबरे का रूप दे दिया था।
इस विस्तृत आलेख में हम सिलसिलेवार तरीके से उन ऐतिहासिक प्रकल्पों, स्थापत्य साक्ष्यों, अदालती मुकदमों और दोनों पक्षों की दलीलों का विश्लेषण करेंगे जो इस दावे को आधार प्रदान करते हैं।
भाग १: ऐतिहासिक प्रकल्प और दावे का उद्गम
ताजमहल के शिव मंदिर होने के सिद्धांत की नींव मुख्य रूप से बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पड़ी। इस प्रकल्प के मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:
१. पुरुषोत्तम नागेश ओक (पी. एन. ओक) का शोध
इस दावे को सबसे पहले सार्वजनिक और अकादमिक पटल पर लाने का श्रेय इतिहासकार पी. एन. ओक को जाता है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Taj Mahal: The True Story” में दस्तावेजी और स्थापत्य साक्ष्यों के आधार पर यह तर्क दिया कि ‘ताजमहल’ शब्द संस्कृत के ‘तेजो महालय’ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है ‘शिव का तेजोमय निवास’। ओक के अनुसार, मुगलों के पूरे इतिहास में किसी अन्य इमारत के साथ ‘महल’ शब्द का प्रयोग मकबरे के लिए नहीं किया गया। ‘महल’ एक शाही निवास या मंदिर की पहचान है, न कि किसी कब्रगाह की।
२. राजा परमार देव और राजा मानसिंह का इतिहास
हिंदू पक्षकारों के दावों के अनुसार, वर्तमान ताजमहल की मूल संरचना का निर्माण ११५६ ईस्वी में राजा परमार देव द्वारा करवाया गया था। बाद में, यह परिसर जयपुर के कछवाहा राजपूत राजाओं के नियंत्रण में आया। शाहजहाँ के समकालीन दस्तावेजों (जैसे बादशाहनामा) के विश्लेषण के आधार पर यह दावा किया जाता है कि शाहजहाँ ने यह भव्य इमारत जयपुर के राजा जयसिंह (राजा मानसिंह के पोते) से मुमताज की दफन स्थली के लिए अधिग्रहित की थी। हिंदू पक्ष का तर्क है कि शाहजहाँ ने शून्य से इस इमारत का निर्माण नहीं कराया, बल्कि एक पहले से मौजूद भव्य राजपूत महल/मंदिर परिसर को केवल रूपांतरित किया था।
भाग २: ‘ताजमहल एक शिव मंदिर है’ – पक्षकारों के मुख्य साक्ष्य और तर्क
हिंदू याचिकाकर्ताओं और शोधकर्ताओं ने अदालत और जनता के सामने कई ऐसे स्थापत्य (Architectural) और लिखित साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं, जो उनके अनुसार इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह संरचना पूरी तरह एक हिंदू शिव मंदिर ही है:
१. स्थापत्य कला और हिंदू प्रतीक (Architectural Evidence)
- १०९ हिंदू लक्षण और कलाकृतियाँ: वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित याचिका में दावा किया गया है कि ताजमहल परिसर में हिंदू वास्तुकला के १०९ विशिष्ट लक्षण मौजूद हैं। इनमें मुख्य गुंबद के ऊपर त्रिशूल के आकार का कलश (Finial), कमल के फूल की नक्काशी (Lotus motifs) और आम के पत्तों की आकृतियां शामिल हैं, जो शुद्ध रूप से हिंदू मांगलिक प्रतीक हैं।
- अष्टकोणीय (Octagonal) योजना: ताजमहल का मूल नक्शा अष्टकोणीय है। हिंदू स्थापत्य शास्त्र (जैसे विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र) में आठ कोनों वाले निर्माण को विशेष धार्मिक महत्व दिया गया है, और भगवान शिव के दिशापालों के अनुसार शिव मंदिरों का निर्माण इसी शैली में होता था।
- मुख्य गुंबद से पानी टपकना: ताजमहल के मुख्य कक्ष की छत से पानी की बूंदों के टपकने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। हिंदू पक्ष के अनुसार, यह किसी मकबरे की विशेषता नहीं हो सकती; यह शिव मंदिर की उस परंपरा का हिस्सा है जहाँ शिवलिंग के ऊपर ‘जलाधारी’ से लगातार जल की बूंदें गिरती हैं।
२. गुप्त तहखाने और बंद २२ कमरे
ताजमहल के संगमरमर के चबूतरे के नीचे लाल बलुआ पत्थर से बने दो मंजिला गुप्त तहखाने मौजूद हैं। इनमें से लगभग २२ कमरे सुरक्षा और पुरातात्विक कारणों से एएसआई द्वारा स्थायी रूप से बंद रखे गए हैं। याचिकाकर्ताओं का दृढ़ विश्वास है कि यदि इन बंद कमरों को खोला जाए और उनका वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए, तो वहां मूल पूज्य शिवलिंग, प्राचीन हिंदू मूर्तियां, और शिलालेख प्राप्त होंगे, जिन्हें मुगलों द्वारा ईंट-दीवारों के पीछे चुनवा दिया गया था।
३. वैदिक परंपराएं
- जूते उतारने की परंपरा: मुगलों के अन्य मकबरों (जैसे हुमायूं का मकबरा या अकबर का मकबरा) की तुलना में ताजमहल के मुख्य चबूतरे पर चढ़ने से पहले सदियों से जूते उतारने की सख्त परंपरा रही है। हिंदू पक्ष का मानना है कि यह परंपरा इस स्थान के प्राचीन मंदिर (तेजो महालय) होने के समय से लगातार चली आ रही है।
- गौशाला और कुआँ: परिसर के भीतर एक प्राचीन विशाल कुआँ (Stepwell) और एक ऐसी संरचना मौजूद है जिसे पारंपरिक रूप से ‘गौशाला’ के रूप में चिन्हित किया जाता है। इस्लामिक कब्रगाहों में पारंपरिक रूप से कुओं या गौशालाओं का कोई धार्मिक औचित्य नहीं होता, जबकि हिंदू मंदिर परिसरों में ये अनिवार्य अंग होते हैं।
भाग ३: मुकदमों का सिलसिलेवार इतिहास और न्यायालयीन कार्यवाहियां (२०००-२०२६)
इस मुद्दे को लेकर पिछले २६ वर्षों में देश की विभिन्न अदालतों में कई महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाइयाँ लड़ी गई हैं। इनका सिलसिलेवार विवरण नीचे दी गई तालिका और विवरण में स्पष्ट है:
मुकदमों का सारांश चार्ट
| वर्ष | न्यायालय (Court) | मुख्य याचिकाकर्ता/पक्षकार | अदालत का रुख / वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|---|
| २००० | सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) | पी. एन. ओक | याचिका पूरी तरह खारिज; ऐतिहासिक तथ्यों का अभाव माना गया। |
| २०१५ | आगरा सिविल कोर्ट (Agra Court) | भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान | दीवानी मुकदमा दर्ज; एएसआई ने मंदिर होने के दावे को नकारा। |
| २०१९-२०२६ | आगरा जिला न्यायालय | एडवोकेट हरिशंकर जैन व अन्य | वैज्ञानिक सर्वे और एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की अर्जी खारिज। |
| २०२२ | इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ) | डॉ. रजनीश सिंह (भाजपा) | बंद २२ कमरों को खोलने की PIL खारिज; कोर्ट द्वारा कड़ी फटकार। |
| २०२६ (वर्तमान) | इलाहाबाद हाईकोर्ट (प्रयागराज) | अग्रेश्वर महादेव विराजमान व अन्य | याचिका स्वीकार; केंद्र सरकार और एएसआई (ASI) को नोटिस जारी। |
मुकदमों का विस्तृत विवरण
१. पी. एन. ओक की याचिका (साल २०००)
इतिहासकार पी. एन. ओक ने सीधे देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने मांग की थी कि ताजमहल की वास्तविक पहचान ‘तेजो महालय’ के रूप में घोषित की जाए। हालांकि, तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इसे एक अकादमिक और ऐतिहासिक विषय मानते हुए याचिका को सुनने से इनकार कर दिया और इसे खारिज कर दिया।
२. आगरा सिविल कोर्ट का ऐतिहासिक मुकदमा (साल २०१५)
साल २०१५ में आगरा के छह वकीलों ने स्थानीय दीवानी अदालत में एक अनूठा मुकदमा (Civil Suit) दायर किया। इस मुकदमे में मुख्य वादी (Plaintiff) स्वयं “भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान” को बनाया गया, जिनका प्रतिनिधित्व उनके ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ (Next Friend) के रूप में एडवोकेट हरिशंकर जैन और अन्य भक्तों ने किया।
- प्रतिवादी (Defendants): इसमें भारत सरकार, केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को प्रतिवादी बनाया गया।
- विपक्षी साक्ष्य (ASI का जवाब): अगस्त २०१७ में एएसआई ने अदालत में अपना लिखित बयान (Written Statement) दाखिल किया। एएसआई ने हिंदू पक्ष के दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि उनके पास ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है जो यह साबित करे कि ताजमहल की जगह पर पहले कोई मंदिर था। एएसआई ने इसे केवल एक मुगल मकबरा (Rauza-i-Munavvara) करार दिया।
३. आगरा कोर्ट द्वारा सर्वे की मांग खारिज होना (२०१९-२०२६)
मूल दीवानी मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, हिंदू पक्षकारों ने अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मामले के फैसले का हवाला देते हुए एक आवेदन दिया। उन्होंने मांग की कि ताजमहल के भीतर छिपे हिंदू प्रतीकों के दस्तावेजीकरण के लिए एक ‘एडवोकेट कमिश्नर’ (Advocate Commissioner) नियुक्त किया जाए जो वहां वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कर सके। आगरा की निचली अदालत और बाद में पुनरीक्षण अदालत (Revisional Court) ने इस मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि बिना पुख्ता राजस्व रिकॉर्ड के ऐतिहासिक स्मारकों के भीतर इस तरह के निरीक्षण की अनुमति नहीं दी जा सकती।
४. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का आदेश (मई २०२२)
भाजपा नेता डॉ. रजनीश सिंह ने एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर ताजमहल के उन 22 कमरों को खोलने की मांग की जो दशकों से बंद हैं। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
“आप इतिहास को हमारे जरिए प्रमाणित मत करवाइए। कल को आप आकर कहेंगे कि आपको जजों के चैंबर में जाना है, तो क्या हम आपको अनुमति दे देंगे? जनहित याचिका (PIL) व्यवस्था का मजाक मत बनाइए। पहले जाइये, एमए और पीएचडी कीजिए, किसी यूनिवर्सिटी में इस विषय पर रिसर्च कीजिए, तब कोर्ट आइए।”
इसके बाद इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में की गई अपील को भी अक्टूबर 2022 में खारिज कर दिया गया था।
५. वर्तमान स्थिति: इलाहाबाद हाईकोर्ट का नोटिस (जुलाई २०२६)
आगरा की अदालत द्वारा सर्वे की अर्जी खारिज किए जाने के खिलाफ, एडवोकेट हरिशंकर जैन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट (मुख्य पीठ, प्रयागराज) में अनुच्छेद २२७ के तहत एक याचिका दायर की। ६ जुलाई, २०२६ को इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने मामले को विचारणीय माना है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को नोटिस जारी कर उनका औपचारिक जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) मांगा है। यह इस विवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, क्योंकि कोर्ट ने आगरा की अदालत के आदेश की समीक्षा करने और एएसआई से नए सिरे से इस विषय पर जवाब मांगने का निर्णय लिया है।
भाग ४: निष्कर्ष और वैधानिक दृष्टिकोण
ताजमहल को ‘तेजो महालय’ शिव मंदिर मानने का दावा पूरी तरह से उन स्थापत्य कलाकृतियों, सांस्कृतिक प्रतीकों और ऐतिहासिक विसंगतियों पर टिका हुआ है जिन्हें शाहजहाँ कालीन इतिहास में दबाने का प्रयास किया गया। हिंदू पक्षकारों के लिए यह केवल एक संपत्ति का विवाद नहीं है, बल्कि “भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर” के मूल धार्मिक और पवित्र स्थान की पुनर्प्राप्ति का संघर्ष है।
वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जारी किए गए नोटिस के बाद, गेंद अब ASI और केंद्र सरकार के पाले में है। यदि भविष्य में अदालत वैज्ञानिक सर्वेक्षण या एडवोकेट कमिश्नर द्वारा निरीक्षण की अनुमति देती है, तो ताजमहल के वास्तविक और मौलिक इतिहास से जुड़े कई नए और अकाट्य साक्ष्य देश के सामने आ सकते हैं।