इतिहास के पुनर्लेखन के पुरोधा: पुरुषोत्तम नागेश ओक और उनका वैचारिक विमर्श
”कौन कहता है कि अकबर महान था?, ‘क्रिश्चानिटी’ वास्तव में कृष्ण-नीति है, ताजमहल असल में तेजोमहालय शिव मंदिर है… स्वीकृत इतिहास की प्रामाणिकता पर ऐसे कई तीखे और चौंकाने वाले सवाल उठाने वाले लेखक श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक थे। श्री ओक भारतीय इतिहास के प्रचलित स्वरूप को हमलावरों एवं उपनिवेशकों द्वारा लिखा गया एक पक्षपाती और तोड़ा-मरोड़ा गया वृत्तांत मानते थे। उसे सही करने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया, कई पुस्तकें लिखीं और अनगिनत लेख प्रकाशित किए। ओक का स्पष्ट मानना था कि आधुनिक और मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के आदर्शीकृत वृत्तांत को कल्पित करके उसमें से सारे वैदिक संदर्भ और सामग्री जानबूझकर हटा दिए हैं।”
श्री ओक के शोध, उनकी लेखनी और उनका योगदान मुख्य रूप से सनातन धर्म एवं वैदिक संस्कृति की प्राचीन वैश्विक व्यापकता और श्रेष्ठता को सिद्ध करने के प्रयास थे। अपनी इसी मुहिम को एक संस्थागत रूप देने के लिए उन्होंने ‘भारतीय इतिहास पुनरावलोकन संस्थान’ (Institute for Rewriting Indian History) की भी स्थापना की थी।
आइए, इतिहास के इस अनूठे और बहुचर्चित चेहरे, श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक के जीवन और उनकी खोज पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं।
१. प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी पृष्ठभूमि
२ मार्च, १९१७ को इंदौर (मध्य प्रदेश) में जन्मे पुरुषोत्तम नागेश ओक का जीवन केवल बंद कमरों में शोध करने वाले इतिहासकार का नहीं था, बल्कि उनकी पृष्ठभूमि एक राष्ट्रभक्त और क्रांतिकारी की भी रही थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने वैश्विक स्तर पर भारत की आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई।
उन्होंने पूर्वी एशिया में जापानी सेना के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के खिलाफ सैन्य संघर्ष का मोर्चा संभाला था। जब ब्रिटिश सेना ने आत्मसमर्पण किया, तब उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ (INA) की स्थापना में सक्रिय भाग लिया। अपनी प्रखर मेधा और भाषा पर पकड़ के कारण उन्हें आज़ाद हिंद फ़ौज के रेडियो निदेशक (Radio Director) के रूप में एक बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी।
२. पत्रकारिता से सरकारी सेवा तक का सफर
भारत की आज़ादी के बाद, श्री ओक ने देश के बौद्धिक और वैचारिक परिदृश्य को बदलने का संकल्प लिया। वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आए और अपने तीखे लेखों से बुद्धिजीवियों का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद, उन्होंने भारत सरकार के ‘सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय’ (Ministry of Information and Broadcasting) में एक उच्च अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
कुछ समय तक उन्होंने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास में भी कार्य किया। इन विविध क्षेत्रों में काम करने के दौरान और देश-विदेश के ऐतिहासिक स्थलों का गहन निरीक्षण करते हुए, उन्होंने ऐसे कई आश्चर्यजनक निष्कर्ष निकाले, जो आज उनकी अमर रचनाओं के रूप में हमारे सामने उपलब्ध हैं।
३. पी. एन. ओक की कालजयी कृतियाँ (भाषावार वर्गीकरण)
श्री ओक ने इतिहास, ज्योतिष और राजनीति पर तीन भाषाओं (हिन्दी, मराठी और अंग्रेज़ी) में विपुल लेखन किया। उनकी मुख्य पुस्तकें निम्नलिखित हैं:
हिन्दी साहित्य:
अमर सेनानी सावरकर: जीवन झाँकी
कौन कहता है कि अकबर महान था?
क्रिश्चानिटी कृष्णनीति है
ताजमहल मंदिर भवन है
ताजमहल तेजोमहल शिव मंदिर है
भारत का द्वितीय स्वातंत्र्य समर
महामना सावरकर (भाग-१)
लोकोत्तरद्रष्टा सावरकर (भाग-२)
वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास (भाग १ से ४)
मराठी साहित्य:
आरोग्य, सौंदर्य व दीर्घायुष्य
इस्लामी परचक्राची सुरुवात
जागतिक इतिहास संशोधनातील माझे अनुभव
जागतिक इतिहासातील खिंडारे
ताजमहाल नव्हे तेजोमहालय (शिवमंदिर)
ताजमहाल हे तेजोमहाल आहे
नेताजींच्या सहवासात
फलज्योतिष शास्त्राची तोंडओळख
भारतीय इतिहास संशोधनातील घोडचुका
मोगलाईचा उदयास्त
सर्व राशींच्या व्यक्तींचे भाग्ययोग अन् संपत्तीयोग
हिंदुस्थानच्या इतिहासातील कृष्णपक्ष
हिंदुस्थानचे दुसरे स्वातंत्र्ययुद्ध
हिंदू विश्व राष्ट्राचा इतिहास
अंग्रेज़ी साहित्य (English Literature):
Taj Mahal: The True Story
Some Missing Chapters of World History
World Vedic Heritage: A History of Histories
Vaidik Vishva Rashtra Ka Itihas
Bharat Mein Muslim Sultan
Who Says Akbar was Great
Some Blunders Of Indian Historical Research
Agra Red Fort is a Hindu Building
Learning Vedic Astrology
४. भाषा विज्ञान (Etymology) और उनके क्रांतिकारी सिद्धांत
श्री ओक की पुस्तकों को पढ़ने पर पाठक को स्थापित और अकादमिक इतिहास से बिल्कुल उलट एक नया धरातल महसूस होता है। उनके सिद्धांतों के अनुसार, वर्तमान के इस्लाम और ईसाई धर्म, दोनों ही प्राचीन वैदिक धर्म के ही विकृत या तोड़े-मरोड़े गए रूप हैं। अपने दावों को पुख्ता करने के लिए उन्होंने शब्दों के भाषाई मूल (Etymology) का सहारा लिया, जो बेहद रोचक हैं:
ईशालयम से इस्लाम: ओक के अनुसार, ‘इस्लाम’ शब्द का संस्कृत मूल ‘ईशालयम’ है, जिसका अर्थ है ‘ईश + आलय = भगवान का घर’। यह अर्थ इस्लाम में वर्णित पारंपरिक अर्थों से सर्वथा भिन्न है।
काबा का सच: उन्होंने पुरज़ोर दावा किया कि मक्का में स्थित ‘काबा’ मूल रूप से एक प्राचीन शिव मंदिर था, जहाँ मक्केश्वर महादेव पूजे जाते थे।
वैटिकन और पोप का वैदिक संबंध: उनका यह भी मानना था कि ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरु ‘पोप’ का पद वास्तव में एक प्राचीन वैदिक पद (संस्कृत के ‘पॉप’ या गुरु स्वरूप) था। इस व्यवस्था को तब नष्ट किया गया जब रोमन सम्राट कॉन्स्टैन्टाइन ने तत्कालीन वैदिक संतों की हत्या करके वहाँ एक प्रभावहीन ईसाई पोप को बिठा दिया।
क्रिश्चानिटी और कृष्ण-नीति: वे तर्क देते थे कि ‘क्रिश्चियन’ शब्द असल में ‘कृष्ण’ का और ‘क्रिश्चानिटी’ वास्तव में भगवान श्री कृष्ण की ‘कृष्ण-नीति’ का ही अपभ्रंश है।
निष्कर्ष: एक वैकल्पिक वैचारिक दृष्टि
यद्यपि मुख्यधारा के आधुनिक इतिहासकारों और शैक्षणिक संस्थानों ने श्री पी. एन. ओक के इन शोधों और दावों को अकादमिक स्वीकार्यता नहीं दी और इन्हें ‘छद्म-इतिहास’ (Pseudo-history) की संज्ञा दी; परंतु इसके बावजूद, जनमानस के एक बहुत बड़े वर्ग में और दक्षिणपंथी विचारकों के बीच उनकी पुस्तकें आज भी बहुत चाव से पढ़ी जाती हैं।
इतिहास को देखने का उनका यह दृष्टिकोण हमें यह सोचने पर विवश ज़रूर करता है कि क्या वाकई हमारे अतीत को केवल विजेताओं और आक्रमणकारियों की नज़रों से ही लिखा गया है? पी. एन. ओक का लेखन स्थापित इतिहास के समानांतर हमेशा एक सुलगती हुई बहस के रूप में जीवित रहेगा।
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