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सोने के लिए जागना

​घर की उस मद्धम अटारी पर,

कथा-किताबें मौन भरी हैं;

मानो मेरी रातों की नींदें,

चुराने को ही वहाँ धरी हैं।

 

​विगत कई लंबी रातों से,

गहरी नींद सुलाने को;

वो चुपके से छू लेती हैं,

मुझे रात भर जगाने को।

 

​मैं पढ़ता हूँ पन्नों को,

वो पढ़ती हैं मेरे मन को;

पूरी रात हम जागते हैं,

समझने इस जग के क्रंदन को।

 

​आँखें न वो कभी मूँदती हैं,

और न ही हम पलकें झपकाते;

इस शाश्वत संवाद से हम,

कभी विमुख नहीं होना चाहते।

 

​सवालों के हज़ारों अंतहीन,

और अनसुलझे से उलझे तार;

आँखें बंद करते ही जेहन में,

बन जाते हैं गहरा गुबार।

 

​उन्हीं उलझनों को सुलझाने को,

इस मन को गहरी नींद सुलाने को;

वो जागती हैं प्रहरी बनकर रात भर,

और हमें भी जगाती हैं भोर आने को।

 

अश्विनी राय ‘अरूण’

मांगोडेहरी, बक्सर, बिहार

 

 

मुंशी प्रेमचंद: जीवन परिचय, साहित्यिक विशेषताएँ और कालजयी अनमोल वचन

 

 

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