images (46)

काला पानी का रणनीतिक संघर्ष: वीर सावरकर, सचिंद्रनाथ सन्याल और स्वाभिमान का इतिहास

 

​इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं होता, बल्कि वह उन कठिन परिस्थितियों में लिए गए निर्णयों की गवाही भी होता है जिन्हें अक्सर आने वाली पीढ़ियाँ अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करती हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अंडमान की सेल्युलर जेल (काला पानी) एक ऐसा नरक था, जहाँ केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा और उसकी वैचारिक चेतना को भी कुचलने का प्रयास किया जाता था। वहाँ की घोर अमानवीय प्रताड़ना, कोल्हू में बैल की तरह जुतना और एकांत कारावास के कारण कई क्रांतिकारी मानसिक संतुलन खो बैठते थे या आत्महत्या कर लेते थे।

​ऐसे में, विनायक दामोदर सावरकर और सचिंद्रनाथ सन्याल जैसे मनीषी क्रांतिकारियों ने जो रास्ता चुना, वह आत्मसमर्पण का नहीं, बल्कि ‘रणनीतिक पीछे हटने’ (Strategic Retreat) का एक बेजोड़ उदाहरण था।

 

​याचिका: कायरता नहीं, बल्कि ‘शिवाजी महाराज’ जैसी कूटनीति

​जब जेल के भीतर क्रांतिकारी दम तोड़ रहे थे, तब सावरकर ने एक दूरगामी नीति अपनाई। उनका मानना था कि दुश्मन की जेल में सड़कर मर जाने या आत्महत्या कर लेने से देश का कोई भला नहीं होने वाला। यदि संघर्ष को जीवित रखना है, तो किसी भी तरह इस नरक से बाहर निकलना होगा और पुनः राष्ट्र सेवा में जुटना होगा। यह ठीक वैसी ही कूटनीति थी जैसी छत्रपति शिवाजी महाराज ने औरंगज़ेब की आगरा जेल से निकलते समय या मिर्ज़ा राजा जयसिंह के साथ पुरंदर की संधि करते समय अपनाई थी।

​सावरकर ने न केवल स्वयं याचिका लिखी, बल्कि अन्य साथी क्रांतिकारियों को भी प्रेरित किया कि वे यहाँ सड़ने के बजाय बाहर निकलकर संघर्ष का मार्ग चुनें। महान क्रांतिकारी और ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HRA) के संस्थापक सचिंद्रनाथ सन्याल ने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘बंदी जीवन’ में इस बात को स्वीकार किया है कि उन्होंने सावरकर के परामर्श और उनकी सुझाई भाषा के आधार पर ही अपनी याचिका तैयार की थी।

 

​अंग्रेज़ों का दोगला मापदंड: सन्याल पर विश्वास, सावरकर से भय

​इतिहास का सबसे दिलचस्प मोड़ यहीं आता है। उसी याचिका के आधार पर अंग्रेज़ों ने सचिंद्रनाथ सन्याल को तो रिहा कर दिया, लेकिन वे विनायक दामोदर सावरकर की रग-रग से वाकिफ थे। ब्रिटिश हुकूमत सावरकर की मेधा, उनके अंतरराष्ट्रीय संपर्कों (जैसे मैडम भीखाजी कामा और श्यामजी कृष्ण वर्मा) और उनकी पुस्तक ‘१७५७ का स्वातंत्र्य समर’ के प्रभाव से इतनी भयभीत थी कि उसने सावरकर पर कभी रंच मात्र भी विश्वास नहीं किया।

​सन्याल की रिहाई और HRA की स्थापना: जेल से छूटने के बाद सचिंद्रनाथ सन्याल ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार पुनः क्रांति की मशाल थामी और ‘HRA’ की नींव रखी। इसी संगठन ने आगे चलकर रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ और भगत सिंह जैसे महानायकों को जन्म दिया, जिन्होंने अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए। सन्याल बाद में काकोरी कांड के बाद पुनः गिरफ्तार हुए और उन्हें दोबारा काला पानी भेजा गया, जहाँ १९४२ में उनका प्राणांत हुआ।

​सावरकर पर २७ वर्षों का पहरा: दूसरी ओर, अंग्रेज़ सावरकर को लेकर इतने आशंकित थे कि १९२१ में अंडमान से मुख्य भूमि (भारत) लाने के बाद भी उन्हें जेल में रखा गया। १९२४ में जब उन्हें रत्नागिरी छोड़ा गया, तब भी उन पर कड़ी पाबंदियाँ थीं। वे १९३७ तक यानी पूरे २७ वर्षों तक अंग्रेज़ी हुकूमत की सख्त नज़रबंदी और पहरे में रहे। यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि अंग्रेज़ जानते थे कि सावरकर की याचिका महज़ एक कानूनी पैंतरा थी, उनका हृदय परिवर्तन नहीं।

 

​१९३७ के बाद का भारत और सावरकर का वैचारिक परिवर्तन

​जब १९३७ में सावरकर पूर्णतः मुक्त हुए, तब तक भारत का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका था। आज़ादी की आहट साफ़ सुनाई दे रही थी, लेकिन साथ ही देश में एक अजीब सा असंतुलन पैदा हो रहा था। तत्कालीन कांग्रेस की नीतियाँ तुष्टिकरण की ओर झुकती जा रही थीं, जहाँ राष्ट्रीय विमर्श में हिंदू स्वाभिमान और उनके ऐतिहासिक अधिकारों की खुलेआम उपेक्षा की जा रही थी।

​इस परिस्थिति को देखकर सावरकर का चिंतक मन उद्वेलित हो उठा। उन्होंने भांप लिया कि यदि बहुसंख्यक हिंदू समाज को संगठित और जाग्रत नहीं किया गया, तो जो आज़ादी मिलेगी वह खंडित होगी और उसमें हिंदुओं का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। उनका यह सोचना सामयिक था कि—”जब हिंदू ही नहीं बचेंगे, तो आज़ादी किसके लिए और किसके बल पर ली जाएगी?”

​इसी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक संकट के समय उन्होंने अखिल भारतीय हिंदू महासभा की कमान संभाली और देश के अल्पसंख्यकों (विशेषकर मुस्लिम नेतृत्व) को संबोधित करते हुए वह ऐतिहासिक और सिंहगर्जना वाला नारा दिया, जो आज भी राष्ट्रवाद के विमर्श में गूँजता है:

​”स्वतंत्रता तो हम लेकर ही रहेंगे। तुम हमारे साथ आओगे तो तुम्हारे साथ, तुम तटस्थ रहोगे तो तुम्हारे बिना, और यदि तुम हमारा विरोध करोगे तो तुम्हारे उस विरोध को कुचलकर हम स्वतंत्रता लेंगे; लेकिन हम अपने स्वाभिमान और इस मातृभूमि के सांस्कृतिक स्वरूप से कोई समझौता नहीं करेंगे।”

 

​आलेख का निष्कर्ष: आज के जनमानस के लिए सीख

​सावरकर और सचिंद्रनाथ सन्याल की यह संयुक्त दास्तान आज के भारत को यह सिखाती है कि राष्ट्रवाद के रास्ते कभी सीधे नहीं होते। शत्रु जब शक्तिशाली और क्रूर हो, तो कूटनीति, युक्ति और रणनीतिक धैर्य ही सबसे बड़े हथियार होते हैं। सावरकर को केवल ‘याचिकाओं’ के संकीर्ण चश्मे से देखना उस महान स्वतंत्रता सेनानी के साथ अन्याय है जिसके नाम से ब्रिटिश साम्राज्य कांपता था। यह ज्वलंत इतिहास आज के जनमानस और युवा पीढ़ी के सामने आना अत्यंत आवश्यक है, ताकि वे जान सकें कि आज हम जिस स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, उसकी नींव में कूटनीति के कितने अंतहीन प्रयास और त्याग छिपे हुए हैं।

 

सोने के लिए जागना: किताबों और रातों के सन्नाटे पर एक गहरी कविता | अश्विनी राय ‘अरूण’

 

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *