मथुरा कृष्ण जन्मभूमि विवाद: भाग-१ (प्राचीन गर्भगृह का वैभव और इतिहास के शुरुआती पन्ने)
“मथुरा कतहुं न जाइये, जहाँ जनम लियो यदुराय…” ब्रजभूमि की माटी में रचा-बसा यह दोहा सदियों से भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य आस्था को प्रकट करता रहा है। लेकिन अयोध्या और काशी की तरह ही, सनातन संस्कृति का यह परम पवित्र केंद्र भी सदियों से विदेशी आक्रांताओं के हमलों, विध्वंस और वर्तमान समय में एक बेहद जटिल कानूनी लड़ाई का केंद्र बना हुआ है। इलाहाबाद हाईकोर्ट और देश की सर्वोच्च अदालत में यह मामला आज अपने सबसे महत्वपूर्ण दौर में पहुंच चुका है।
इस नई विशेष श्रृंखला के पहले भाग में हम मथुरा के उसी प्राचीन वैभव, मल्लपुरा (कटरा केशवदेव) के ऐतिहासिक उद्गम और गुप्त राजाओं द्वारा निर्मित भव्य कृष्ण मंदिर के इतिहास का प्रामाणिक विश्लेषण करेंगे।
१. कटरा केशवदेव: भगवान कृष्ण की वास्तविक जन्मस्थली
मथुरा शहर के केंद्र में स्थित ‘कटरा केशवदेव’ वह मूल स्थान है जिसे शास्त्रों और इतिहास में राजा कंस के उस प्राचीन कारागार (जेल) के रूप में चिन्हित किया गया है, जहाँ भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण ने प्राकट्य लिया था।
- मल्लपुरा और कटरा शब्द का अर्थ: ऐतिहासिक रूप से इस पूरे क्षेत्र को ‘मल्लपुरा’ कहा जाता था। ‘कटरा’ शब्द का अर्थ एक ऐसे सुरक्षित या ऊंचे बाजार/प्रांगण से होता है, जिसकी घेराबंदी की गई हो। जैन और बौद्ध काल के पुरातात्विक अवशेषों से सिद्ध होता है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी से ही यह स्थान धार्मिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र था।
- पहला भव्य निर्माण (बज्रनाभ काल): धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद भगवान कृष्ण के प्रपौत्र (पड़पोते) महाराज बज्रनाभ ने मथुरा की इस पावन भूमि पर सबसे पहला भव्य कृष्ण मंदिर बनवाया था, जिसे ‘केशवदेव मंदिर’ के नाम से प्रसिद्धि मिली।
२. गुप्त साम्राज्य और राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का स्वर्ण काल
समय के चक्र के साथ बज्रनाभ कालीन मंदिर जब जीर्ण-शीर्ण हुआ, तो भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग यानी गुप्त काल में इस स्थान को इसका दूसरा सबसे भव्य स्वरूप मिला।
सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय का योगदान
- सन ४०० ईस्वी का भव्य निर्माण: गुप्त वंश के महान सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें विक्रमादित्य भी कहा जाता है) के शासनकाल में कटरा केशवदेव स्थान पर एक विशाल और गगनचुम्बी मंदिर का निर्माण कराया गया।
- विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तांत: इस गुप्तकालीन मंदिर की भव्यता का वर्णन प्रसिद्ध चीनी यात्री फाश्यान (Faxian) ने अपने यात्रा संस्मरणों में किया है। उसने लिखा था कि मथुरा में यमुना किनारे स्थित यह देवस्थान अपनी अद्वितीय नक्काशी, स्वर्ण कलशों और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए पूरे आर्यावर्त (भारत) में प्रसिद्ध था।
[ महाराज बज्रनाभ का मूल मंदिर ]
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(समय चक्र के साथ जीर्ण-शीर्ण)
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[ सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (४०० ईस्वी) ]
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▼ (दूसरा भव्य मंदिर निर्माण) ▼
• गगनचुम्बी शिखर और अद्वितीय गुप्तकालीन नक्काशी।
• चीनी यात्री फाश्यान के लेखों में इस वैभव का वर्णन।
३. राजा विजयपाल देव और गजनवी का पहला क्रूर आक्रमण (१०१७ ईस्वी)
गुप्तकालीन मंदिर सदियों तक सुरक्षित रहा, लेकिन ११वीं शताब्दी की शुरुआत में उत्तर भारत पर इस्लामिक आक्रांताओं के हमलों का दौर शुरू हुआ। सन १०१७ ईस्वी में महमूद गजनवी ने मथुरा पर आक्रमण किया।
गजनवी के इतिहासकार का लिखित सच
महमूद गजनवी के साथ आए इतिहासकार अल्-उत्बी ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-यामिनी’ में इस मंदिर को देखकर विस्मय प्रकट किया था। उसने लिखा:
“मथुरा के केंद्र में एक ऐसी इमारत खड़ी है, जिसे देखकर लगता है कि इसका निर्माण इंसानों ने नहीं, बल्कि फरिश्तों (देवताओं) ने किया है। यदि कोई राजा ऐसा मंदिर दोबारा बनाना चाहे, तो उसे एक लाख दीनार (सोने के सिक्के) खर्च करने होंगे और कम से कम २०० वर्ष का समय लगेगा।”
- विध्वंस और लूट: इस असीम वैभव को देखकर गजनवी ने मंदिर को बारूद और आग के हवाले कर दिया। मंदिर के भीतर स्थापित शुद्ध सोने और रत्नों से जड़ी मूर्तियों को तोड़ दिया गया और ऊंटों पर लादकर गज़नी ले जाया गया।
- तीसरा निर्माण (११५० ईस्वी): इस भयंकर विध्वंस के कुछ दशकों बाद, सन ११५० ईस्वी में कन्नौज के राजा विजयपाल देव के शासनकाल में जज नामक व्यक्ति ने उसी स्थान पर फिर से एक तीसरा भव्य मंदिर खड़ा किया। यह मंदिर मध्यकाल की राजपूत स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना था।
भाग-१ का निष्कर्ष
मथुरा की इस पावन जन्मभूमि ने इतिहास के शुरुआती हजार वर्षों में ही वैभव, आस्था और आक्रांताओं की क्रूरता के कई दौर देखे। हर बार जब इस मंदिर को तोड़ा गया, सनातन समाज ने अपनी अटूट श्रद्धा के बल पर वहां दोबारा एक नया और भव्य मंदिर खड़ा कर दिया। लेकिन इस जन्मभूमि का सबसे कठिन दौर आना अभी बाकी था, जब दिल्ली की सल्तनत पर सिकंदर लोदी और बाद में क्रूर मुग़ल शासक औरंगज़ेब का नियंत्रण हुआ।
अगले भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-२ में हम चर्चा करेंगे—“सिकंदर लोदी का कहर, राजा वीरसिंह बुंदेला का चौथा भव्य निर्माण और औरंगज़ेब का क्रूर फरमान (१६७०)”। हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे ओरछा के राजा वीरसिंह देव ने ३३ लाख रुपए की भारी लागत से यहाँ एक अभूतपूर्व मंदिर बनवाया, जिसे देखकर औरंगज़ेब जल उठा और उसने शाही ईदगाह मस्जिद बनाने का लिखित आदेश जारी कर दिया।