मथुरा कृष्ण जन्मभूमि विवाद: भाग-५ (अंतिम भाग) – आधुनिक कानूनी जंग, वैज्ञानिक सर्वे की मांग और भविष्य का रुख
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का पाँचवाँ और अंतिम भाग है। पिछले भागों में हमने प्राचीन इतिहास, औरंगज़ेब के विध्वंस, राजा पटनीमल की खरीद और १९६८ के विवादित समझौते को समझा था। इस अंतिम भाग में हम समकालीन कानूनी घटनाक्रमों, इलाहाबाद हाईकोर्ट के कड़े फैसलों और इस विवाद के भविष्य का विश्लेषण करेंगे।)
वर्ष १९६८ के समझौते के बाद कई दशकों तक यह विवाद कानूनी परदों के पीछे दबा रहा। लेकिन अयोध्या राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले ने देश के कानून और जनमानस की चेतना को पूरी तरह बदल दिया। इसी प्रेरणा के साथ, मथुरा के श्रीकृष्ण भक्तों ने १९६८ के उस ‘अवैध समझौते’ को पूरी तरह निरस्त करने और अपनी पूरी १३.३७ एकड़ पवित्र भूमि को वापस पाने के लिए देश की आधुनिक अदालतों का रुख किया। आज यह मुकदमा अपने सबसे निर्णायक और ऐतिहासिक दौर में प्रवेश कर चुका है।
आइए इस अंतिम भाग में वर्तमान कानूनी स्थिति, अदालती आदेशों और इसके संभावित वैधानिक समाधानों को विस्तार से समझते हैं।
१. इलाहाबाद हाईकोर्ट में १८ मुकदमों का एकीकरण (Consolidation)
मथुरा की स्थानीय जिला अदालत में अलग-अलग हिंदू पक्षकारों की ओर से कई याचिकाएं दायर की गई थीं। मामले के महत्व और संवेदनशीलता को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया:
- मुकदमों का एकीकरण: हाईकोर्ट ने मथुरा जिला अदालत में लंबित सभी १८ दीवानी मुकदमों (Civil Suits) को अपने पास स्थानांतरित (Transfer) कर लिया ताकि उन पर एक साथ और त्वरित सुनवाई की जा सके।
- मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज: मुस्लिम पक्ष (शाही ईदगाह मस्जिद कमेटी और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड) ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि हिंदू पक्ष के ये मुकदमे सुनने योग्य ही नहीं हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की इस आपत्ति (Maintainability Challenge) को पूरी तरह खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि हिंदू उपासकों द्वारा दायर सभी १८ मुकदमे पूरी तरह से वैधानिक हैं और इनकी नियमित सुनवाई जारी रहेगी।
२. वैज्ञानिक एएसआई (ASI) सर्वेक्षण और सुप्रीम कोर्ट का रुख
इस मुकदमे में अयोध्या और ज्ञानवापी की तर्ज पर सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने परिसर के वैज्ञानिक सर्वे की मांग की।
- हाईकोर्ट द्वारा सर्वे को मंजूरी: दिसंबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश देते हुए शाही ईदगाह परिसर के कोर्ट-कमिशन और वैज्ञानिक सर्वेक्षण (Scientific Survey) की मांग को मंजूरी दे दी। कोर्ट ने परिसर में छिपे हिंदू प्रतीकों (जैसे शेषनाग, कमल और शंख की आकृतियां) की पहचान के लिए एडवोकेट कमिशनर की नियुक्ति को हरी झंडी दिखाई थी।
- सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान रुख: मुस्लिम पक्ष ने इस आदेश के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के उस ‘कोर्ट-कमिशनर सर्वे’ की जमीनी कार्रवाई पर अंतरिम रोक (Stay) लगा रखी है, लेकिन मुख्य मुकदमे की सुनवाई पर कोई रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हिंदू पक्षकारों को इस मुख्य मुकदमे में केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को भी प्रतिवादी (Defendants) बनाने की पूर्ण अनुमति दे दी है, जिसे इस मामले का एक बड़ा वैधानिक मोड़ माना जा रहा है।
[ इलाहाबाद हाईकोर्ट ]
│
┌────────────────────────┴────────────────────────┐
▼ ▼
[ १८ मुकदमों की वैधता ] [ वैज्ञानिक सर्वे आदेश ]
• सभी १८ केस सुनवाई योग्य घोषित। • एएसआई और कोर्ट कमिशन को मंजूरी।
• मुस्लिम पक्ष की याचिकाएं खारिज। • सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक (Stay)।
३. ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१’ (Places of Worship Act) की चुनौती
इस पूरे विवाद के सामने सबसे बड़ा कानूनी रोड़ा ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१’ (धार्मिक स्थल कानून) को माना जाता है, जो यह कहता है कि १५ अगस्त १९४७ को जो धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में था, उसे बदला नहीं जा सकता।
- हिंदू पक्ष का प्रति-तर्क: हिंदू पक्षकारों का तर्क है कि यह कानून मथुरा पर लागू नहीं होता। पहला कारण यह कि पूरी १३.३७ एकड़ भूमि के राजस्व और मालिकाना हक के दस्तावेज (१८१५ की नीलामी और १९३५ का हाईकोर्ट फैसला) पूरी तरह हिंदुओं के पक्ष में हैं, इसलिए यह संपत्ति कभी भी वक्फ की नहीं थी। दूसरा कारण यह कि १९४७ से पहले भी यह स्थल विवादित था और वहां हिंदू निरंतर पूजा करते आ रहे थे, इसलिए इसका धार्मिक स्वरूप शुद्ध रूप से मंदिर का ही है।
४. वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मध्यस्थता (Mediation) और लोक अदालत
इस कानूनी खींचतान के बीच, देश की न्यायपालिका ने एक और ऐतिहासिक पहल की है:
- लोक अदालत और मध्यस्थता (Lok Adalat & Mediation): सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में, जुलाई-अगस्त २०२६ में मथुरा की जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के समक्ष हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण मध्यस्थता (Conciliation Talks) का दौर शुरू हुआ है।
- अगस्त २०२६ का अपडेट: इस मध्यस्थता प्रक्रिया के सक्रिय होने के कारण इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई को २५ अगस्त २०२६ तक के लिए स्थगित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के तहत २१ से २३ अगस्त २०२६ के बीच होने वाली विशेष लोक अदालत में इस पर चर्चा होनी तय है, ताकि दोनों पक्ष बातचीत से किसी ऐतिहासिक समझौते पर पहुँच सकें।
श्रृंखला का तार्किक निष्कर्ष (Closing Statement)
मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास इस बात का जीवंत उदाहरण है कि पत्थरों को तोड़ा जा सकता है, लेकिन किसी राष्ट्र की आत्मा और उसकी आस्था को कभी मिटाया नहीं जा सकता। राजा बज्रनाभ के काल से शुरू हुआ यह सफर गजनवी, लोदी और औरंगज़ेब के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए आज भारत के संविधान के दायरे में न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।
यह विवाद अब अपने अंतिम और तार्किक दौर में है। यदि लोक अदालत की मध्यस्थता सफल होती है, तो यह देश में कौमी सौहार्द की एक नई मिसाल पेश करेगा। अन्यथा, कानून और आने वाला वैज्ञानिक सर्वेक्षण ही तय करेगा कि योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण के वास्तविक गर्भगृह का मौलिक वैभव कब और कैसे पुनर्स्थापित होगा।