मथुरा कृष्ण जन्मभूमि विवाद: भाग-२ (सिकंदर लोदी का कहर, राजा वीरसिंह देव का चौथा निर्माण और औरंगज़ेब का क्रूर फरमान)
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का दूसरा भाग है। पहले भाग में हमने भगवान कृष्ण के मूल गर्भगृह ‘कटरा केशवदेव’ के उद्गम, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के स्वर्ण काल और सन १०१७ में महमूद गजनवी के आक्रमण का विश्लेषण किया था। इस भाग में हम मध्यकाल के दो सबसे बड़े विध्वंसों और उस ऐतिहासिक निर्माण की कहानी जानेंगे जिसके अवशेष आज भी विवाद की मुख्य जड़ हैं।)
सन ११५० में राजा विजयपाल देव के काल में निर्मित तीसरा केशवदेव मंदिर लगभग तीन सदियों तक ब्रजमंडल की शोभा बढ़ाता रहा। लेकिन दिल्ली की गद्दी पर जब लोदी वंश और बाद में मुगलों का क्रूर शासन स्थापित हुआ, तो मथुरा की इस पावन भूमि को एक बार फिर मजहबी कट्टरता का सामना करना पड़ा। इस दौर में जन्मभूमि ने न केवल विध्वंस झेला, बल्कि राजपूत शौर्य के उस वैभव को भी देखा जिसने मुगलों की नाक के नीचे देश का सबसे भव्य मंदिर खड़ा कर दिया था।
आइए इस दूसरे भाग में सिकंदर लोदी के अत्याचार, ओरछा के राजा वीरसिंह देव के अद्भुत निर्माण और सन १६७० में औरंगज़ेब द्वारा जारी किए गए उस काले शाही फरमान के इतिहास को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
१. सिकंदर लोदी का शासन और मथुरा पर कहर (१५वीं सदी)
१५वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दिल्ली सल्तनत पर सिकंदर लोदी का नियंत्रण हुआ। वह एक अत्यधिक कट्टर और असहिष्णु शासक था।
- पूरी तरह विध्वंस का आदेश: इतिहासकार फरिश्ता और समकालीन मुस्लिम ग्रंथों के अनुसार, सिकंदर लोदी ने मथुरा के सभी भव्य मंदिरों को तोड़ने का आदेश जारी किया। उसने केशवदेव के तीसरे मंदिर की सुंदर मूर्तियों को पूरी तरह खंडित कर दिया।
- सांस्कृतिक दमन: लोदी ने हिंदुओं के यमुना नदी में स्नान करने, मुंडन कराने और घाटों पर पूजा-अर्चना करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। मंदिर के मलबे और पत्थरों को कसाइयों को मांस तोलने के लिए दे दिया गया, जो सनातन आस्था पर एक बहुत बड़ा आघात था। इसके बाद लंबे समय तक जन्मभूमि पर केवल खंडहर ही शेष रहे।
२. ओरछा के राजा वीरसिंह देव बुंदेला का चौथा भव्य निर्माण (१६१० ईस्वी)
मुगल काल में जब जहांगीर दिल्ली का बादशाह बना, तो बुंदेलखंड के प्रतापी राजा मिर्जा राजा वीरसिंह देव बुंदेला (ओरछा के शासक) के साथ उसके बेहद घनिष्ठ संबंध थे। इस राजनीतिक प्रभाव का उपयोग करते हुए राजा वीरसिंह देव ने कृष्ण जन्मभूमि के पुनरुद्धार का बीड़ा उठाया।
३३ लाख की भारी लागत और अद्वितीय स्थापत्य
- भव्य चौथा निर्माण: सन १६१० ईस्वी में राजा वीरसिंह देव ने कटरा केशवदेव की उसी प्राचीन भूमि पर चौथे भव्य मंदिर का निर्माण शुरू कराया।
- ऐतिहासिक लागत: उस दौर में इस मंदिर को बनाने में ३३ लाख रुपए की खगोलीय धनराशि खर्च हुई थी। मंदिर इतना ऊंचा और भव्य था कि आगरा से ही इसकी गगनचुम्बी चोटियाँ साफ दिखाई देती थीं।
- विदेशी यात्रियों की गवाही: प्रसिद्ध फ्रांसीसी यात्री जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर और इतालवी यात्री निकोलाओ मनूची ने इस मंदिर को भारत की सबसे खूबसूरत और विस्मयकारी संरचना बताया था। टैवर्नियर ने लिखा था कि यह पूरे भारत में हिंदुओं का सबसे श्रद्धेय स्थान है और इसके केंद्रीय कक्ष की नक्काशी शुद्ध सोने के पत्तरों से सजी हुई है।
[ कटरा केशवदेव की पावन भूमि ]
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(१६१०: राजा वीरसिंह देव का भव्य मंदिर)
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(सन १६७०: औरंगज़ेब का क्रूर आक्रमण)
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[ मंदिर का आंशिक विध्वंस ] [ शाही ईदगाह का निर्माण ]
• मुख्य गर्भगृह और चबूतरे को तोड़ा। • मंदिर के पिछले मलबे और दीवारों का उपयोग।
• मूर्तियों को आगरा की सीढ़ियों में दबाया। • जन्मभूमि के ठीक ऊपर विवादित मस्जिद खड़ी की।
३. सन १६७०: औरंगज़ेब का शाही फरमान और बाबरी की तर्ज पर विध्वंस
मुगल इतिहास का सबसे काला अध्याय तब शुरू हुआ जब मुहद्दीन मोहम्मद औरंगज़ेब गद्दी पर बैठा। वह कला, संस्कृति और हिंदू धर्म का कट्टर विरोधी था। वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने के ठीक एक साल बाद, उसका ध्यान मथुरा की ओर गया।
आधिकारिक दरबारी ग्रंथ ‘मासिर-ए-आलमगीरी’ का साक्ष्य
औरंगज़ेब के दरबारी इतिहासकार साकी मुस्तैद खान ने आधिकारिक ग्रंथ ‘मासिर-ए-आलमगीरी’ में इस विध्वंस का गर्व के साथ लिखित ब्यौरा दिया है। ग्रंथ के अनुसार:
“रमज़ान के पवित्र महीने (जनवरी १६७०) में, शहंशाह ने धर्म के रक्षकों को आदेश दिया कि मथुरा के केशवदेव मंदिर को पूरी तरह से ज़मींदोज़ (नष्ट) कर दिया जाए, क्योंकि यह कुफ्र (काफिरों) का सबसे बड़ा केंद्र है।”
- मूर्तियों का अपमान: औरंगज़ेब की सेना ने मंदिर को चारों तरफ से घेरकर उसके मुख्य गर्भगृह और भव्य शिखरों को तोपों से उड़ा दिया। मंदिर के भीतर स्थापित रत्नजड़ित मूर्तियों को निकालकर आगरा लाया गया और बेगम साहिबा की मस्जिद (जहाँआरा मस्जिद) की सीढ़ियों के नीचे दफन कर दिया गया, ताकि आते-जाते मुसलमानों के जूतों के नीचे वे कुचली जा सकें।
- शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण: औरंगज़ेब ने मंदिर को पूरी तरह से साफ नहीं किया। उसने चालाकी दिखाते हुए मंदिर के पिछले ऊंचे चबूतरे, जगती (Plinth) और उसी तोड़े गए मंदिर की दीवारों तथा लाल पत्थरों के खंभों का उपयोग करके उसके ठीक ऊपर ‘शाही ईदगाह मस्जिद’ खड़ी कर दी। यही कारण है कि आज भी मस्जिद के पिछले हिस्से की दीवारें देखने पर शुद्ध रूप से प्राचीन हिंदू मंदिर का चबूतरा और राजपूत स्थापत्य शैली साफ नजर आती है।
भाग-२ का निष्कर्ष
औरंगज़ेब ने यह सोचकर मंदिर तोड़ा था कि वह ब्रजभूमि से भगवान कृष्ण का नाम मिटा देगा, लेकिन वह भूल गया कि पत्थरों को तोड़ा जा सकता है, जनमानस की आस्था को नहीं। सन १६७० के इस क्रूर विध्वंस के बाद, जैसे ही मुगलों की सत्ता कमजोर हुई, हिंदू राजाओं और मराठों ने इस भूमि को वापस पाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए। यहीं से शुरू होती है आधुनिक काल और ब्रिटिश दौर की वह कानूनी जंग, जिसने इस विवाद को कागजों पर हमेशा के लिए अमर कर दिया।
अगले भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-३ में हम चर्चा करेंगे—“मराठा काल की वापसी, राजा पटनीमल द्वारा जमीन की खरीद और ब्रिटिश काल की पहली कानूनी अदालती जंग”। हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे मुगलों के बाद मराठों ने इस भूमि पर नियंत्रण किया, ईस्ट इंडिया कंपनी ने १८१५ में इस पूरी १३.३७ एकड़ ज़मीन को नीलाम किया और कैसे बनारस के राजा पटनीमल ने इसे खरीदकर हिंदू पक्ष के मालिकाना हक को हमेशा के लिए पुख्ता कर दिया।