मथुरा कृष्ण जन्मभूमि विवाद: भाग-३ (मराठा काल, राजा पटनीमल द्वारा भूमि की खरीद और ब्रिटिश दौर के ऐतिहासिक मुकदमे)
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का तीसरा भाग है। पहले दो भागों में हमने प्राचीन इतिहास, राजा विक्रमादित्य के स्वर्ण काल और सन १६७० में औरंगज़ेब द्वारा किए गए क्रूर विध्वंस का विश्लेषण किया था। इस भाग में हम जानेंगे कि कैसे मुगलों के पतन के बाद हिंदू राजाओं ने इस भूमि को वापस हासिल किया और कैसे १३.३७ एकड़ ज़मीन के मालिकाना हक (Ownership) के दस्तावेजी साक्ष्य तैयार हुए।)
सन १६७० में औरंगज़ेब द्वारा कृष्ण जन्मभूमि के आंशिक विध्वंस और शाही ईदगाह के निर्माण के बाद ब्रजमंडल का हिंदू समाज शांत नहीं बैठा। जैसे ही मुग़ल सल्तनत कमजोर हुई, उत्तर भारत में मराठों और स्थानीय राजाओं ने अपनी संस्कृति और धर्मस्थलों की पुनर्प्राप्ति के लिए अभियान शुरू कर दिए। आधुनिक काल के आते-आते यह विवाद केवल तलवारों की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि इसके साथ १३.३७ एकड़ भूमि के पक्के राजस्व और मालिकाना हक के वे कानूनी दस्तावेज तैयार हुए, जो आज भी अदालत में हिंदू पक्ष की सबसे बड़ी ताकत हैं।
आइए इस तीसरे भाग में मराठों की विजय, बनारस के राजा पटनीमल की ऐतिहासिक भूमि खरीद और ब्रिटिश काल के मुकदमों को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
१. मराठा साम्राज्य का उदय और जन्मभूमि पर पुनः नियंत्रण (१७७० ईस्वी)
१८वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब मुग़ल सत्ता सिर्फ दिल्ली के लाल किले तक सिमट गई, तब मराठा साम्राज्य (विशेषकर सिंधिया राजवंश) ने उत्तर भारत में अपना परचम लहराया।
- मथुरा की मुक्ति (१७७०): गोवर्धन और मथुरा के युद्धों में मुगलों और जाट राजाओं के साथ चले लंबे संघर्ष के बाद मराठों ने मथुरा पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया।
- जमीन का मालिकाना हक (राजस्व रिकॉर्ड): मराठों ने कटरा केशवदेव की पूरी १३.३७ एकड़ भूमि को नजूल भूमि (सरकारी/शाही स्वामित्व वाली भूमि) घोषित किया और इसके राजस्व रिकॉर्ड अपने नियंत्रण में ले लिए। मराठों के आने से शाही ईदगाह में नमाज पढ़ने की गतिविधियां पूरी तरह बंद हो गईं और यह पूरी भूमि पुनः हिंदू नियंत्रण में आ गई।
२. सन १८१५: ईस्ट इंडिया कंपनी की नीलामी और राजा पटनीमल का ऐतिहासिक कदम
सन १८०३ में लासवाड़ी के युद्ध के बाद अंग्रेजों (ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) ने मराठों को हराकर आगरा और मथुरा के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजों के आते ही इस नजूल भूमि की कानूनी गाथा शुरू हुई।
- अंग्रेजों द्वारा भूमि की नीलामी: चूंकि कटरा केशवदेव की इस १३.३७ एकड़ नजूल भूमि पर लंबे समय से कोई टैक्स (राजस्व) जमा नहीं हुआ था, इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी के फैजाबाद/मथुरा कलेक्ट्रेट ने सन १८१५ में इस पूरी ज़मीन की सार्वजनिक नीलामी (Public Auction) करने का फैसला किया।
- राजा पटनीमल द्वारा खरीद: बनारस (वाराणसी) के एक परम प्रतापी और धनी राजा राजा पटनीमल ने इस नीलामी में हिस्सा लिया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को सरकारी कीमत चुकाकर पूरी १३.३७ एकड़ भूमि (जिसमें औरंगज़ेब द्वारा बनाई गई शाही ईदगाह मस्जिद भी शामिल थी) को कानूनी रूप से खरीद लिया।
- ऐतिहासिक विलेख (Sale Deed): ब्रिटिश सरकार ने राजा पटनीमल के नाम पर ‘सेल डीड’ और मालिकाना हक का प्रमाण पत्र जारी किया। यह इतिहास का वह टर्निंग पॉइंट है जिसने मुस्लिम पक्ष के इस दावे को हमेशा के लिए कमजोर कर दिया कि यह वक्फ की संपत्ति है, क्योंकि वक्फ की संपत्ति को कोई गैर-मुस्लिम सरकार नीलाम नहीं कर सकती और न ही कोई हिंदू राजा उसे खरीद सकता था।
[ मराठा कालीन नजूल भूमि ]
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(१८०३: अंग्रेजों का मथुरा पर कब्जा)
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[ सन १८१५: ब्रिटिश सरकार द्वारा नीलामी ]
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[ राजा पटनीमल ने खरीदी १३.३७ एकड़ भूमि ]
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[ हिंदू पक्ष का तर्क ] [ मुस्लिम पक्ष का संकट ]
• पूरी ज़मीन का पक्का मालिकाना हक मिला। • ईदगाह की ज़मीन भी राजा की हो गई।
• कोर्ट में सबसे बड़ा दस्तावेजी सबूत बना। • वक्फ संपत्ति होने का दावा कमजोर हुआ।
३. ब्रिटिश काल के ऐतिहासिक मुकदमे और मुस्लिमों की लगातार हार
राजा पटनीमल द्वारा भूमि खरीदे जाने के बाद, शाही ईदगाह के मुस्लिम पक्षकारों ने इस मालिकाना हक को चुनौती देने के लिए ब्रिटिश अदालतों में कई दीवानी मुकदमे (Civil Suits) दायर किए। लेकिन हर बार अदालत ने राजा पटनीमल और हिंदू पक्ष के हक में फैसला सुनाया:
- वर्ष १८९७ का मुकदमा: मुस्लिम पक्ष ने फैजाबाद/मथुरा की सिविल कोर्ट में दावा किया कि नीलामी में ईदगाह की इमारत शामिल नहीं थी। अदालत ने दस्तावेजों की जांच करने के बाद इस दावे को खारिज कर दिया और माना कि पूरी १३.३७ एकड़ भूमि के मालिक राजा पटनीमल के वंशज ही हैं।
- वर्ष १९२१ और १९३५ के मुकदमे: राजा पटनीमल के उत्तराधिकारियों (राय कृष्ण दास) के समय मुस्लिमों ने पुनः मालिकाना हक को चुनौती दी। ब्रिटिश काल के फैजाबाद सब-जज और बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष १९३५ में अपने अंतिम फैसले में स्पष्ट कर दिया कि कटरा केशवदेव की पूरी १३.३७ एकड़ भूमि का वैधानिक और कानूनी हक सिर्फ और सिर्फ हिंदू पक्षकारों के पास है। मुस्लिमों के पास वहां नमाज पढ़ने का कोई स्थायी कानूनी अधिकार नहीं है।
४. सन १९४४: जुगलकिशोर बिड़ला का आगमन और ट्रस्ट की स्थापना
२०वीं सदी के उत्तरार्ध में राजा पटनीमल के वंशज आर्थिक रूप से इस स्थिति में नहीं थे कि वे वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण करा सकें। ऐसे में भारत के प्रख्यात उद्योगपति और दानवीर बाबू जुगलकिशोर बिड़ला आगे आए।
- भूमि का हस्तांतरण (७ फरवरी १९४४): जुगलकिशोर बिड़ला ने राजा पटनीमल के वंशज राय कृष्ण दास से वह पूरी १३.३७ एकड़ पवित्र भूमि १३,४०० रुपए में खरीद ली।
- श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट (१९५१): बिड़ला जी का उद्देश्य वहां फिर से भगवान कृष्ण का एक भव्य मंदिर खड़ा करना था। इसके लिए उन्होंने महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा से ‘श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट’ (बाद में श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान) की स्थापना की और पूरी ज़मीन इस ट्रस्ट को समर्पित कर दी।
भाग-३ का निष्कर्ष
ब्रिटिश काल के अंत तक, मथुरा कृष्ण जन्मभूमि का मामला कानूनी रूप से पूरी तरह हिंदुओं के पक्ष में साफ हो चुका था। पूरी १३.३७ एकड़ भूमि का मालिकाना हक हिंदू ट्रस्ट के पास था और मुस्लिम पक्ष की सभी याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं। लेकिन आज़ादी के बाद, वर्ष १९६८ में एक ऐसा ‘गुप्त समझौता’ हुआ, जिसने इस पूरी कानूनी जीत को पलट दिया और इस विवाद को स्वतंत्र भारत का एक नया और उलझा हुआ मुकदमा बना दिया।
अगले भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-४ में हम चर्चा करेंगे—“आज़ादी के बाद का नया मोड़, वर्ष १९६८ का वह विवादित समझौता (Compromise) और शाही ईदगाह पर कब्ज़े की कहानी”। हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे जन्मस्थान सेवा संघ और शाही ईदगाह कमेटी के बीच कोर्ट के बाहर एक समझौता हुआ, जिसके तहत मस्जिद की ज़मीन मुस्लिमों को सौंप दी गई और कैसे इसी समझौते को आज हिंदू पक्ष ‘अवैध और धोखाधड़ी’ मानकर अदालत में चुनौती दे रहा है।