मथुरा कृष्ण जन्मभूमि विवाद: भाग-४ (आज़ादी के बाद का नया मोड़, वर्ष १९६८ का विवादित समझौता और शाही ईदगाह का पेंच)
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का चौथा भाग है। पिछले भागों में हमने प्राचीन इतिहास, औरंगज़ेब के विध्वंस, राजा पटनीमल द्वारा पूरी १३.३७ एकड़ भूमि की खरीद और ब्रिटिश काल के मुकदमों का विश्लेषण किया था। इस भाग में हम आज़ादी के बाद की राजनीति, वर्ष १९६८ के उस गुप्त समझौते और उसके कानूनी विवादों को समझेंगे जिसने इस पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया।)
सन १९४७ में जब भारत आज़ाद हुआ, तब मथुरा कृष्ण जन्मभूमि का कानूनी पलड़ा पूरी तरह हिंदुओं के पक्ष में भारी था। ब्रिटिश अदालतों के फैसलों और राजस्व रिकॉर्ड्स के अनुसार पूरी १३.३७ एकड़ ज़मीन बिड़ला जी द्वारा स्थापित हिंदू ट्रस्ट के स्वामित्व में थी। इस भूमि पर आधुनिक भव्य केशवदेव मंदिर और गर्भगृह का पुनर्निर्माण भी शुरू हो चुका था। लेकिन इसी बीच वर्ष १९६८ में परदे के पीछे एक ऐसा समझौता हुआ, जिसने बनी-बनाई कानूनी जीत को एक नए और लंबे विवाद में उलझा दिया।
आइए इस चौथे भाग में आज़ादी के बाद के घटनाक्रम, वर्ष १९६८ के समझौते का सच और हिंदू पक्ष द्वारा इसे ‘धोखाधड़ी’ बताए जाने के कारणों को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
१. आज़ादी के बाद मंदिर का पुनरुद्धार और दो संस्थाओं का उदय
देश की आज़ादी के बाद, उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला के प्रयासों से जन्मभूमि पर एक भव्य मंदिर के निर्माण का काम तेजी से आगे बढ़ा। इस दौरान परिसर की व्यवस्था को संभालने के लिए मुख्य रूप से दो संगठन सामने आए:
- श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट (१९५१): यह बिड़ला जी द्वारा गठित वह मूल और मुख्य कानूनी ट्रस्ट था, जिसके पास राजा पटनीमल के वंशजों से खरीदी गई पूरी १३.३७ एकड़ भूमि का मालिकाना हक (Ownership) सुरक्षित था।
- श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ (१९५६): मंदिर के रोजमर्रा के कामकाज, उत्सवों और नागरिक व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए इस सहयोगी संस्था का गठन किया गया था (बाद में इसका नाम बदलकर ‘श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान’ कर दिया गया)। कानूनी दृष्टिकोण से यह संस्था केवल एक प्रबंधक (Manager) थी, ज़मीन की मालिक नहीं।
२. १२ अक्टूबर १९६८: वह विवादित समझौता (The Compromise Deed)
१९६० के दशक में शाही ईदगाह मस्जिद और मंदिर परिसर की सीमाओं को लेकर दोनों पक्षों के बीच छोटे-मोटे विवाद और तनाव होने लगे थे। इन विवादों को हमेशा के लिए समाप्त करने के नाम पर १२ अक्टूबर १९६८ को ‘श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ’ और ‘शाही ईदगाह मस्जिद कमेटी’ के पदाधिकारियों के बीच कोर्ट के बाहर एक समझौता हुआ।
समझौते की मुख्य शर्तें क्या थीं?
- भूमि का विभाजन: इस समझौते के तहत तय हुआ कि १३.३७ एकड़ भूमि के एक हिस्से पर जहाँ शाही ईदगाह मस्जिद बनी है, वह हिस्सा मस्जिद कमेटी के पास ही रहेगा और हिंदू पक्ष उस पर अपना दावा छोड़ देगा।
- दीवार का निर्माण: दोनों परिसरों को अलग करने के लिए बीच में एक पक्की पत्थर की दीवार खड़ी कर दी गई, जो आज भी वहाँ देखी जा सकती है।
- मस्जिद के पीछे की ज़मीन: समझौते के बदले में मस्जिद कमेटी ने अपने कब्जे वाली कुछ बाहरी ज़मीन मंदिर ट्रस्ट को सौंप दी, ताकि मंदिर का विस्तार किया जा सके।
[ मूल १३.३७ एकड़ हिंदू भूमि ]
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(१२ अक्टूबर १९६८: कोर्ट के बाहर समझौता)
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[ जन्मस्थान सेवा संघ का रुख ] [ शाही ईदगाह कमेटी ]
• शांति और विवाद खत्म करने के लिए कदम। • मस्जिद वाले हिस्से पर कब्जा बरकरार।
• ज़मीन के एक हिस्से पर दावा छोड़ा। • समझौते को कानूनी ढाल बनाया।
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[ वर्तमान हिंदू याचिकाकर्ताओं का तर्क ] [ वर्तमान कानूनी पेंच ]
• सेवा संघ को ज़मीन देने का हक नहीं था। • वक्फ बोर्ड इस समझौते को सही मानता है।
• असली मालिक 'मूल ट्रस्ट' था, संघ नहीं। • 'प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट' का सहारा।
३. हिंदू पक्ष आज इस समझौते को ‘अवैध और धोखाधड़ी’ क्यों मानता है?
वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहे मुकदमों में हिंदू पक्षकारों (जैसे एडवोकेट हरिशंकर जैन, रंजना अग्निहोत्री व अन्य) ने इस १९६८ के समझौते को अदालत में मुख्य रूप से चुनौती दी है। उनके अनुसार यह समझौता पूरी तरह अवैध (Void ab initio) है, जिसके पीछे निम्नलिखित तीन बड़े कानूनी तर्क हैं:
क) मालिकाना हक का अभाव (Lack of Ownership)
कानून का यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति या संस्था केवल उसी संपत्ति का सौदा कर सकती है जिसकी वह मालिक हो। चूंकि पूरी १३.३७ एकड़ ज़मीन के वैधानिक मालिक ‘श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट’ और स्वयं ‘भगवान श्रीकृष्ण विराजमान’ थे, इसलिए केवल प्रबंधन देखने वाले ‘जन्मस्थान सेवा संघ’ को मस्जिद कमेटी के साथ ज़मीन का सौदा करने या दावा छोड़ने का कोई कानूनी अधिकार (Jurisdiction) था ही नहीं [इंडेक्स]।
ख) भगवान (नाबालिग) के अधिकारों का हनन
भारतीय कानून के तहत किसी भी मंदिर के मूल आराध्य देव (Deity) को एक ‘विधिक व्यक्ति’ (Legal Person) माना जाता है जो कानून की नजर में हमेशा एक नाबालिग (Minor) की तरह होते हैं। किसी भी नाबालिग की संपत्ति को उसके ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ या संरक्षक अदालत की पूर्व अनुमति के बिना किसी समझौते में नहीं दे सकते। इस समझौते में भगवान के मूल अधिकारों की पूरी तरह अनदेखी की गई थी।
ग) राजनीतिक दबाव का आरोप
हिंदू पक्षकारों का यह भी आरोप है कि १९६८ का यह समझौता पूरी तरह से तत्कालीन राजनीतिक शक्तियों के दबाव में किया गया था ताकि बहुसंख्यक समाज को शांत रखा जा सके और तुष्टिकरण की नीति के तहत विवादित ढांचे को बचाया जा सके।
भाग-४ का निष्कर्ष
वर्ष १९६८ के इस समझौते ने तात्कालिक रूप से विवाद को भले ही शांत कर दिया हो, लेकिन इसने भविष्य के लिए एक बहुत बड़े कानूनी विवाद की नींव रख दी। हिंदू समाज इस समझौते को अपनी पीठ में छुरा घोंपने जैसा मानता रहा। यही कारण है कि अयोध्या राम मंदिर के फैसले के बाद, मथुरा के श्रीकृष्ण भक्तों ने इस समझौते की धज्जियां उड़ाने और अपनी पूरी
१३.३७ एकड़ भूमि वापस पाने के लिए आधुनिक अदालतों का रुख किया [इंडेक्स]।अगले और अंतिम भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-५ (अंतिम भाग) में हम चर्चा करेंगे—“आधुनिक कानूनी जंग, इलाहाबाद हाईकोर्ट का वर्तमान रुख, एएसआई (ASI) सर्वे की मांग और ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१’ की वैधानिक चुनौतियाँ”। हम जानेंगे कि वर्तमान समय में अदालतें इस मामले को किस दिशा में ले जा रही हैं और इस महा-विवाद का अंतिम सामाजिक व कानूनी समाधान क्या हो सकता है।