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मिट्टी की खुशबू: एक जीवन दर्शन

 

​ये मिट्टी है, हाँ जी ये मिट्टी है,

इसकी खुशबू से ख़ुद को जोड़िये।

चारों ओर यह बिखरी पड़ी है,

इसे एक नज़र भरकर तो देखिये।

 

​किसी ने भी, कभी भी,

इसके दर्द को न समझा है।

यह धूल बनकर न जाने,

कितनों को ख़ुद में समेटे उड़ता है।

 

​लोग इसे अपनी ज़रूरत पर,

कोड़-कोड़ कर ले जाते हैं।

और महज़ अपने शौक़ की ख़ातिर,

इसे गमलों में सजवाते हैं।

 

​अपने कोमल निश्चल भाव से,

इसे सारी दुनिया को सजाना है।

स्वभाव ही है इस माटी का—

कि उसे सबके काम ही आना है।

 

​हाँ जी, यह मिट्टी है जनाब,

जो एक दिन अपना रंग लाती है।

कभी दर्द की बात न कही इसने, क्योंकि—

हर टीस एक दिन इसी में समाती है।

 

 

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