सियासत भूख की

 

​भूख तो शायद मौत से भी बड़ी होती है,

सुबह मिटाओ, शाम को—

फिर सिरहाने आ खड़ी होती है।

 

​कैसी अजब यह दुनिया है,

जहाँ कोई भूख बढ़ाने के—

अजीब नुस्खे आज़माता है।

रात का खाया हुआ पचाने को,

तड़के मीलों तक टहलने जाता है।

 

​दूजी ओर हाथ खाली, गला सूखा है,

न जाने कब से यहाँ कोई पड़ा भूखा है।

राहगीरों की नज़र जहाँ टिक नहीं पाती,

देख यह मंज़र… इंसानियत पछताती है।

 

​कोई अजूबा नहीं, यह रीत पुरानी है,

जिसे जो न मिले, उसी की भूख दीवानी है।

कोई लाचार इंसान एक-एक अन्न को तरसता है,

कोई लालच में घर समेत इंसान को भछता है।

 

​कभी सन्नाटी रातों में ज़रा निकल जाना,

सड़क के किनारों का वह मंज़र देख आना।

जहाँ पेट को अपने नन्हे हाथों से दबाए,

मासूम परियाँ भी भूखी सो जाती हैं।

 

​यहाँ भूख ख़ामोशी में भी ज़ोर से रोती है,

हम सब जानकर भी पत्थर बने चुप हैं—

देख यह मंज़र… इंसानियत पछताती है।

 

 

 

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