असली वसीयत: वो ‘आवारा’ दोस्त महफ़िल सजी थी, दावत हुई, फिर सब विदा...
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केवल तुम और मैं: एक शाश्वत राग १९ वर्षों की इस यात्रा में,...
जब मैं तेरे बारे में किताब लिखूंगा… जब मैं तेरे बारे में किताब...
वो आ जाए तो नज़्म मुकम्मल हो जाए ज़मीं पे चाँद उतरा है,...
।। अवधपुरी का प्रकाश ।। भय प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी, बक्सर की...
अंगूठों की थिरकन में, दिन गुज़र जाते हैं, अपनों के पास होकर भी, दूर...
सच नंगा फिरता है, कोई पास नहीं आता, रेशम पहने झूठे से, हर कोई...
सिग्नल की चार लकीरें, जब मरघट सी सो जाती हैं, जुड़ी हुई ये सारी...
किताबों की सूखी हुई वो महक याद है, बिना बात के ही खिलखिलाना याद...
सवाल खड़ा सामने, बनकर कठिन सवाल, ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच, फंसा हुआ है...