अब स्याही की ज़रूरत क्या, जब चिप में सारा ज्ञान है? लेखक की उस...
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दो आँखों से देखा हमने, बस दुनिया का मेला है, छल, कपट और भीड़...
पास बैठे हैं सब, पर कोई पास नहीं, धड़कनों में अब पहले जैसी प्यास...
भय प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी, बक्सर की इस पावन रज पर, छटा अलौकिक...
जली जो लकड़ियाँ बाहर, क्या भीतर कुछ खाक हुआ? मिटा जो चेहरे का अंतर,...
गीत: श्रद्धा का संवाद (स्थायी) ए पुजारी रे! काहे को तू पूजा करत है?...
न जाने वो कहाँ चली गयी बिन उसके जीवन सजा हो गयी ...
आज अयोध्या में नया भोर है, नए भोर का यह समारोह है। हर...
कितने झंझावात आते, सबको उसने झेला था। जितने बाधा, कंटक आते, सबसे उसने खेला...
यदि दुनिया गुलाबी होती, तो जगत सजीवन होता। मानव सादगी से भरे होते,...