अंगूठों की थिरकन में, दिन गुज़र जाते हैं, अपनों के पास होकर भी, दूर...
Month: April 2026
सामने रोशन मंच सजा, किरदार बुलाते हैं, झूठी हँसी के गहने, सबको यहाँ सुहाते...
सच नंगा फिरता है, कोई पास नहीं आता, रेशम पहने झूठे से, हर कोई...
भीड़ भरी दुनिया में, मैं तन्हा सा रहता हूँ, खामोशी की चादर ओढ़े, मन...
सिग्नल की चार लकीरें, जब मरघट सी सो जाती हैं, जुड़ी हुई ये सारी...
किताबों की सूखी हुई वो महक याद है, बिना बात के ही खिलखिलाना याद...
सवाल खड़ा सामने, बनकर कठिन सवाल, ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच, फंसा हुआ है...
अब स्याही की ज़रूरत क्या, जब चिप में सारा ज्ञान है? लेखक की उस...
दो आँखों से देखा हमने, बस दुनिया का मेला है, छल, कपट और भीड़...
सन्नाटा है रात का, पर रौशन घर का कोना है, नींदों को कुछ दिन...