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गोस्वामी विट्ठलनाथ जी: अष्टछाप के संस्थापक और पुष्टिमार्ग के विस्तारक

 

परिचय और व्यक्तित्व

विट्ठलनाथ जी का जन्म सन् १५१५ (पौष कृष्ण नवमी) को काशी के समीप चरणाट ग्राम में हुआ था। वे वल्लभाचार्य जी के द्वितीय पुत्र थे। वे न केवल एक महान भक्त और दार्शनिक थे, बल्कि एक कुशल संगठक, संगीतज्ञ और कला मर्मज्ञ भी थे। उनके सौम्य और प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण ही उन्हें ‘गुसाईं जी’ की उपाधि मिली।

 

अष्टछाप’ की स्थापना: एक क्रांतिकारी कदम

विट्ठलनाथ जी का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य ‘अष्टछाप’ की स्थापना (सन् १५६५) है। उन्होंने अपने पिता के चार शिष्यों और अपने चार शिष्यों को चुनकर आठ कवियों की एक ऐसी मंडली बनाई, जिन्होंने भक्ति संगीत और काव्य के माध्यम से श्रीनाथ जी की सेवा को अमर कर दिया।

विट्ठलनाथ जी के स्वयं के चार प्रमुख शिष्य:

१. नंददास (जड़़िया कवि)

२. चतुर्भुजदास

३. गोविंदस्वामी

४. छीतस्वामी

 

अष्टयाम सेवा और कलात्मक अभिरुचि

विट्ठलनाथ जी ने मंदिर की सेवा-पद्धति को बहुत राजसी और कलात्मक बनाया। उन्होंने ‘अष्टयाम सेवा’ (आठ पहर की पूजा) को व्यवस्थित किया, जिसमें श्रृंगार, राग (संगीत) और भोग (पाक कला) को विशेष महत्व दिया गया।

कहा जाता है कि वे स्वयं बहुत अच्छे चित्रकार और रसोइया थे।

उनके समय में ही पुष्टिमार्गीय सेवा में ‘हवेली संगीत’ और छप्पन भोग जैसी परंपराओं ने भव्य रूप लिया।

 

मुग़ल दरबार और प्रभाव

विट्ठलनाथ जी का प्रभाव इतना व्यापक था कि तत्कालीन मुग़ल सम्राट अकबर भी उनका बहुत सम्मान करता था। अकबर ने उन्हें ‘गोकुल’ और ‘जतीपुरा’ की जागीरें भेंट की थीं और एक शाही फरमान के जरिए गोकुल में गो-वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। तानसेन जैसे महान संगीतज्ञ भी उनके प्रति श्रद्धा रखते थे।

 

प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ

विट्ठलनाथ जी ने संस्कृत और ब्रजभाषा दोनों में उत्कृष्ट साहित्य रचा। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं:

१. विद्वन्मण्डन: (ब्रह्मसूत्र पर आधारित दार्शनिक ग्रंथ)

२. शृंगार रसमण्डन: (भक्ति और श्रृंगार का अद्भुत समन्वय)

३. यमुनाष्टक: (यमुना जी की स्तुति)

४. स्वामिनी स्तोत्र और भक्तिहेतु निर्णय।

 

 

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