चतुर्भुजदास अष्टछाप के सबसे वरिष्ठ कवि कुंभनदास जी के कनिष्ठ पुत्र थे। पिता और पुत्र दोनों का एक साथ ‘अष्टछाप’ जैसी दिव्य मंडली में होना अपने आप में एक विलक्षण घटना है।
चतुर्भुजदास: अष्टछाप के कोमल हृदय कवि और कुंभनदास के सुपुत्र
परिचय और पारिवारिक पृष्ठभूमि
चतुर्भुजदास जी का जन्म संवत् १५८५ (सन् १५२८) के आसपास गोवर्धन के पास ‘जमुनावत’ गाँव में हुआ था। वे अष्टछाप के सबसे वरिष्ठ कवि कुंभनदास जी के सात पुत्रों में सबसे छोटे थे। चूँकि इनके पिता स्वयं पुष्टिमार्ग के महान स्तंभ थे, इसलिए भक्ति और संस्कार इन्हें विरासत में मिले थे। इन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से दीक्षा प्राप्त की थी।
पिता और पुत्र का अनूठा संगम
साहित्य के इतिहास में यह बहुत कम देखने को मिलता है कि पिता और पुत्र दोनों एक ही विशिष्ट मंडली के सदस्य हों। जहाँ कुंभनदास जी अपनी निर्भीकता और स्वाभिमान के लिए जाने जाते थे, वहीं चतुर्भुजदास जी अपनी सरलता और कोमल भावों के लिए प्रसिद्ध हुए। विट्ठलनाथ जी उन्हें बहुत स्नेह करते थे और उनकी भक्ति भावना की सराहना करते थे।
काव्यगत विशेषताएँ
चतुर्भुजदास जी के काव्य में भक्ति का बहुत ही सहज और माधुर्य पूर्ण रूप मिलता है।
सरस भाषा: उनकी भाषा अत्यंत सरल और हृदय को छूने वाली ब्रजभाषा है। उन्होंने क्लिष्ट शब्दों के स्थान पर भावपूर्ण शब्दावली का प्रयोग किया है।
लीला वर्णन: उनके पदों में कृष्ण की बाल-लीलाओं और विशेष रूप से ‘दानलीला’ का बहुत सुंदर वर्णन मिलता है।
भक्ति का स्वरूप: उनके पदों में एक बालक जैसी निश्छल भक्ति और अपने आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाई देता है।
प्रमुख कृतियाँ
चतुर्भुजदास जी की रचनाएँ संख्या में अधिक नहीं हैं, लेकिन वे गुणवत्ता में बहुत श्रेष्ठ हैं:
१. द्वादश यश: इसमें कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का बारह अध्यायों में वर्णन है।
२. भक्ति-प्रताप: यह उनकी भक्ति भावना को दर्शाने वाला ग्रंथ है।
३. हितजू को मंगल: यह भी उनकी एक महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है।
इसके अतिरिक्त उनके स्वतंत्र पद ‘चतुर्भुजदास के पद’ के नाम से संकलित हैं।
महाप्रयाण
चतुर्भुजदास जी ने अपना पूरा जीवन गोवर्धन की तलहटी में श्रीनाथ जी की सेवा में व्यतीत किया। संवत् १६४२ के आसपास, अपने पिता के देहावसान के कुछ समय बाद ही उन्होंने भी अपनी देह त्याग दी।
८. चतुर्भुजदास