महादेव गोविन्द रानाडे: आधुनिक भारत के आर्थिक विचारक और समाज सुधार के अग्रदूत
प्रस्तावना
न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानाडे आधुनिक भारतीय इतिहास के उन गिने-चुने मनीषियों में से हैं, जिन्हें ‘पश्चिम भारत के पुनर्जागरण का पिता’ कहा जाता है। वे न केवल एक उच्च कोटि के न्यायविद थे, बल्कि एक प्रखर अर्थशास्त्री, समाज सुधारक और शिक्षाविद भी थे। उन्होंने भारतीय समाज की जड़ता को तोड़ने के लिए संस्थागत सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
महादेव गोविन्द रानाडे का जन्म १८ जनवरी, १८४२ को महाराष्ट्र के नासिक जिले के निफाड में हुआ था। उनकी शिक्षा एलिफिंस्टन कॉलेज, मुंबई में हुई—वही संस्थान जिसकी नींव नाना शंकरशेठ ने रखी थी और जहाँ जंभेकर जी व दादाभाई नौरोजी जैसे दिग्गजों ने अध्यापन किया था। रानाडे अपनी मेधा के कारण कॉलेज के सबसे चमकते सितारों में से एक थे।
गुरु-शिष्य परंपरा और दादाभाई का प्रभाव
रानाडे, दादाभाई नौरोजी के आर्थिक विचारों से गहरे प्रभावित थे। उन्होंने दादाभाई के ‘धन के निष्कासन’ (Drain of Wealth) के सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए भारतीय उद्योगों और कृषि के पुनरुत्थान के लिए व्यवहारिक योजनाएं पेश कीं।
संस्थागत दृष्टि: जहाँ जंभेकर जी ने चेतना जगाई, वहीं रानाडे ने उस चेतना को ‘संस्था’ में बदला। उन्होंने ‘पुणे सार्वजनिक सभा’ और बाद में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
समाज सुधार: एक व्यापक दृष्टिकोण
रानाडे का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है जब तक समाज भीतर से मज़बूत न हो। उन्होंने समाज सुधार के लिए ‘प्रार्थना समाज’ के माध्यम से कार्य किया:
स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह: उन्होंने विधवा विवाह संघ (Widow Marriage Association) की स्थापना की और महिला शिक्षा के लिए निरंतर प्रयास किए।
समानता का संदेश: वे जातिवाद और छुआछूत के घोर विरोधी थे। उनका प्रसिद्ध कथन था— “आप एक हाथ से राजनीति और दूसरे हाथ से समाज सुधार को अलग नहीं रख सकते।”
भारतीय अर्थशास्त्र के जनक
रानाडे को अक्सर ‘भारतीय अर्थशास्त्र का जनक’ कहा जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि पश्चिमी अर्थशास्त्र के सिद्धांत (जैसे पूर्णतः मुक्त व्यापार) भारत जैसी औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था पर सीधे लागू नहीं किए जा सकते।
संरक्षणवाद: उन्होंने भारतीय उद्योगों को बचाने के लिए सरकारी संरक्षण की वकालत की।
स्वदेशी का आधार: उनके आर्थिक विचारों ने ही आगे चलकर स्वदेशी आंदोलन को वैचारिक शक्ति प्रदान की।
गुरु के रूप में योगदान: गोखले और तिलक
रानाडे का सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा तैयार किए गए नेतृत्व में है। गोपाल कृष्ण गोखले उन्हें अपना ‘राजनैतिक गुरु’ मानते थे। यहाँ तक कि लोकमान्य तिलक के साथ वैचारिक मतभेद होने के बावजूद, तिलक भी रानाडे की विद्वत्ता और राष्ट्रभक्ति का हृदय से सम्मान करते थे।
उपसंहार
१६ जनवरी, १९०१ को महादेव गोविन्द रानाडे का निधन हुआ। उन्होंने बालशास्त्री जंभेकर की पत्रकारिता, नाना शंकरशेठ की दूरदर्शिता और दादाभाई नौरोजी के अर्थशास्त्र को एक सूत्र में पिरोकर आधुनिक भारत का ‘बौद्धिक ढांचा’ तैयार किया। वे एक ऐसे मार्गदर्शक थे जिन्होंने सिखाया कि ठंडे दिमाग और तार्किक सोच से भी बड़ी क्रांतियां की जा सकती हैं।
दादाभाई नौरोजी की जीवनी: धन के निष्कासन का सिद्धांत और स्वराज का शंखनाद