अष्टछाप के सातवें रत्न छीतस्वामी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि गुरु की कृपा कैसे एक विद्रोही और उद्दंड व्यक्ति को परम शांत भक्त में बदल सकती है।
छीतस्वामी: मथुरा के ‘पंडा’ से अष्टछाप के अनन्य भक्त बनने की गाथा
परिचय और प्रारंभिक जीवन
छीतस्वामी का जन्म संवत् १५६७ (सन् १५१०) के आसपास मथुरा के एक संपन्न चौबे (पंडा) परिवार में हुआ था। अष्टछाप के अन्य कवियों के विपरीत, छीतस्वामी प्रारंभ में बड़े ही उद्दंड, चंचल और विनोदी स्वभाव के थे। वे मथुरा के पंडा थे और राजाओं-महाराजाओं तक को अपनी बातों से छका देते थे।
हृदय परिवर्तन: गोस्वामी विट्ठलनाथ जी की कृपा
छीतस्वामी के जीवन में बदलाव की घटना बड़ी रोचक है। कहा जाता है कि वे गोस्वामी विट्ठलनाथ जी की परीक्षा लेने के उद्देश्य से उनके पास गए थे। वे अपने साथ खोटा सिक्का और थोथा नारियल लेकर गए, ताकि वे उन्हें ठग सकें। लेकिन विट्ठलनाथ जी के अलौकिक व्यक्तित्व और उनकी दिव्य दृष्टि का उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे उनके चरणों में गिर पड़े।
वहीं उन्होंने दीक्षा ली और अपने पुराने स्वभाव को त्याग कर पूर्णतः कृष्ण भक्ति में लीन हो गए। विट्ठलनाथ जी ने उन्हें अष्टछाप में स्थान दिया।
काव्यगत विशेषताएँ
छीतस्वामी के पदों में स्वाभाविकता और ब्रज की संस्कृति का गहरा पुट मिलता है।
ब्रज और चतुर्वेदी संस्कृति: चूँकि वे स्वयं मथुरा के चौबे थे, इसलिए उनके काव्य में ब्रज के रीति-रिवाजों और वहाँ की विशिष्ट शब्दावली का सुंदर प्रयोग मिलता है।
भक्ति का स्वरूप: उनके पदों में आत्म-निवेदन और अपने गुरु (विट्ठलनाथ जी) के प्रति अगाध श्रद्धा दिखाई देती है। वे स्वयं को ‘विट्ठल गिरधरन’ का भक्त कहते थे।
रचना संसार: उनके द्वारा रचित पदों का संग्रह छीतस्वामी के पद’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें लगभग २०० पद उपलब्ध हैं।
ब्रजभूमि के प्रति अनन्य प्रेम
छीतस्वामी को ब्रजभूमि से इतना लगाव था कि वे मथुरा और गोवर्धन छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहते थे। उनका एक पद अत्यंत प्रसिद्ध है:
“अहो बिधना तोसों विनय करूँ, जहँ-जहँ देहि निवास।
तहाँ-तहाँ ब्रज के बन-उपवन, यमुना कूल निवास॥”
महाप्रयाण
छीतस्वामी ने अपना शेष जीवन पुष्टिमार्गीय सेवा और कीर्तन में बिताया। संवत् १६४२ के आसपास गोवर्धन की पावन रज में उन्होंने अपनी देह त्यागी।