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अष्टछाप के छठे रत्न—गोविंदस्वामी केवल कवि नहीं, बल्कि अपने समय के इतने बड़े संगीतज्ञ थे कि संगीत सम्राट तानसेन भी अक्सर इनसे गायन सीखने और इनके पदों की बंदिशें सुनने गोवर्धन आया करते थे।

 

गोविंदस्वामी: अष्टछाप के महान संगीतज्ञ और कृष्ण-भक्ति के अनन्य गायक

 

परिचय और प्रारंभिक जीवन

गोविंदस्वामी जी अष्टछाप के कवियों में अपनी शास्त्रीय संगीत की कुशलता के लिए विख्यात हैं। इनका जन्म संवत् १५६२ (सन् १५०५) के आसपास राजस्थान के भरतपुर जिले के ‘आंतरी’ गाँव में हुआ था। वे जन्म से ही विरक्त स्वभाव के थे और संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। प्रारंभ में वे एक ‘पंडा’ के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे थे, लेकिन बाद में गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से दीक्षा लेकर पुष्टिमार्ग में दीक्षित हुए।

 

संगीत का जादू: जब तानसेन भी खिंचे चले आए

गोविंदस्वामी जी के बारे में एक बहुत ही प्रसिद्ध प्रसंग है कि वे संगीत के इतने प्रकांड पंडित थे कि मुगल सम्राट अकबर के दरबारी गायक तानसेन भी उनके पदों का गायन सुनने के लिए छिपकर गोवर्धन की तलहटी में आया करते थे। तानसेन ने स्वयं स्वीकार किया था कि गोविंदस्वामी के पदों में जो ‘राग’ और ‘भाव’ का समन्वय है, वह अलौकिक है।

 

कदम्ब खंडी: गोविंदस्वामी का निवास

गोवर्धन में एक स्थान है ‘कदम्ब खंडी’। यहाँ गोविंदस्वामी जी ने बहुत सारे कदम्ब के वृक्ष लगाए थे और वे वहीं बैठकर कृष्ण की लीलाओं का गान किया करते थे। आज भी वह स्थान उनकी स्मृतियों को संजोए हुए है। वे श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन सेवा के मुख्य स्तंभों में से एक थे।

 

काव्यगत विशेषताएँ

गोविंदस्वामी जी की रचनाओं में ब्रज का प्राकृतिक सौंदर्य और कृष्ण की लीलाओं का बहुत ही सजीव वर्णन मिलता है।

पदों की सरलता: उनके पदों की भाषा सरल, सरस और संगीत के अनुकूल है।

भाव पक्ष: उनके काव्य में सख्य भाव (मित्रता का भाव) और वात्सल्य की प्रधानता है।

रचना संसार: उनका कोई स्वतंत्र ग्रंथ तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनके द्वारा रचित लगभग २५०-३०० पद ‘गोविंदस्वामी के पद’ के नाम से संकलित हैं।

 

ब्रज प्रेम और विरक्ति

वे ब्रजभूमि से इतना प्रेम करते थे कि उन्होंने कभी गोवर्धन को नहीं छोड़ा। वे कहते थे कि श्रीनाथ जी के चरणों की रज में जो आनंद है, वह वैकुंठ में भी नहीं। संवत् १६४२ के आसपास उन्होंने इसी पावन भूमि पर अपनी देह त्यागी।

 

कृष्णदास

 

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