Gyanvapi-Mosque-Aurangzeb

काशी विश्वनाथ मंदिर बनाम ज्ञानवापी परिसर: भाग-२ (सन १६६९: औरंगज़ेब का शाही फरमान, आदि विश्वेश्वर मंदिर का विध्वंस और ज्ञानवापी का पेंच)

(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का दूसरा भाग है। पहले भाग में हमने आदि विश्वेश्वर मंदिर के पौराणिक महत्व, कुतुबुद्दीन ऐबक के हमले और सन १५८५ में राजा टोडरमल द्वारा कराए गए भव्य निर्माण का विश्लेषण किया था। इस भाग में हम इतिहास के उस सबसे काले अध्याय को समझेंगे, जब मुग़ल शासक औरंगज़ेब के एक क्रूर फरमान ने काशी के इस परम पावन केंद्र को लहूलुहान कर दिया था।)
सन १५८५ में राजा टोडरमल और नारायण भट्ट के प्रयासों से निर्मित आदि विश्वेश्वर का भव्य मंदिर लगभग आठ दशकों तक काशी की आध्यात्मिक चेतना का मुख्य स्तंभ बना रहा। लेकिन दिल्ली की गद्दी पर जब मुग़ल वंश का सबसे असहिष्णु शासक मुहद्दीन मोहम्मद औरंगज़ेब बैठा, तो उसने सनातन संस्कृति के इस सबसे बड़े केंद्र को समूल नष्ट करने की योजना बनाई। औरंगज़ेब द्वारा कराया गया यह विध्वंस केवल एक धार्मिक स्थल को तोड़ना नहीं था, बल्कि यह बहुसंख्यक हिंदू समाज को मानसिक रूप से पराजित करने का एक क्रूर और सोचा-समझा प्रयास था।
आइए इस दूसरे भाग में औरंगज़ेब के उस लिखित शाही फरमान, मंदिर के विध्वंस और वर्तमान ज्ञानवापी मस्जिद के निर्माण के प्रामाणिक इतिहास को गहराई से समझते हैं।

१. ९ अप्रैल १६६९: औरंगज़ेब का आधिकारिक शाही फरमान

मथुरा के केशवदेव मंदिर की तरह ही, काशी विश्वनाथ मंदिर के विध्वंस का सबसे बड़ा और अकाट्य लिखित प्रमाण किसी हिंदू ग्रंथ में नहीं, बल्कि स्वयं मुगलों के आधिकारिक और समकालीन दरबारी दस्तावेजों में मिलता है।
  • ‘मासिर-ए-आलमगीरी’ का साक्ष्य: औरंगज़ेब के दरबारी इतिहासकार साकी मुस्तैद खान द्वारा फारसी में लिखे गए ग्रंथ ‘मासिर-ए-आलमगीरी’ (Maasir-i-Alamgiri) में साफ दर्ज है कि ९ अप्रैल १६६९ को शहंशाह ने एक शाही फरमान जारी किया था।
  • फरमान का विवरण: इस फरमान के तहत साम्राज्य के सभी सूबेदारों और गवर्नरों को आदेश दिया गया था कि वे काफिरों (हिंदुओं) के मंदिरों और स्कूलों को पूरी तरह से नष्ट कर दें और उनके धार्मिक शिक्षण व मूर्ति पूजा की गतिविधियों पर कड़ा प्रतिबंध लगा दें। इस आदेश का सबसे पहला और मुख्य निशाना काशी का आदि विश्वेश्वर मंदिर ही बना।


२. सितंबर १६६९: आदि विश्वेश्वर मंदिर का क्रूर विध्वंस

शाही फरमान जारी होने के कुछ ही महीनों बाद, अगस्त-सितंबर १६६९ में मुग़ल सेनापतियों के नेतृत्व में एक विशाल सेना ने काशी पर धावा बोल दिया।

ज्ञानवापी कुएं का बलिदान और इतिहास

  • मुग़ल सेना का क्रूर प्रहार: मुग़ल सैनिकों ने मंदिर को चारों तरफ से घेर लिया और उसके भव्य गगनचुम्बी शिखरों, मंडपों और नक्काशीदार अष्टकोणीय दीवारों को तोपों और हथौड़ों से ढहाना शुरू कर दिया।
  • ज्योतिर्लिंग की रक्षा: लोक मान्यताओं और काशी के पारंपरिक पुरोहितों के दस्तावेजी ब्योरों के अनुसार, जब मुग़ल सेना मुख्य गर्भगृह की ओर बढ़ी, तो मंदिर के मुख्य पुजारी ने स्वयंभू ज्योतिर्लिंग की पवित्रता को बचाने के लिए उसे अपनी गोद में उठा लिया। ज्योतिर्लिंग को खंडित होने से बचाने के लिए वे मंदिर प्रांगण में ही स्थित पवित्र ‘ज्ञानवापी कुएं’ (Gyanvapi Well) में कूद गए। यही कारण है कि हिंदू समाज आज भी ज्ञानवापी कुएं को साक्षात विग्रह और परम पूज्य मानता है।

                  [ राजा टोडरमल का निर्मित आदि विश्वेश्वर मंदिर ]
                                         │
                       (सितंबर १६६९: मुग़ल सेना का बर्बर हमला)
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   [ पश्चिमी दीवार को छोड़ दिया ]                          [ मुख्य गर्भगृह का विध्वंस ]
 • मंदिर के मलबे और खंभों का उपयोग।                    • मुख्य शिखर और देव प्रतिमाएं तोड़ी गईं।
 • मंदिर की मूल संरचना पर मस्जिद खड़ी की।                • ज्योतिर्लिंग की रक्षा हेतु कुएं में छलांग।


३. जानबूझकर छोड़ी गई ‘पश्चिमी दीवार’ और ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण

औरंगज़ेब की सेना ने आदि विश्वेश्वर मंदिर को पूरी तरह से मलबे में तब्दील नहीं किया। उसने जानबूझकर एक ऐसी चालाकी की जो आज ३५० साल बाद भी इस पूरे विवाद की मुख्य कानूनी और भौतिक जड़ बनी हुई है।
  • पश्चिमी दीवार (The Western Wall) का सच: मुग़ल कारीगरों ने मंदिर की मुख्य पश्चिमी दीवार को पूरी तरह सुरक्षित छोड़ दिया। इस दीवार पर प्राचीन हिंदू स्थापत्य कला की महीन नक्काशी, घंटियाँ, कलश और मांगलिक प्रतीक साफ दिखाई देते हैं। इसी बची हुई हिंदू दीवार को आधार (Foundation) बनाकर उसके ऊपर वर्तमान ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ का मुख्य ढांचा और गुंबद खड़े कर दिए गए।
  • मंदिर के खंभों का पुनरुत्पादन: मस्जिद के भीतर और उसके प्रवेश द्वारों पर जो खंभे और मेहराबें इस्तेमाल की गईं, वे शुद्ध रूप से टोडरमल कालीन मंदिर की थीं। मलबे के पत्थरों को उलट-पुलट कर मस्जिद की दीवारों में चिनवा दिया गया। औरंगज़ेब का उद्देश्य यह संदेश देना था कि उसने सनातन धर्म के सबसे बड़े केंद्र को जीतकर उस पर इस्लाम की विजय का प्रतीक खड़ा कर दिया है।


भाग-२ का निष्कर्ष

सन १६६९ के इस भयंकर विध्वंस के बाद, बाबा विश्वनाथ का मूल गर्भगृह आँसुओं और गुलामी के मलबे के नीचे दब गया। लेकिन मुगलों की यह बर्बरता काशी के हिंदुओं की आत्मा को डिगा नहीं सकी। मंदिर टूटने के अगले ही दिन से हिंदुओं ने मस्जिद की उसी बची हुई बाहरी पश्चिमी दीवार (जिसे बाद में श्रृंगार गौरी कहा गया) के पास और ज्ञानवापी कुएं के सामने बैठकर अपनी पूजा-अर्चना और परिक्रमा को अनवरत जारी रखा। मुगलों के कमजोर होते ही, इस पावन स्थान की मुक्ति और एक नए मंदिर के निर्माण का संघर्ष एक बार फिर शुरू हो गया।

अगले भाग की ओर:

इस श्रृंखला के भाग-३ में हम चर्चा करेंगे—“इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर का आगमन, वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण (१७८०) और महाराजा रणजीत सिंह का स्वर्ण दान” हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे १११ वर्षों के लंबे इंतजार के बाद महारानी अहिल्याबाई ने मस्जिद के ठीक बगल में वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया और कैसे इस धार्मिक केंद्र को उसका खोया हुआ वैभव वापस मिला।

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