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काशी विश्वनाथ मंदिर बनाम ज्ञानवापी परिसर: भाग-३ (महारानी अहिल्याबाई होल्कर का संकल्प, वर्तमान मंदिर का निर्माण और महाराजा रणजीत सिंह का स्वर्ण दान)

(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का तीसरा भाग है। पिछले दो भागों में हमने आदि विश्वेश्वर मंदिर के प्राचीन गौरव और सन १६६९ में औरंगज़ेब द्वारा किए गए क्रूर विध्वंस का विश्लेषण किया था। इस भाग में हम जानेंगे कि कैसे १११वर्षों के लंबे संघर्ष और इंतजार के बाद काशी को उसका नया भव्य स्वरूप मिला और कैसे मराठों तथा सिखों ने मिलकर बाबा विश्वनाथ के दरबार को पुनः सुसज्जित किया।)
सन १६६९ में औरंगज़ेब द्वारा आदि विश्वेश्वर मंदिर को तोड़े जाने के बाद लगभग एक सदी से अधिक समय तक काशी के हिंदू समाज ने गहरा दर्द झेला। मूल ज्योतिर्लिंग का स्थान मस्जिद के गुंबदों के नीचे दबा था और हिंदू श्रद्धालु मलबे के अवशेषों के पास ही पूजा करने को मजबूर थे। मुगलों के कमजोर होने और देश में मराठा साम्राज्य के विस्तार के साथ ही इस पावन नगरी के पुनरुद्धार की सुगबुगाहट तेज हुई। अंततः, मालवा की एक महान शिवभक्त रानी के संकल्प ने काशी को वह वर्तमान स्वरूप दिया, जिसके दर्शन आज हम करते हैं।
आइए इस तीसरे भाग में महारानी अहिल्याबाई होल्कर के ऐतिहासिक निर्माण और राजाओं द्वारा दिए गए वैभवशाली दानों के इतिहास को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

१. महारानी अहिल्याबाई होल्कर का दिव्य संकल्प (१७८० ईस्वी)

१७वीं और १८वीं शताब्दी में मराठा पेशवाओं (जैसे प्रथम बाजीराव) और नागपुर के भोंसले राजाओं ने कई बार ज्ञानवापी मस्जिद के स्थान पर दोबारा आदि विश्वेश्वर मंदिर बनाने के लिए जमीन खरीदने और बातचीत के प्रयास किए, लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल के कारण वे पूरी तरह सफल नहीं हो सके।

वर्तमान मंदिर का निर्माण

  • महारानी अहिल्याबाई का आगमन: इंदौर (मालवा) की न्यायप्रिय और परम शिवभक्त महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने काशी के इस सांस्कृतिक घाव को भरने का निर्णय लिया। मान्यताओं के अनुसार, स्वयं भगवान शिव ने उन्हें सपने में दर्शन देकर मंदिर पुनर्निर्माण की प्रेरणा दी थी।
  • मस्जिद के ठीक बगल में निर्माण: चूंकि औरंगज़ेब द्वारा निर्मित ज्ञानवापी मस्जिद वाले मूल स्थान पर कड़ा सुरक्षा और राजनीतिक पेंच था, इसलिए महारानी ने बिना किसी सांप्रदायिक टकराव के, सन १७८० ईस्वी में उस विवादित ढांचे के ठीक बगल की जमीन पर एक नए और भव्य ‘काशी विश्वनाथ मंदिर’ का निर्माण कराया। यह वही मंदिर है जिसे आज हम मुख्य परिसर के रूप में देखते हैं।


२. महाराजा रणजीत सिंह का स्वर्ण दान और राजाओं का सहयोग

महारानी अहिल्याबाई द्वारा मंदिर की स्थापना किए जाने के बाद, भारत के विभिन्न राजघरानों ने इस दरबार को और अधिक भव्य बनाने के लिए अपना-अपना ऐतिहासिक योगदान दिया:
  • सिख साम्राज्य का स्वर्ण दान (१८३५): पंजाब के महान सिख शासक शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह की बाबा विश्वनाथ के प्रति अटूट श्रद्धा थी। सन १८३५ ईस्वी में उन्होंने मंदिर के शिखरों को सुसज्जित करने के लिए २२ मन (लगभग ८२० किलोग्राम) शुद्ध सोना दान किया था। इस सोने से मंदिर के दो मुख्य शिखरों और गुंबदों पर सोने की भव्य परत (Plating) चढ़ाई गई, जिससे इसे ‘गोल्डन टेम्पल’ के रूप में भी ख्याति मिली।
  • नेपाल के राजा का योगदान: नेपाल के राजा ने मंदिर परिसर के भीतर स्थापित करने के लिए एक विशाल और अत्यंत सुंदर कांसे (Bronze) का नंदी (Nandi) बैल उपहार में भेजा था, जो आज भी मुख्य गर्भगृह के सामने स्थापित है।
  • ग्वालियर की महारानी बैजाबाई: ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी कुएं के चारों ओर एक भव्य नक्काशीदार मंडप और कोलोनेड (खंभों की कतार) का निर्माण कराया, ताकि पवित्र कुएं और वहां स्थापित प्रतीकों को सुरक्षित रखा जा सके।

                  [ औरंगज़ेब द्वारा निर्मित ज्ञानवापी ढांचा ]
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                   (१७८०: ठीक बगल में अहिल्याबाई द्वारा निर्माण)
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                  [ वर्तमान भव्य काशी विश्वनाथ मंदिर ]
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     [ महाराजा रणजीत सिंह ]                                [ अन्य राजाओं का सहयोग ]
• १८३५ में ८२० किलो सोना दान किया।                     • नेपाल के राजा द्वारा भव्य नंदी की स्थापना।
• मंदिर के शिखरों पर चढ़ी स्वर्ण परत।                  • महारानी बैजाबाई द्वारा कुएं का सुसज्जित मंडप।


३. वास्तुकला की विसंगति: नंदी का मुख और ज्ञानवापी का पेंच

महारानी अहिल्याबाई द्वारा बनाए गए नए मंदिर और पुराने ज्ञानवापी ढांचे के बीच एक ऐसा भौगोलिक और धार्मिक प्रमाण मौजूद है, जो स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से हिंदू पक्ष का सबसे बड़ा दावा बनता है:
  • नंदी का मुख (The Direction of Nandi): सनातन परंपरा के अनुसार, किसी भी शिव मंदिर में भगवान शिव के वाहन ‘नंदी’ का मुख हमेशा मुख्य शिवलिंग की ओर होता है।
  • विवादित ढांचे की ओर इशारा: वर्तमान काशी विश्वनाथ परिसर में स्थापित विशाल नंदी का मुख आज के मंदिर के गर्भगृह की ओर नहीं है; बल्कि उनका मुख मस्जिद के भीतरी हिस्से (वज़ूखाने की दीवार) की तरफ है। हिंदू पक्षकारों का यह एक अकाट्य और तार्किक दावा है कि नंदी आज भी सदियों पुराने उसी आदि विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की ओर देख रहे हैं, जिसे औरंगज़ेब ने मस्जिद के नीचे छिपा दिया था।


भाग-३ का निष्कर्ष

१८वीं और १९वीं शताब्दी के इन प्रयासों से काशी को उसका धार्मिक वैभव तो वापस मिल गया, लेकिन मूल जन्मस्थान और आदि विश्वेश्वर का वास्तविक गर्भगृह आज भी विवादित ढांचे के बंधक में था। अंग्रेजों के भारत आने के साथ ही, यह विवाद तलवारों से निकलकर कागजी दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड्स की जंग में बदल गया, जिसने आज़ादी के बाद भारतीय अदालतों में एक अंतहीन कानूनी लड़ाई का रूप ले लिया।

अगले भाग की ओर:

इस श्रृंखला के भाग-४ में हम चर्चा करेंगे—“आज़ादी के बाद की कानूनी जंग, वर्ष १९९१ का पहला मुख्य सिविल सूट और ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ का कानूनी पेंच” हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे वर्ष १९९१ में पंडित सोमनाथ व्यास व अन्य ने पहली बार ज्ञानवापी के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया और कैसे केंद्र सरकार के एक विशेष कानून ने इस लड़ाई को और अधिक जटिल बना दिया।

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