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काशी विश्वनाथ मंदिर बनाम ज्ञानवापी परिसर: भाग-१ (प्राचीन आदि विश्वेश्वर मंदिर का वैभव और इतिहास के शुरुआती पन्ने)

 

“काशी के कण-कण में शिव हैं।”
देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक राजधानी कही जाने वाली मोक्षनगरी काशी (वाराणसी) का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना खुद मानव सभ्यता। लेकिन अयोध्या और मथुरा की तरह ही, बाबा विश्वनाथ की यह पावन नगरी भी सदियों से विदेशी आक्रांताओं के बर्बर हमलों, सांस्कृतिक विध्वंस और वर्तमान समय में देश की सबसे बड़ी वैज्ञानिक व कानूनी लड़ाई का केंद्र बनी हुई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट, वाराणसी जिला अदालत और देश की सर्वोच्च अदालत में यह मामला आज अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है।
इस नई विशेष श्रृंखला के पहले भाग में हम काशी के उसी प्राचीन अविनाशी वैभव, आदि विश्वेश्वर मंदिर के ऐतिहासिक उद्गम और विदेशी आक्रांताओं के शुरुआती हमलों के इतिहास का प्रामाणिक विश्लेषण करेंगे।

१. आदि विश्वेश्वर: अविनाशी काशी का मूल गर्भगृह

धार्मिक ग्रंथों, स्कंद पुराण के ‘काशी खंड’ और उपनिषदों के अनुसार, काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई एक ऐसी नगरी है जिसका प्रलय काल में भी विनाश नहीं होता। इस नगरी के केंद्र में स्थित ‘आदि विश्वेश्वर’ वह मूल स्थान है जहाँ महादेव स्वयं ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए थे।
  • ज्ञानवापी शब्द का पौराणिक अर्थ: ‘ज्ञानवापी’ दो शब्दों से मिलकर बना है—‘ज्ञान’ और ‘वापी’ (कुआँ)। शिव महापुराण के अनुसार, स्वयं भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से इस कुएं का निर्माण किया था ताकि इसके पवित्र जल से ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया जा सके। यह कुआँ आज भी विवादित ज्ञानवापी परिसर के भीतर मौजूद है, जिसे हिंदू पक्ष ज्ञान का स्रोत और साक्षात शिव का निवास मानता है।
  • पहला ऐतिहासिक भव्य निर्माण: पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, ईसा पूर्व ११वीं शताब्दी में राजा हरीशचंद्र के काल और बाद में सम्राट विक्रमादित्य के दौर में इस स्थान पर अत्यंत भव्य और विशाल शिव मंदिर का निर्माण कराया गया था, जिसकी नक्काशी और सौंदर्य की चर्चा प्राचीन चीनी यात्रियों के वृत्तांतों में भी मिलती है।


२. पहला बड़ा आघात: कुतुबुद्दीन ऐबक का आक्रमण (११९४ ईस्वी)

गुप्त साम्राज्य और राजा हर्षवर्धन के काल में आदि विश्वेश्वर मंदिर का वैभव चरम पर था। लेकिन १२वीं शताब्दी के अंत में उत्तर भारत पर इस्लामिक आक्रांताओं के काले बादल मंडराने लगे।

मोहम्मद गोरी और ऐबक की क्रूरता

  • सन ११९४ का विध्वंस: तराइन के युद्ध के बाद जब मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने कन्नौज के राजा जयचंद को हराया, तो उसने काशी की ओर रुख किया। ऐबक ने हिंदुओं की आस्था को कुचलने के लिए आदि विश्वेश्वर के भव्य मंदिर को पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया और वहां की अकूत संपत्ति लूट ली।
  • महानारायण मंदिर का निर्माण (१३वीं सदी): इस भयंकर विध्वंस के बाद भी काशी के हिंदुओं का संकल्प नहीं टूटा। सन १२३० ईस्वी में गुजरात के एक परम प्रतापी व्यापारी और शिवभक्त वस्तुपाल की मदद से स्थानीय राजा ने मंदिर का पुनरुद्धार कराया। बाद में जौनपुर के शर्की सुल्तानों और सिकंदर लोदी के शासनकाल में भी इस मंदिर को आंशिक क्षति पहुंचाई गई, लेकिन यह स्थान हिंदुओं के अधिकार में ही रहा।

                  [ प्राचीन आदि विश्वेश्वर मंदिर ]
                                  │
               (११९४: कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा विध्वंस)
                                  │
                  [ सन १२३०: हिंदुओं द्वारा पुनर्निर्माण ]
                                  │
                    ▼ (अकबर के काल में चौथा भव्य निर्माण) ▼
       • १५८५: राजा टोडरमल और नारायण भट्ट का ऐतिहासिक प्रयास।
       • स्थापत्य कला का बेजोड़ अष्टकोणीय (Octagonal) नक्शा।


३. राजा टोडरमल और नारायण भट्ट का स्वर्णिम काल (१५८५ ईस्वी)

मुगल काल में जब अकबर दिल्ली का बादशाह बना, तो उसकी राजपूत नीतियों के कारण हिंदू राजाओं को अपने धर्मस्थलों के पुनरुद्धार का अवसर मिला। इस दौर में आदि विश्वेश्वर मंदिर को उसका सबसे भव्य और व्यवस्थित स्वरूप प्राप्त हुआ।

राजा टोडरमल का ऐतिहासिक योगदान

  • १५८५ का अद्वितीय निर्माण: अकबर के नवरत्नों में शामिल और मुग़ल साम्राज्य के दीवान राजा टोडरमल ने काशी के प्रख्यात विद्वान नारायण भट्ट के साथ मिलकर सन १५८५ में आदि विश्वेश्वर मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण कराया।
  • स्थापत्य का बेजोड़ नक्शा: यह मंदिर उस समय की वास्तुकला का एक अद्भुत चमत्कार था। यह एक अष्टकोणीय (Octagonal) योजना पर आधारित था, जिसमें एक मुख्य केंद्रीय गर्भगृह था और उसके चारों ओर आठ छोटे मंडप (सभागार) बनाए गए थे। मंदिर के निर्माण में चुनार के कीमती लाल बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया था। यही वह ऐतिहासिक मंदिर था जिसे आगे चलकर औरंगज़ेब की क्रूरता का सामना करना पड़ा और जिसके अवशेष आज भी वर्तमान ज्ञानवापी मस्जिद के ढांचे के रूप में साफ नजर आते हैं।


भाग-१ का निष्कर्ष

काशी के आदि विश्वेश्वर मंदिर ने अपने इतिहास के शुरुआती डेढ़ हजार वर्षों में ही वैभव, अटूट आस्था और विदेशी आक्रांताओं के मजहबी उन्माद के कई दौर देखे। सनातन समाज ने हर चोट के बाद अपनी श्रद्धा के बल पर वहां दोबारा एक नया और भव्य मंदिर खड़ा कर दिया। लेकिन इस पावन ज्योतिर्लिंग का सबसे काला और कठिन दौर सन १६६९ में आना अभी बाकी था, जब दिल्ली की गद्दी पर क्रूर मुग़ल शासक औरंगज़ेब बैठा, जिसने इस भव्य मंदिर को हमेशा के लिए मिटाने का एक खूनी ताना-बाना बुना।

अगले भाग की ओर:

इस श्रृंखला के भाग-२ में हम चर्चा करेंगे—“सन १६६९: औरंगज़ेब का खूनी शाही फरमान, आदि विश्वेश्वर मंदिर का विध्वंस और ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण” हम आधिकारिक मुग़ल दस्तावेजों के आधार पर जानेंगे कि कैसे औरंगज़ेब ने मंदिर को तोड़कर उसकी पश्चिमी दीवार पर मस्जिद खड़ी करने का लिखित आदेश दिया, और कैसे स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को बचाने के लिए उस रात मंदिर के मुख्य पुजारी ज्ञानवापी कुएं में कूद गए थे।

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