काशी विश्वनाथ मंदिर बनाम ज्ञानवापी परिसर: भाग-४ (आज़ादी के बाद की कानूनी जंग, वर्ष १९९१ का मुख्य मुकदमा और ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ का पेंच)
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का चौथा भाग है। पिछले तीन भागों में हमने आदि विश्वेश्वर मंदिर के प्राचीन गौरव, औरंगज़ेब के विध्वंस और सन १७८० में महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा कराए गए वर्तमान मंदिर के निर्माण को समझा था। इस भाग में हम स्वतंत्र भारत की पहली कानूनी शुरुआत, वर्ष १९९१ के मुख्य मुकदमे और उन वैधानिक चुनौतियों का विश्लेषण करेंगे जिन्होंने इस लड़ाई को बेहद जटिल बना दिया।)
सन १९४७ में देश की आज़ादी और भारत के एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के बाद काशी का यह विवाद पूरी तरह से न्यायपालिका के पाले में आ गया। जहाँ आम जनता के लिए मुख्य ज्ञानवापी परिसर का भीतरी हिस्सा प्रतिबंधित था, वहीं हिंदू समाज मस्जिद की बाहरी दीवारों पर स्थित मां श्रृंगार गौरी और अन्य विग्रहों की सदियों से पूजा करता आ रहा था। लेकिन वर्ष १९९१ में वाराणसी की अदालत में एक ऐसा मुकदमा दायर हुआ, जिसने स्वतंत्र भारत में इस पूरे विवाद की कानूनी रूपरेखा को नए सिरे से तैयार किया।
आइए इस चौथे भाग में १९९१ के ऐतिहासिक मुकदमे, पक्षकारों के दावों और ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ के कानूनी पेंच को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
१. वर्ष १९९१: पंडित सोमनाथ व्यास का पहला मुख्य दीवानी मुकदमा (Civil Suit)
यद्यपि ब्रिटिश काल में भी वर्ष १९३६ में दीन मोहम्मद नाम के व्यक्ति ने ज्ञानवापी को वक्फ संपत्ति घोषित कराने के लिए मुकदमा लड़ा था (जिसे कोर्ट ने सीमित अधिकारों के साथ खारिज कर दिया था), लेकिन स्वतंत्र भारत का सबसे मुख्य और ऐतिहासिक मुकदमा १५ अक्टूबर १९९१ को दायर हुआ।
- मुख्य याचिकाकर्ता (Plaintiffs): प्राचीन आदि विश्वेश्वर मंदिर के मुख्य पुरोहितों के वंशज पंडित सोमनाथ व्यास, हरिहर पांडे और प्रोफेसर रामरंग शर्मा ने वाराणसी की सिविल कोर्ट (लोअर कोर्ट) का दरवाजा खटखटाया।
- प्रमुख मांगें क्या थीं?:
- पूरे ज्ञानवापी परिसर (जिसमें वर्तमान मस्जिद का ढांचा भी शामिल है) को ‘स्वयंभू ज्योतिर्लिंग आदि विश्वेश्वर’ की संपत्ति घोषित किया जाए।
- मुस्लिम पक्ष (अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी) को वहां से हटाया जाए और हिंदुओं को वहां पुनः भव्य मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए।
- हिंदुओं को पूरे परिसर में बिना किसी रोक-टोक के पूजा-अर्चना करने का वैधानिक अधिकार मिले।
२. ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१’ (Places of Worship Act) का सबसे बड़ा रोड़ा
पंडित सोमनाथ व्यास द्वारा मुकदमा दायर किए जाने के ठीक एक महीने पहले, सितंबर १९९१ में तत्कालीन केंद्र सरकार (पी. वी. नरसिम्हा राव सरकार) ने संसद में एक विशेष कानून पास किया था, जिसे ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट, १९९१’ कहा जाता है। यही कानून आज भी इस पूरे विवाद में मुस्लिम पक्ष की सबसे मजबूत ढाल बना हुआ है।
इस कानून की मुख्य धाराएँ क्या कहती हैं?
- धार्मिक स्वरूप को फ्रीज करना (धारा ३ और ४): यह कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि १५ अगस्त १९४७ को भारत के किसी भी धार्मिक स्थल (मस्जिद, मंदिर, चर्च आदि) का जो स्वरूप या चरित्र (Religious Character) था, उसे भविष्य में कभी भी बदला नहीं जा सकता।
- अदालती कार्यवाहियों पर रोक: यदि कोई व्यक्ति १५ अगस्त १९४७ के बाद निर्मित या रूपांतरित किसी धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने के लिए कोर्ट जाता है, तो अदालत उस मुकदमे को सुनने से इनकार कर देगी।
- अपवाद (अयोध्या मामला): इस कानून की धारा 5 के तहत केवल अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मामले को इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर (अपवाद) रखा गया था, क्योंकि वह मुकदमा आज़ादी से पहले से अदालतों में लंबित था।
[ प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, १९९१ ]
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[ मुस्लिम पक्ष (मस्जिद कमेटी) का तर्क ] [ हिंदू पक्ष (याचिकाकर्ताओं) का प्रति-तर्क ]
• १५ अगस्त १९४७ को यह एक मस्जिद थी। • यह संपत्ति कभी भी वक्फ (मस्जिद) की नहीं थी।
• इस कानून के तहत केस सुनने योग्य नहीं है। • आज़ादी के समय भी यहाँ हिंदू विग्रह और पूजा जारी थी।
• निचली अदालत को सुनवाई तुरंत रोकनी चाहिए। • धार्मिक स्वरूप 'मंदिर' का है, जिसे औरंगज़ेब ने दबाया।
३. हिंदू पक्ष का कानूनी प्रति-तर्क: ‘धार्मिक स्वरूप’ का वास्तविक सच
मुस्लिम पक्ष (अंजुमन इंतजामिया) ने १९९१ के एक्ट का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में याचिकाएं दायर कीं कि सोमनाथ व्यास के इस मुकदमे को तुरंत खारिज कर दिया जाए। लेकिन हिंदू पक्षकारों के वकीलों ने इसके खिलाफ बेहद मजबूत वैधानिक दलीलें पेश कीं:
- स्वरूप का निर्धारण (Religious Character): हिंदू पक्ष का कहना है कि 1991 का एक्ट धार्मिक स्थल के ‘स्वरूप’ की बात करता है। लेकिन ज्ञानवापी का स्वरूप क्या है, यह बिना साक्ष्य (Evidence) और वैज्ञानिक जांच के कैसे तय किया जा सकता है? मस्जिद की बाहरी हिंदू दीवार, नंदी का मुख और भीतर के खंभे चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि इसका स्वरूप हमेशा से एक हिंदू मंदिर का ही रहा है।
- पूजा की निरंतरता: १५ अगस्त १९४७ को और उसके बाद भी, हिंदू समाज ज्ञानवापी परिसर के पिछले हिस्से में स्थित मां श्रृंगार गौरी, भगवान गणेश और हनुमान जी की मूर्तियों की नियमित पूजा करता आ रहा था। वर्ष १९९३ में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देकर अचानक लोहे की बाड़ (Fencing) खड़ी कर दी और इस दैनिक पूजा को साल में केवल एक दिन (चैत्र नवरात्रि के दौरान) के लिए सीमित कर दिया। हिंदू पक्ष का तर्क है कि जब पूजा आज़ादी के समय भी जारी थी, तो इसे मस्जिद मानकर केस कैसे रोका जा सकता है?
भाग-४ का निष्कर्ष
पंडित सोमनाथ व्यास के इस 1991 के मूल मुकदमे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लंबे समय तक ‘स्टे’ (रोक) लगा रखा था, जिसके कारण यह लड़ाई ठंडे बस्ते में चली गई थी। लेकिन वर्ष २०१९ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या मामले पर दिए गए ऐतिहासिक फैसले ने इस पूरे विवाद को एक नई संजीवनी दे दी। इसी के बाद, काशी की पांच साहसी महिलाओं ने सीधे ज्ञानवापी परिसर के भीतर दैनिक पूजा के अधिकार को लेकर एक नया मुकदमा दायर किया, जिसने इस ऐतिहासिक जंग को सीधे वैज्ञानिक और एएसआई (ASI) सर्वेक्षण के आधुनिक दौर में लाकर खड़ा कर दिया।
अगले और अंतिम भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-५ (अंतिम भाग) में हम चर्चा करेंगे—“आधुनिक कानूनी मोड़ (२०२१-२०२६), वज़ूखाने में ‘शिवलिंग’ मिलने का दावा, एएसआई (ASI) की गुप्त वैज्ञानिक रिपोर्ट का अनावरण और व्यास जी के तहखाने में पूजा की बहाली”। हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे हालिया अदालती आदेशों ने ३१ साल बाद तहखाने का ताला खुलवाया और इस महा-विवाद का भविष्य अब किस ओर बढ़ रहा है।